ख़ूबसूरत कविता के जैसे है द जैपनीज़ वाइफ़

इस हफ़्ते कुल मिलाकर छह फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं जिसमें हिंदी की प्रिंस और ‘जाने कहाँ से आई है’ शामिल हैं. इसके अलावा अपर्णा सेन की द जैपनीज़ वाइफ़ भी है.

तीन अंग्रेज़ी की फ़िल्में भी रिलीज़ हुई हैं. ऑस्कर जीतने वाली द हर्ट लॉकर को देखना ज़रूरी है. थ्रिलर कॉमेडी ग्रीनज़ोन और रोमांटिक कॉमेडी डेटनाइट भी हैं.

प्रिंस

कुमार तौरानी की फ़िल्म प्रिंस के बारे में कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि कहानी समझ में आती ही नहीं. समझ में कुछ आता है तो बस इतना कि विवेक ओबरॉय एक प्रोफ़ेशनल चोर हैं जिसकी याददाश्त चली गई है.

विवेक के पीछे बहुत सारे गुंडे हैं जो ब्रैंडिड सूट और चश्मे पहनकर झुंड में सड़कों पर घूमते हैं.-कभी अफ़ग़ानिस्तान के बॉर्डर पर कभी दक्षिण अफ़्रीका के जंगलों और झीलों में. सबकी सबसे दुश्मनी है और कोई किसी का दोस्त नहीं.

हीरो विवेक कभी ऊँची इमारतों की छत से पानी में गिरता है तो कभी बाइक को आसमान में चलाता है और कभी बीच रास्ते बेहोश हो जाता है.

उसकी याददाश्त कम्प्यूटर से आती है, कम्प्यूटर से सेव होती है और कम्प्यूटर से इरेज़ भी हो जाती है.

सीबीआई अफ़सर संजय कपूर और विलेन बार-बार ब्रेन मैपिंग की बात करते हैं. मेरे हिसाब से अगर प्रोड्यूसर कुमार तौरानी ने अपने लेखक का ब्रेन मैप किया होता तो शायद दर्शकों को सर दर्द नहीं होता.

मैं प्रिंस को 2.5 स्टार देती हूँ और वो भी सिर्फ़ स्पेशल इफ़ेक्ट्स के लिए. इसमें सिर्फ़ तकनीक है- न दिल है न जान है.

जाने कहाँ से आई है

वार्नर ब्रदर्स की जाने कहाँ से आई है रोमांटिक फ़ैंटसी है जिसमें जैक्लीन हमारे हीरो रितेश देशमुख की गोद में आसमान से टपकती हैं. निर्देशक मिलाप मिलन ज़ावेरी ने इस बार कुछ नया करने की कोशिश की है मगर कामयाब नहीं रहे.

फ़िल्म का पहला हिस्सा आम लोगों को बाँध कर नहीं रख पाएगा. दूसरा हिस्सा बहुत बोरिंग है और आप बता सकते हैं कि क्या होने वाला है और अंजाम आपको पहले से ही मालूम है.

फ़िल्म का आइडिया नया है, अच्छा संगीत है, जैक्लीन बहुत सुंदर हैं मगर फ़िल्म में बात नहीं बनती. मैं दूँगी दो स्टार.

द जैपनीज़ वाइफ़

फ़िल्मकार अपर्णा सेन ने आज तक जितनी फ़िल्में बनाई हैं उन सबको पुरस्कार मिला है-न सिर्फ़ भारत में बल्कि बाहर भी.

मिस्टर एंड मिसिज़ अय्यर के एक लंबे अरसे बाद अपर्णा सेन की द जैपनीज़ वाइफ़ एक बार फिर हमारे दिलों को छू जाती है.

पत्रों द्वारा बनाया रिश्ता कैसे दोस्ती और फिर प्यार में बदलता है....कैसे दो अजनबी शब्दों के सहारे एक दूसरे को अपने दिल की बात समझाते हैं और शादी निभाते हैं.

मौसमी चटर्जी, राइमा सेन और जापान की अभिनेत्री चिगुसा ने तो अच्छा काम किया ही है मगर राहुल बोस ने जिस बारीकी से अपने किरदार को निभाया है उसे देखकर हम थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि ये सिर्फ़ एक भूमिका है.

फ़िल्म के दृश्य बहुत रोमांचक हैं और हमें सत्यजीत रे की पाथेर पंचाली और उनकी अन्य पुरानी फ़िल्मों की याद दिलाते हैं.

और इसका सारा श्रेय निर्देशक अपर्णा सेन और उनके लाजवाब सिनेमेटोग्राफ़र अनय गोस्वामी को जाता है.

द जैपनीज़ वाइफ़ इस दौर की सबसे सुंदर और अनोखी प्रेम कहानी है. बल्कि मैं कहूँगी कि ये एक फ़िल्म नहीं एक कविता है, ज़िंदगी जीने का तरीका है. फ़िल्म की रफ़तार थोड़ी धीमी है मगर ये कहानी के लिए ज़रूरी हैं. इस फ़िल्म को मैं दूँगी चार स्टार.

(लेखिका जानी-मानी फ़िल्म समीक्षक हैं और फ़िल्मों पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं)

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