अच्छी फ़िल्मों का है इंतज़ार

आदित्य राज कपूर
Image caption 'चेस' में आदित्य राज कपूर ने दमदार भूमिका निभाई है

हमने सोचा था कि इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के बाद अच्छी फ़िल्में देखने को मिलेंगी, लेकिन लगता है कि अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा.

पिछले हफ़्ते हमने निर्देशक जगमोहन मुंदड़ा की अपार्टमेंट देखी थी. इस हफ़्ते वो एक और थ्रिलर लाए हैं- चेज़.

'चेज़' एक फोटोग्राफ़र की कहानी है जो ग़लत समय पर ग़लत जगह पर पाया जाता है और जिसकी वजह से उसके पीछे बहुत सारे बड़े लोग और पुलिस पड़ जाती है.

फ़िल्म दो घंटे की है, पर ऐसा लगता है कि हम सदियों से थिएटर में बैठे हैं. पुलिस अभिनेता के पीछे भागते हुए दिन-दहाड़े बीच सड़क पर फायरिंग करती है. क्या यह सही है कि पुलिस आम लोगों के बीच गोलीबारी करे, और अगर नहीं तो सेंसर बोर्ड ने उसे क्यों नहीं काटा?

अभिनेता अनुज सक्सेना सुपर हीरो की तरह कभी छत से तो कभी पेड़ से छलांग मारते हैं और जितनी ऊंची उनकी छलांग होती है उतनी ज़ोर से साउंड इफ़ेक्ट आता है.

अभिनेता की गर्लफ़्रेंड एक पत्रकार है, लेकिन व्यवहार और कपड़ों से कुछ और ही लगती है. उदित गोस्वामी हीरो की नर्स हैं, लेकिन लगती एथलीट हैं और हमें बाद में पता चला कि वो एक ख़ुफ़िया पुलिस अफ़सर हैं.

अपार्टमेंट देखने के बाद मैंने पूछा था कि क्या जगमोहन मुंदड़ा वो ही निर्देशक हैं जिन्होंने हमें 'कमला', 'बवंडर' और 'प्रोवोक्ड' जैसी फ़िल्में दी थीं? चेज़ देखने के बाद मैं सोचती हूं कि अच्छे कलाकार बुरी फ़िल्म को किस हद तक सुधार सकते हैं, ये आज समझ में आया.

चेज़ का पीछा करने की ज़रूरत नहीं है, सिवाय इसके कि आप आदित्य राज कपूर को देखना चाहते हों जो शम्मी कपूर और गीता बाली के सपुत्र हैं.

आदित्य ने इतने साल में बहुत सारे पेशे बदले और आख़िर में 53 की साल की उम्र में तय किया कि वो अपने मां-बाप की तरह अभिनेता बनना चाहते हैं.

उनमें हुनर है कि नहीं ये तो वक़्त तय करेगा, लेकिन आप अगर शम्मी कपूर की याद ताज़ा करने चाहते हो तो आदित्य को चेज़ में देख सकते हैं.

हाउसफ़ुल

साजिद नाडियावाला और साजिद ख़ान ने मिलकर कुछ साल पहले बनाई थी 'हे बेबी', जो साजिद ख़ान की पहली फ़िल्म थी. 'हे बेबी' में तीन हीरो और एक हीरोइन थी, 'हाउसफ़ुल' में भी तीन हीरो और तीन हीरोइनें हैं.

Image caption हाउसफ़ुल में दीपिका अहम किरदार में हैं

कहानी वैसे तो दो हंसों के जोड़े की है- अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोण, लारा दत्ता और रीतेश देशमुख, लेकिन धीरे-धीरे इस प्रेम कहानी में और भी जोड़े जुड़ते जाते हैं, जैसे ज़िया ख़ान, अर्जुन रामपाल और बोमन ईरानी-लिलेट दुबे.

लारा के पिता बोमन ईरानी अपनी बेटी से रुठे हुए हैं और लारा अपने पिता को ये साबित करना चाहती है कि उसका पति दुनिया का सबसे अमीर आदमी है.

दीपिका अपने भाई को ये साबित करना चाहती है कि उसका ब्वायफ़्रेंड दुनिया का सबसे होनहार लड़का है और इसी कोशिश में वो झूठ के जाल में फंसते हैं और आख़िर में पकड़े जाते हैं.

अफ़सोस कि न ये हृषिकेश मुखर्जी की गोलमाल है, ना चुपके-चुपके. ना इसमें कोई सच्चा दुख है. ना ख़ास विचार और ना कोई यादगार किरदार. हां अच्छे लोकेशन हैं, अच्छा संगीत, कपड़े और ख़ूबसूरत लड़कियां, शायद इसलिए निर्देशक को कहानी या संदेश की ज़रूरत नहीं लगी.

अक्षय कुमार अमिताभ बच्चन के पुराने गाने पर नाचते हैं और रीतेश देशमुख ने करण जौहर की 'दोस्ताना' और 'कल हो ना हो' के गानों को दोहराया है.

फ़िल्म थोड़ा हंसाती है और थोड़ा ग़ुस्सा भी दिलाती है, ख़ास तौर पर जब वो रिग्रेसिव बातें करती है, जैसे 'सच्चा प्यार मेरा बैड लक बदल देगा' या मैं पनौती हूं और ख़ास तौर पर जब बोमन ईरानी एक काले बच्चे को 'डामर' पुकारते हैं.

आज के ज़माने में ये तो नाइंसाफ़ी है साजिद ख़ान, आप का क्या होगा जनाबे आली...?

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