फिर भी दिल है हिंदुस्तानी:गुरिंदर

फ़िल्मों की अपनी एक अलग रूमानियत होती है. ब्रिटेन के एक भारतीय परिवार में रहते हुए मैं कई तरह की फ़िल्में देखकर बड़ी हुई हूँ.

बॉलीवुड की फ़िल्में देखने हम अपने परिवार के साथ सिनेमा हॉल में जाया करते थे- हाथी मेरे साथी, बॉबी, कभी-कभी ये सभी फ़िल्में मुझे याद हैं.पर इसके साथ-साथ मैं सिनेमाघर में हॉलीवुड की बड़ी-बड़ी फ़िल्में भी देखा करती थी- जैसे साउंड ऑफ़ म्यूज़िक या विज़र्ड ऑफ़ ऑज़.

(गुरिंदर चड्ढा बेंड इट लाइक बेकम जैसी फ़िल्में बना चुकी हैं.ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से हुई बातचीत पर आधारित है.इस हफ़्ते बीबीसी पर सिनेमा से जुड़ी कई हस्तियों के अनुभव आप पढ़ सकते हैं. शुक्रवार को अभिनेता शम्मी कपूर के अनुभव पढ़िए)

घर पर बैठे टीवी पर इंग्लिश फ़िल्में भी ख़ूब देखी हैं-जिन्हें आप रियलिस्ट सिनेमा कहते हैं. इन सबका प्रभाव मुझ पर रहा है.

फ़िल्में बनाना मुझे बेहद पसंद है. इससे अच्छा काम क्या हो सकता है जिसमें आप मर्ज़ी के मालिक हों- जब चाहें सुबह उठें, जब चाहें फ़िल्म पर काम करें!

और उस रोमांच का तो कोई मुकाबला ही नहीं कि आप कोई किरदार ख़ुद गढ़ सकते हैं- एक विचार का दिमाग़ में कौंधना, उसे काग़ज़ पर उतारना और फिर उसे किरदारों और दृश्यों के रूप में पर्दे पर साकार होते देखना. ये मुझे रोमांचित करता है.

फ़िल्मों की सबसे ख़ास बात है कि वे यूनिवर्सल या सार्वभौमिक होती हैं. भाषा या संस्कृति का फ़र्क़ फ़िल्में मिटा देती हैं.

मैं भारतीय मूल की ब्रितानी नागरिक हूँ और एशियाई समुदाय पर केंद्रित कई ब्रितानी फ़िल्में बनाती रही हूँ- ये फ़िल्में जितनी ब्रितानी हैं उतनी ही भारतीय भी. शायद इसलिए दिलों को भा जाती हैं.

फ़िल्म बनाने की चुनौती

वैसे फ़िल्मों पर कई बार ये आरोप लगता है कि वो समाज के विभिन्न वर्गों को स्टीरियोटाइप तरीके से पर्दे पर पेश करती हैं. फ़िल्मों में आने का मेरा एक बड़ा मकसद यही था कि फ़िल्मों में किसी तरह के स्टीरियोटाइप को चुनौती दे सकूँ- ख़ासकर जिस तरह एशियाई समुदाय और महिलाओं को पेश किया जाता है.

मेरे लिए ये बहुत अहम था कि मैं भारतीय किरदारों,ख़ासकर महिला किरदारों को थ्री डाइमेंशनल रूप में पेश कर सकूँ. कई बार फ़िल्मों में महिला किरदारों को केवल उपस्थिति मात्र के लिए रखा जाता है लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकती.

मैं उन्हें ऐसे रूप में दिखाना पसंद करती हूँ जो ज़िंदगी जीना जानती हैं, जिन्हें ख़ुद पर भरोसा है, जो समाज की रिवायतों पर सवाल उठा सकती है.

बेंड इट लाइक बेकम में माँ चाहती है उसकी बेटी खाना बनाना सीखे ताकि वो एक अच्छी भारतीय गृहणी बन सके क्योंकि समाज में एक अच्छी गृहणी और पत्नी बनने के लिए ये ज़रूरी माना जाता है. लेकिन बेटी को तो फ़ुटबॉल पसंद है.

यहाँ मैने खाना बनाने वाले मुद्दे का इस्तेमाल ये सवाल उठाने के लिए किया कि एक अच्छी पत्नी का वजूद केवल इस बात पर नहीं टिका होता कि वे कितने और कैसे पकवान बना सकती है. मेरी फ़िल्म में हीरोइन बनने के लिए दुबले-पतले होने या छरहरी काया की ज़रूरत नहीं है.

अच्छी फ़िल्म बनाने की कई चुनौतियाँ भी होती हैं. अकसर सवाल पूछा जाता है कि ऐसी फ़िल्म कैसे बनाई जाए जो क्लास और मास दोनों को पसंद आए .जब मैं किसी फ़िल्म पर काम करती हूँ तो मेरी कोशिश यही रहती है कि एक ऐसी फ़िल्म बनाऊँ जिसमें मनोरंजन हो, कॉमेडी हो पर हँसी के इन्हीं फ़व्वारों के बीच वो कुछ अहम संदेश भी दे जाए तो क्या बुरा है.

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