रोल को न बोलने का दम होना चाहिए

Image caption अतुल ने रंग दे बसंती, पेज थ्री, दिल्ली-6, चांदनी बार और हे राम जैसी फ़िल्मों में काम किया है.

फ़िल्मों की दुनिया में आकर ख़ुद को स्थापित करना एक चुनौतीपूर्ण काम है. यहाँ आने के बाद एक ऐक्टर को पहला शब्द जो सीखना पड़ता है वो है ‘ना’- मना कर देना. आपको अपना काम बहुत ध्यान सा चुनना पड़ता है. किरदार आपकी कसौटी पर खरा न उतरे तो ना बोलना आना चाहिए.

(अतुल कुलकर्णी चांदनी बार और हे राम के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं. ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित है. इस हफ़्ते बीबीसी पर सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के अनुभव आप पढ़ सकते हैं. गुरुवार को चौथी कड़ी में पढ़िए गुरिंदर चड्ढा के अनुभव.)

एक दौर था जब आप या तो फ़िल्म के हीरो बन सकते थे जिसे दुनिया की कोई ताक़त नहीं हरा सकती या आप विलेन थे जो बुराइयों का पुलिंदा था.

लेकिन अच्छाई-बुराई के इन दो फ़ासलों के बीच भी जीवन के कई रंग होते हैं और कई किरदार होते हैं. हमारी ख़ुशकिस्मती है अब सिनेमा में ऐसे रोल लिखे जाते हैं और लोग पसंद भी कर रहे हैं.

मैं कभी ये सोच कर फ़िल्मों में नहीं आया था कि मुझे ख़ास तरह की फ़िल्मों ही करनी हैं. मैंने केवल ये देखा कि मुझे कहानी, रोल और निर्देशक पसंद आने चाहिए.

एक अच्छे अभिनेता को परिभाषित करना मुश्किल है. हर दर्शक की माँग अलग होती है. जिस दर्शक की माँग और पसंद पर आप खरा उतरते हैं, उसके लिए आप अच्छे अभिनेता हैं.ये ज़रूरी नहीं है कि अभिनय की जो मेरी परिभाषा है, मैं उसे ही पकड़ कर चलूँ. हमारे यहाँ अलग-अलग तरह के अभिनेता हैं और उन सब को पसंद करने वाले दर्शक भी मौजूद हैं.

फ़िल्म- कला या बिज़नेस?

दो आँखे बारह हाल जैसी फ़िल्में बनाने वाले वी शांताराम कहा करते थे कि सिनेमा 80 फ़ीसदी बिज़नेस है और 20 फ़ीसदी कला है.

पहली कड़ी-शेखर कपूर के अनुभव

दूसरी कड़ी-विद्या बालन के अनुभव

दरअसल फ़िल्म बनाना बहुत महंगी कला है- शायद सबसे महंगी कला. इसलिए फ़िल्म कितने पैसे कमा पाएगी इस बारे में सोचना ज़रूरी हो जाता है. मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ बुराई है.

वी शांताराम की सोच ग़लत नहीं हो सकती. उनकी फ़िल्मों ने अच्छा कारोबार किया पर उन्होंने बिज़नेस के साथ-साथ कला का भी ख़्याल रखा है.

अगर मैं कला में बिज़नेस के हितों की बात कर रहा हूँ तो इसे बहुत पॉज़िटिव तरीके से लिया जाना चाहिए. एक गायक को भी सिखाया जाता है कि महफ़िल में गाते समय वो कैसे गायकी और अदायगी से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का मन लुभा सके. इसका भी एक इक्नॉमिक्स है. हर कला में व्यवसायीकरण ज़रूरी होता है.

किरदारों से परे भी है ज़िंदगी

हमारा फ़ील्ड बहुत ग्लैमरस है इसलिए लोग हमारी ज़िंदगी के हर पहलू को ग्लैमर की नज़र से ही देखते हैं.बहुत से लोगों को लगता है कि शायद हम कलाकार हर समय अपने फ़िल्मी किरदारों में ही जीते हैं. पर ऐसा नहीं है.

मैं अगर कोई किरदार निभा रहा हूँ तो मैं उसके बारे में काफ़ी चीज़ें पढ़ता हूँ और विचार करता हूँ. ज़ाहिर है उसका कुछ असर तो आपकी सोच पर होता ही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी किरदार को निभाने के बाद मेरी ज़िंदगी बदल जाती है.

एक आम आदमी भी अच्छी क़िताबें पढ़ता है, अख़ाबर में संवेदनशील रिपोर्ट पढ़ता है और उसके मन पर उसका थोड़ा बहुत असर पड़ता है, बस उतना ही असर हम लोगों पर भी होता है जब हम कोई अच्छा या संवेदनशील रोल फ़िल्म में करते हैं.

अलग-अलग फ़िल्मों ने अलग-अलग तरह से मेरे करियर को आगे बढ़ाया है. हे राम ऐसी फ़िल्म थी जिसमें लोगों ने मेरे काम को पहचाना. चाँदनी बार व्यवसायिक तौर पर हिट रही तो बहुत सारे लोग मुझे पहचानने भी लगे. कॉमर्शियल हिट का होना एक ऐक्टर के लिए बहुत ज़रूर होता है.

रंग दे बसंती लोगों ने दुनिया भर में देखी जिससे मेरी पहचान को और विस्तार मिली. उम्मीद है आने वाले दिनों में भी दर्शकों की उम्मदों पर खरा उतर सकूँगा.

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