फ़िल्म वही जो दिल को छू जाए

Image caption शेखर कपूर ने 1998 में अग्रेज़ी में एलिज़ाबेथ बनाई थी जिसे एक ऑस्कर भी मिला था.

सिनेमा को मैं इस सदी का पॉप आर्ट मानता हूँ-मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन. सिनेमा केवल मनोरंजन ही नहीं करता बल्कि ये एक सामाजिक दस्तावेज़ भी है.

(ये लेख शेखर कपूर से बीबीसी संवाददाता वंदना से हुई बातचीत पर आधारित है. इस हफ़्ते बीबीसी पर सिनेमा से जुड़ी कई हस्तियों के लेख आप पढ़ सकते हैं. मंगलवार को विद्या बालन के अनुभव पढ़िए)

बचपन में मैं ये सोचकर हैरान होता था कि कैसे कोई इंसान फ़िल्म बनाता है और मीलों दूर सिनेमाघर में बैठे हज़ारों लोगों को वो एक फ़िल्म एक साथ भावुक कर सकती है, हँसा सकती है,रुला सकती है.

आप सोचिए कि अमरीका के एक फ़िल्मकार ने अवतार बनाई और सारी दुनिया रोमांचित हो उठी.सिनेमा की इसी शक्ति ने मुझे आकर्षित किया और मैं एक चार्टेड एकाउंटेट का काम छोड़-छाड़ फ़िल्मकार बन गया. हिंदी में मासूम और मिस्टर इंडिया बनाई तो बाद में पश्चिम का रुख़ किया-अंग्रेज़ी में एलिज़ाबेथ जैसी फ़िल्म करने को मिली.

भारतीय और पश्चिम की फ़िल्मों की मूलभावना में बुनियादी फ़र्क़ है. भारतीय फ़िल्में या एशियाई सिनेमा मेलोड्रामा से झिझकता नहीं है, मूल किरदार कहीं न कहीं पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं लेकिन पश्चिमी सिनेमा मेलोड्रामा से थोड़ा शर्मा जाता है.

भारतीय सिनेमा को लेकर कई तरह के सवाल उठाए जाते हैं कि ये वास्तविकता से दूर होता है या फिर गीत-संगीत और नृत्य को लेकर भी असहमति होती है.

लेकिन हमें समझना होगा कि ये सिनेमा विदेशी लोगों के लिए नहीं बना है. बॉलीवुड की अपनी एक संस्कृति है और अगर बॉलीवुड की आलोचना करनी है तो वो आलोचना इस सिनेमा की संस्कृति के दायरे में रहकर ही करनी होगी, बाहर से नहीं.

अगर आप जापान के मशहूर काबुकी थिएटर की आलोचना करें कि ये इतने आहिस्ता-आहिस्ता क्यों चलता है, तो आपको समझना होगा कि इसका स्वरूप यही है और यही इसका अंदाज़ है.

फ़िल्म वही जो दिल को छू जाए

सोनी, ट्वेन्टिइथ सेंचुरी फ़ॉक्स से लेकर वार्नर ब्रदर्स भारत के फ़िल्म उद्योग में पैसा लगा रहे हैं.माई नेम इज़ खान, सांवरिया, चांदनी चौक टू चाइना जैसी फ़िल्मों में इन्होंने पैसा लगाया.

वे जानते हैं कि हिंदुस्तान आर्थिक तरक्की कर रहा है, यहाँ बड़ा दर्शक है जो सिनेमा की महंगी टिकिट के लिए पैसा खर्च करने को तैयार है. इसलिए ये कंपनियाँ अपने झंडे गाड़ रही हैं ताकि जब बाज़ार बड़ा होगा तो ये भी मुनाफ़े की हिस्सेदार बन जाएँ.

भारतीय फि़ल्मों को इसका फ़ायदा उठाना होगा. ये कंपनियाँ हमारी फ़िल्मों की विदेशों में अच्छी मार्केटिंग कर सकती हैं. माई नेम इज़ खान इसकी मिसाल है. फ़ॉक्स ने इसे काफ़ी प्रोमोट किया है और फ़िल्म ने भारत के बजाए विदेशों में ज़्यादा कमाई है ख़ासकर मध्य पूर्व में.

फ़िल्म की ख़ूबसूरती

हमारी नज़र सिर्फ़ अमरीका या ब्रिटेन में होने वाले फ़िल्मी कारोबार पर ही रहती है लेकिन भारतीय फ़िल्मों का बाज़ार और देशों में भी है जहाँ विस्तार की ज़रूरत है. इस दिशा में पहला क़दम माई नेम इज़ खान ने लिया है. ये पोलैंड जैसे देशों में अब रिलीज़ हुई है.इसके लिए भारतीय सिनेमा को थोड़ा बहुत अंतरराष्ट्रीय होना पड़ेगा.

फ़िल्म बनाने की कला एक ख़ूबसूरत विधा है. इसकी सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि सब कलाओं को इकट्ठा करके आप एक कला में डाल सकते हैं- लेखन, संगीत, अभिनय, कैमरा, ड्रामा, एडिटिंग.

काम मु्श्किल ज़रूर है लेकिन जब फ़िल्म बन जाती है और हज़ारों लोग उसे देखते हैं तो मन खुश हो जाता है- ख़ासकर जब कोई आकर मुझसे ये कहे कि आपकी फ़िल्म देखकर हम बहुत रोए-हँसे या कहे कि फ़िल्म हमारे दिल को छू गई या हमारी सोच बदल दी.

यानी वही बात जो मैंने शुरु में लिखी थी कि एक फ़िल्म हज़ारों लोगों के दिल को छू जाने की शक्ति रखती है. भावनाओं का यही ताना-बाना मुझे सिनेमा की ओर खींचे रखता है.

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