मेहनत बराबर,मेहनताना कम क्यों: विद्या

बीबीसी ने मुझसे बातचीत के लिए संपर्क किया और बातों-बातों में मुझे याद दिलाया कि 2010 में मैं अपने करियर के पाँच साल पूरे कर रही हूँ. मुझे तो एहसास ही नहीं हुआ था इस बात का.

(ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से हुई बातचीत पर आधारित है.इस हफ़्ते बीबीसी पर सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के अनुभव आप पढ़ सकते हैं. बुधवार को राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता अतुल कुलकर्णी के अनुभव पढ़िए)

पाँच साल का सफ़र यूँ तो बहुत छोटा है पर इन पाँच सालों में मेरे बहुत सारे सपने साकार हुए हैं.कभी तारीफ़ हुई तो कभी आलोचना भी.

मैं 10-11 साल की थी जब सोच लिया था कि ऐक्टिंग करूंगी- कहाँ, कैसे, क्यों, कब नहीं पता था. छोटे-छोटे क़दमों के सहारे मैं यहाँ तक पहुँची हूँ.

इस श्रंखला की पहली कड़ी-शेखर कपूर के अनुभव

मुझे अपने करियर में परिणीता, पा और इश्कियाँ जैसी फ़िल्में करने का अवसर मिला है जिसमें हीरो सर्वेसर्वा नहीं था बल्कि हीरोइन का रोल भी अर्थपूर्ण था.

अब तक का रुझान यही रहा है कि ज़्यादातर हिंदी फ़िल्में हीरो के इर्द-गिर्द लिखी गई हैं. दरअसल पुरुष के इर्द-गिर्द कहानी लिख कर फ़िल्म बनाना बहुत सुविधाजनक होता है क्योंकि शुरु से ही हमारी एक स्थापित सोच होती है. हम पुरुष प्रधान कहानियाँ पढ़कर और देखकर बड़े होते हैं. ऐसे में पुरुष प्रधान फ़िल्म बनाना एक सहज और आसान फ़ॉर्मूला है.

लेकिन मुझे नहीं लगता कि आज का दर्शक फ़िल्मों को इस खाँचे में डालकर देखना चाहता है कि वो केवल पुरुष प्रधान हों या सिर्फ़ महिला प्रधान हों. हम बेहतर फ़िल्में देखना चाहते हैं जो आम लोगों के बारे में हों.

मेहनत बराबर, मेहनताना कम?

हिंदी सिनेमा में ये सवाल उठता रहा है कि हीरो के मुकाबले हीरोइनों को कम फ़ीस मिलती है. पहले ज़्यादातर फ़िल्में पूरी तरह हीरो पर आधारित होती थी तो फ़िल्म के चलने, न चलने का दारोमदार हीरो पर ज़्यादा था.

इसलिए शायद उनका मेहनताना भी ज़्यादा था. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फ़ीस में अब भी काफ़ी अंतर है पर चीज़ें बदल रही हैं. उम्मीद है और बदलाव आएँगे. आख़िर उम्मीद पर दुनिया कायम है.

क़दम ज़मीन पर रहें

रुपहले पर्दे की इस दुनिया में पैसा है, शोहरत है, ग्लैमर है, लोगों का प्यार है लेकिन अभिनय के बारे में जो बात मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है वो ये कि एक अभिनेत्री होने के नाते मुझे बहुत सारी ज़िंदगियाँ जीने को मिलती हैं. ये बहुत उत्साहित करता है मुझे.

मैंने अपना पहला ऑटोग्राफ़ तब दिया था जब मैं स्टार थी भी नहीं, मैं केवल एक विज्ञापन फ़िल्म शूट कर रही थी. शूटिंग देखने आए कुछ लोगों ने पता नहीं क्या सोचा कि मेरा ऑटोग्राफ़ ले लिया....अब कभी ऑटोग्राफ़ देती हूँ तो ये किस्सा याद आ जाता है.

सच में, हमारा और हमारे चाहने वालों का ये रिश्ता बड़ा प्यारा होता है. हम भले ही उनसे कभी मिल न पाएँ लेकिन एक कलाकार के लिए ये बात बहुत मायने रखती है कि उसके काम को लोग पसंद कर रहे हैं.

एक कलाकार के नाते इस इंडस्ट्री को और लोगों को मुझसे कुछ उम्मीदें हैं और कोशिश रहेगी कि इन्हें पूरा कर सकूँ. एक छोटी सी उम्मीद मेरी भी है कि फिल्म इंडस्ट्री और बेहतर फ़िल्में बनाए.

हमें ये बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि ये उद्योग और फ़िल्म बनाने की पूरी प्रकिया किसी भी हस्ती से बड़ी है. मैं ये हमेशा याद रखती हूँ कि शोहरत कितनी भी मिले, मैं इस इंडस्ट्री से बड़ी नहीं हूँ. यही बात मेरे क़दम शोहरत के बावजूद ज़मीन पर रखती है.

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