मासूम सी होती थी हमारी फ़िल्में: शम्मी

सिनेमा मेरी रग-रग में है.अब मैं फ़िल्मों में सक्रिय नहीं हूँ पर आज भी बहुत सारे लोगों का प्यार मिलता है, ई-मेल आते हैं, ट्विटर पर संदेश आते हैं.

(ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से हुई बातचीत पर आधारित है. इस हफ़्ते बीबीसी पर सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के अनुभव आप पढ़ सकते हैं. रविवार को पढ़िए वरिष्ठ गीतकार समीर के अनुभव)

क्या जवानी में मैने कभी सोचा था कि पचास बाद मेरा क्या होगा,आज का सिनेमा कैसा होगा, मैं काम करता रहूँगा? शायद नहीं.......

मैंने उस समय मैने एक किताब पढ़ी थी जिसके मुख्य किरदार का फलसफा था कि ‘लिव फ़ास्ट, डाई यंग एंड मेक ए गुड लुकिंग कॉप्स(Live fast, die young and make a good looking corpse). जब से मैं 18-19 साल का था, तब से मैने भी ये फ़लसफ़ा अपनाने की कोशिश है.

लोग मुझसे कहा करते थे कि मैने अपनी फ़िल्मों और गानों के ज़रिए 50 और 60 के दौर में हिंदुस्तान को जवानी का मज़ा चखाया. किसी कलाकार के लिए यही छोटी-छोटी बातें उन्हें उत्साह दे जाती हैं.

मैं अपने गानों और डांस पर बहुत मेहनत किया करता था- चाहे वो ‘ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली' हो, बार बार देखो हज़ार बार देखो या ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए’ हो. मोहम्मद रफ़ी साहब जैसे गायक ने मेरे लिए ख़ूबसूरत अंदाज़ में सबसे ख़ूबसूरत गाने गाए. ये मेरी ख़ुशनसीबी रही.

दरअसल पुराने दौर की फ़िल्मों में एक अलग तरह की मासूमियत थी, बहुत आसान सी थी. लड़का-लड़की मिले, लड़की का दिल जीतने की लिए कुछ दिलकश गाने गाए, फिर बीच में एक प्राण जी आ गए विलेन के रूप में.

आज की फ़िल्मों में अलग तरह की बारीकियाँ हैं, पेचीदगियाँ हैं. तकनीक बहुत बेहतर हुआ है लेकिन जहाँ तक फ़िल्मों की विषयवस्तु या कॉन्टेंट का सवाल है तो मैं दावे के साथ नहीं कह सकता.

चाहे कोई मुझे जंगली कहे

मैं ख़ुशकिस्मत था कि मुझे जंगली, तुमसा नहीं देखा या तीसरी मंज़िल जैसी फ़िल्में करने को मिली.जंगली और उसमें याहू वाला अंदाज़ बहुत लोकप्रिय हुआ था. लोग अब भी पूछते हैं कि क्या जंगली ख़ास तौर पर मेरे लिए लिखी गई थी?

असल बात तो ये है कि तुमसा नहीं देखा और जंगली ये दोनों फ़िल्में देव आनंद के लिए थीं पर उन्होंने नहीं की तो मेरी झोली में आ गई.

‘जब प्यार किसी से होता है’ मेरे लिए सोची गई थी पर काम किया देव ने. तीसरी मंज़िल में भी देव आनंद ने काम करने से मना कर दिया. मैने हाँ कर दी और फ़िल्म सुपरहिट हो गई..कुछ ऐसी ही है यहाँ की अजब दास्तां.

पुराने ज़माने में सिनेमा की कशिश ही कुछ और थी. मनोरंजन का कोई और साधन था नहीं. सिनेमाघर में जाकर तीन घंटे की फ़िल्म देखने के जैसा और कोई अनुभव नहीं होता था.दस रुपए में परिवार के छह-सात लोग सिनेमा देख लेते थे, बच्चों को आईसक्रीम भी खिला देते थे.

आज मनोरंजन के लिए सिर्फ़ सिनेमा ही एकमात्र साधन नहीं है, हज़ारों साधन है. इसलिए फ़िल्मों की कशिश कुछ कम हुई है.

अगर एक तरफ़ देवदास फ़िल्म आ रही हो और एक तरफ़ टीवी पर मैनचेस्टर यूनाइटेड का मैच हो तो मैं फ़िल्म के बजाए मैच देखना पसंद करूँगा.

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात-दिन

आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में मैं अब किनारे खड़े राहगीर की तरह हूँ. देखते देखते सिनेमा बदल गया, मुंबई बदल गई. तब के ज़माने में मसरूफ़ीयत थी तो फ़ुरसत के लम्हे भी होते थे.

मैं मुंबई के फ़िल्मीस्तान में ख़ूब शूटिंग किया करता था. सबुह छह बजे घर से निकलता था और चेंबुर के गोल्फ़ कोर्स जाता था.वहाँ से फ़िल्मीस्तान पहुँच कर अपने मेक अप रूम में थोड़ा आराम फ़रमाता था, नाश्ता करता, तैयार होता,मेक अप लगवाता ...फिर भी 11 बजे तक शूटिंग के लिए तैयार हो जाता था. छुट्टी के दिन तो दिन भर गोल्फ़ खेलते और एक-आध बीयर पीते. ये सब ऐश भी की है हमने. राज कपूर भी गोल्फ़ के बहुत शौकीन थे.

आज तो इस रफ़्तार से काम करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.मुझे लगता है कि लोग ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाना भूल चुके हैं.

एक साल में इंसान बीस करोड़ कमा रहा है लेकिन उस बीस करोड़ का मज़ा लेना उसे नहीं आता.

मैने जब फ़िल्मों में क़दम रखा था तो मेरी शुरुआत बहुत धीमी रही थी. अपने यौवन के चार अनमोल साल लगाने के बाद मुझे तमुसा नहीं देखा जैसी फ़िल्म मिली जिसने मेरा करियर आगे बढ़ाया. कभी कामयाबी मिली तो कभी-कभी मायूसी भी. लेकिन मुझे इस बात की तसल्ली है कि मैने पूरी ज़िंदादिली से अपनी ज़िंदगी का आनंद लिया है.

पहली कड़ी -शेखर कपूर

दूसरी कड़ी- विद्या बालन

तीसरी कड़ी-अतुल कुलकर्णी

चौथी कड़ी- गुरिंदर चढ्डा

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