हिजाब के हिसाब से पोशाक

Image caption इस्लामी फ़ैशन शो का आयोजन कई देशों में होने लगा है

इस्लामी परिधानों की परंपरा और पश्चिमी फ़ैशन का तालमेल ज़रा मुश्किल काम है.

पश्चिमी फ़ैशन में जहाँ अक्सर ध्यान आकर्षित करने पर ज़ोर रहता है वहीं हिजाब का मक़सद इसके ठीक विपरीत होता है. लेकिन इन दिनों बड़ी संख्या में महिलाएँ इस्लाम के अनुरूप फ़ैशन का नया आयाम सफलतापूर्वक पेश कर रही हैं.

इस्लामी फ़ैशन डिज़ाइनर महिलाएँ कैटवॉक देखती हैं, पश्चिमी फ़ैशन पत्रिकाएँ पढ़ती हैं, इसके बाद वे फ़ैशनेबल कपड़ों को 'इस्लामी टच' दे देती हैं यानी सिर और हाथ को ढँकने वाला बना देती हैं.

ऐसी ही एक फ़ैशन डिज़ाइनर हैं जाना कोसियाबाटी 'हिजाब स्टाइल' नाम का एक ब्लॉग चलाती हैं, उनके ब्लॉग को दुनिया भर में हर रोज़ लगभग ढाई हज़ार महिलाएँ पढ़ती हैं.

लेबनानी मूल की ब्रितानी जाना कहती हैं, "मैंने ब्लॉग की शुरूआत ढाई साल पहले की थी, मैंने बहुत सारे फ़ैशन ब्लॉग देखे, इस्लामी ब्लॉग भी बहुत थे लेकिन ऐसा कोई ब्लॉग नहीं था जो इस्लामी परंपरा के अनुरूप फ़ैशन की बात करे. मैंने इस ब्लॉग के ज़रिए मुख्यधारा के फ़ैशन की चीज़ों को मुसलमान महिलाओं के पहनने लायक़ बनाने की कोशिश की."

जाना का कहना है कि उनके ब्लॉग इतनी बड़ी संख्या में पाठकों के आने की वजह ये है कि मुस्लिम फ़ैशन इंडस्ट्री में कोई जोश नहीं है.

वे कहती हैं, "युवा मुसलमान लड़कियाँ ऐसे फ़ैशन की तलाश में हैं जो उन्हें बाक़ी लोगों से अलग थलग करने की जगह उनसे जोड़े. "

जाना का कहना है कि आतंकवादी हमलों और उसके बाद समाज में पैदा हुआ तनाव भी एक अहम पहलू है, वे कहती हैं, "इन घटनाओं के बाद हमारी पीढ़ी अपनी पहचान के प्रति अधिक सजग हो गई है, लोग हमारी आस्था, पहचान और पहनावे के बारे में सवाल पूछते हैं."

वे कहती हैं कि हिजाब पहनने वाली लड़कियाँ हिजाब को छोड़े बिना समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए ऐसी पोशाकें अपना रही हैं जो उन्हें बहुत अलग न दिखाती हों.

समस्याएँ

हाना ताजिमा सिम्पसन एक फ़ैशन डिज़ाइनर हैं, उन्होंने पाँच वर्ष पहले धर्मांतरण करके इस्लाम अपना लिया था. उनका कहना है कि वे हिजाब के साथ अपनी पसंद के ज़्यादातर कपड़े नहीं पहन पाती थीं.

जापानी मूल के ब्रितानी हाना का कहना है, "शुरुआत में मेरे दिमाग़ में ऐसी छवि थी मुसलमान महिला ढीले ढाले काले लबादे और चादर में ढँकी रहती हैं लेकिन बाद में मुझे लगा कि यह सही नहीं है और मैं गरिमापूर्ण तरीक़े से कई तरह के पहनावे आज़मा सकती हूँ. कई कोशिशों और ग़लतियों के बाद अब मैं अपने पहनावे और स्टाइल से खुश हूँ."

हाना अपनी तैयार की हुई डिज़ाइनों को 'स्टाइल कवर्ड' नाम के अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करती हैं. उनका कहना है कि वे किसी खास वर्ग को ध्यान में रखकर पोशाक तैयार नहीं करतीं और उनकी पोशाकें ग़ैर-मुस्लिम महिलाएँ भी ख़रीदती हैं.

क्या फ़ैशन इस्लाम की परंपरा के प्रतिकूल नहीं है जिसमें शरीर की ओर ध्यान आकर्षित करने वाली चीज़ों से बचा जाता है, यह पूछे जाने पर इन महिलाओं का कहना है कि फ़ैशन व्यक्तिगत अभिरुचि की अभिव्यक्ति का तरीक़ा और इस्लाम में उसकी कोई मनाही नहीं है.

जाना कहती हैं, "इस्लाम सिर्फ़ ये बताता है कि शरीर के किन हिस्सों को ढँककर रखना चाहिए लेकिन रंगों या स्टाइल को लेकर कोई रोकटोक या पाबंदी नहीं है."

संबंधित समाचार