मैं जरा आलसी हूँ: मौसमी

मौसमी चटर्जी

बीते जमाने की हीरोइन मौसमी चटर्जी अपर्णा सेन की फ़िल्म ‘द जैपनीज़ वाइफ़’ के जरिए लंबे अरसे के बाद एक बार फिर फ़िल्मों में लौटी हैं.

वे खुद को एक आलसी अभिनेत्री मानती हैं. मौसमी कहती हैं कि उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर को कभी गंभीरता से नहीं लिया और वे कड़ी मेहनत भी नहीं करना चाहती.

वर्ष 1967 में बांग्ला निर्देशक तरुण मजुमदार की फ़िल्म ‘बालिका वधू’ के जरिए अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने वाली मौसमी ने आखिरी बार ‘हॉलीवुड बॉलीवुड’ नामक हिंदी फिल्म में काम किया था.

हाल में कोलकाता आई मौसमी ने फ़िल्मों में अपनी वापसी और भावी योजनाओं पर लंबी बातचीत की. पेश हैं उसके मुख्य अंश:

आप लंबे अरसे बाद किसी फ़िल्म में नजर आई हैं. इतनी देर क्यों हुई?

इसकी कई वजह थीं. पारिवारिक व्यस्तता, बेहतर फ़िल्मों का आफर नहीं मिलना और मेरा आलसी होना.

आपने कई यादगार भूमिकाएं की हैं. लेकिन बावजूद इसके आप ज्यादा फ़िल्मों में नजर नहीं आईं?

इसकी वजह यह है कि मै जरा आलसी हूं. मैं अपने करियर के प्रति कभी ज्यादा गंभीर नहीं रही. यही वजह है कि मैंने अपने करियर में बेहद चुनिंदा भूमिकाएं की हैं. इसका एक फायदा यह हुआ कि मैंने जो भी किया खूब दिल लगा कर किया.

अपर्णा सेन के निर्देशन में काम करने का अनुभव कैसा रहा?

मैं हमेशा उनके साथ काम करना चाहती थी. लेकिन पहले इसका संयोग ही नहीं बना. इस फ़िल्म की शूटिंग की शुरूआत में भी मैं काफी डर गई थी. मैंने अपर्णा से कहा भी कि वे मेरी जगह किसी और को चुन लें. लेकिन वे मेरे साथ काम करने पर ही अड़ी रहीं. यह एक शानदार अनुभव रहा.

Image caption मौसमी चटर्जी ने स्नेहमय (राहुल बोस) की मौसी का किरदार निभाया है.

इस फ़िल्म में आपकी भूमिका कैसी रही?

बहुत बढ़िया. मैंने स्नेहमय (राहुल बोस) की मौसी का किरदार निभाया है. फ़िल्म में मेरा किरदार बहुत मजाकिया है. इस फ़िल्म में मुझे एक विशेष रूप दिया गया है. मुझे इस किरदार के लिए अपना वजन दोगुना करना पड़ा था. मुझे मजेदार भाषा बोलनी पड़ी और फ़िल्म में मेरी हरकतें भी काफ़ि मजेदार हैं.

एक निर्देशक के तौर पर अपर्णा सेन के बारे में आपकी क्या राय है?

मैं उनको एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर जानती थी. मुझे उनके निर्देशन में काम करने का कोई अनुभव नहीं था. लेकिन वे एक बेहतरीन निर्देशक हैं.

आपने भी तरुण मजुमदार के निर्देशन में अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया था और अब आपकी बेटी मेधा भी उनके ही निर्देशन में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू कर रही है. कैसा लगता है?

हां, यह एक संयोग है. वे बेहद प्रतिभावान निर्देशक हैं. मैंने उनके निर्देशन में ‘बालिका वधू’ के जरिए अपना करियर शुरू किया था. अब मेरी बेटी मेधा भी उनके निर्देशन में बन रही ‘भालोबासार अनेक नाम' (प्यार के कई नाम) से अपना करियर शुरू कर रही है.

आगे की क्या योजना है?

अभी इस बारे में कुछ सोचा नहीं है. लेकिन बढ़िया निर्देशक और पटकथा मिले तो आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा.

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