दर्शकों का दिल जीतने वाली फ़िल्म

अजय देवगन
Image caption वन्स अपान ए टाइम में अजय देवगन सुल्ताना की भूमिका में हैं

सत्तर के दशक में मुंबई शहर में हाजी मस्तान नाम के स्मगलर का राज था. 'वन्स अपॉन ए टाइम' उसी दिलदार सुल्तान की कहानी है जिसने मुंबई शहर को अपनी महबूबा बनाया.

एक छोटा बच्चा तूफ़ानी रात में मच्छरों की टोकरी ओढ़कर नाव में तैरते हुए एक नए शहर में आता है. और फिर बड़े संघर्ष के बाद अपने सोचे हुए मुकाम पर कामयाब होता है.

इसी दशक में हिंदी सिनेमा में एक नया मोड़ आया था. दो प्रतिभाशाली लेखक-सलीम-जावेद हर हफ़्ते सिनेमा हॉल में सुपर हिट्स देने लगे थे और मेनस्ट्रीम सिनेमा पर इनका जादू पूरी तरह से छा गया था.

'दीवार' के बाद आपराधिक दुनिया को लेकर इतने सालों में बहुत सारी फ़िल्में बनाईं गईं थीं, जैसे-सत्या, सरकार, ब्लैक फ्राइडे या गैंगस्टर.

लेकिन वन्स अपॉन ए टाइम वो पहली फ़िल्म है जिसने एक जाने-पहचाने किरदार को उसी के दशक की सिनेमा में पिरोने की कोशिश की है.

फ़िल्म का प्रोडक्शन लाजवाब है, सेट्स बिल्कुल वास्तविक हैं-लंबी गाड़ियां, बड़े घर, शोर मचाते हुए-बड़ी लाइटों वाले डिस्कोथेक, आरडी वर्मन के रीमिक्स पर झूमती छोटे कपड़े पहनी हुई लड़कियां और ब्लैकबेरी के बजाय बड़े काले डिब्बे जैसे फोन.

अच्छा अभिनय

Image caption फ़िल्म में कंगना रानौत ने भी भूमिका निभाई है

फ़िल्म के कॉस्ट्यूम उस ज़माने के फ़ैशन पर बिल्कुल सही उतरते हैं, मसलन-कमर के नीचे बंधी साड़ियां, बूफ़े वाला हेयर स्टाइल, लटकते बूंदे या लड़कों के बड़े पायजामे, बड़े कॉलर, बड़े गॉगल्स और लंबे बाल.

सारे प्रदर्शन काबिले-तारीफ़ हैं, फिर वो चाहें सहमी हुई प्राची देसाई हों या आसमान में उड़ने वाले इमरान हाशमी हों. कंगना रानावत हर फ़िल्म में कुछ नया करके हमारा दिल जीत लेती हैं-इस बार भी.

और आखिर में अजय देवगन- जो हमें कभी निराश नहीं करते चाहें कितनी ही खराब स्क्रिप्ट या फ़िल्म क्यों ना हो. अच्छी फ़िल्मों में अजय एक योद्धा की तरह उभरते हैं फिर वो 'अतिथि तुम कब जाओगे' हो या 'गोलमाल'. अगर आपको लगता है कि वो कंपनी में सचमुच के डॉन लगते थे तो इस बार वो सुल्ताना बनकर आपका दिल जीत लेंगे.

इतना मुश्किल किरदार इतनी सादगी और सरलता से शायद सिर्फ़ अजय ही निभा सकते हैं....

उनकी आंखों में, बातों में,खामोशी में एक समझदारी और एक ठहराव है. अगर हाजी मस्तान जिंदा होते और खुद देखते तो उनको अपने किरदार से, फ़िल्म से या अजय के प्रदर्शन से कोई भी शिकायत नहीं होती.

सफल निर्देशन

अच्छा संगीत, क़व्वाली, सटीक कोरियोग्राफ़ और वास्तविक ऐक्शन का श्रेय जाता है फ़िल्म के डायरेक्टर मिलन लुथारिया को. मिलन ने अपने करियर की शुरुआत अजय को लेकर 'कच्चे धागे' से की थी. कुछ सफल, कुछ असफल फ़िल्मों के बाद वो एक ऐक्शन पैक्ड ड्रामा लेकर आए हैं जो थोड़ी लंबी होने के बावजूद बहुत ही दिलचस्प और रसीली कहानी है.

कहना ज़रूरी है कि फ़िल्म के असली हीरो-फ़िल्म के लेखक रजत अरोड़ा हैं. काफ़ी सालों के बाद दिल झंझोरने वाले ऐसे डायलॉग सुनने को मिले जो सलीम जावेद की पुरानी फ़िल्मों की याद दिला दें.

'वन्स अपॉन ए टाइम' दीवार और त्रिशूल जैसी बेमिसाल फ़िल्मों की याद ताजा कर देती है और "तुम खुश तो बहुत होगे आज!" जैसी लाइनें हमारे कानों में गूंजने लगती हैं.

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