'लफ़ंगे परिंदे' में दम है

नील नितिन मुकेश और दीपिका पादुकोण

इस हफ़्ते तीन फ़िल्में रिलीज़ हुईं – तरुण धनराजगीर की सारे नए कलाकारों के साथ ‘किस हद तक’, अमोल पालेकर की अंतरा माली के साथ अंग्रेज़ी फ़िल्म ‘ऐंड वंस अगेन’ और यश राज फ़िल्म्स की ‘लफ़ंगे परिंदे’.

सत्तर के दशक में गुलज़ार ने एक फ़िल्म बनाई थी ‘किनारा’ जो एक नर्तकी की कहानी थी. हेमा मालिनी एक दुर्घटना में अपनी आंखें खो देती हैं और फिर कभी नृत्य नहीं कर पातीं. नर्तकी की दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार फ़िल्म का नायक यानि जितेंद्र हेमा मालिनी को एक बार फिर स्टेज पर लाने की ठान लेता है.

‘लफ़ंगे परिंदे’ की कहानी भी ‘किनारा’ से मिलती-जुलती है.

कहानी

फ़िल्म में नंदु यानि नील नितिन मुकेश का किरदार एक चैंपियन फ़ाइटर का है और वो ये ख़तरनाक खेल आंखों पर पट्टी बांध कर खेलता है.

पिंकी पालकर यानि दीपिका पादुकोण एक ज़िंदादिल लड़की है जो उसी बस्ती में रहती है. पालकर दिन में नौकरी करती है और शाम को ‘स्केट्स’ पहन कर नृत्य का अभ्यास करती है. उसका सपना है कि वो एक बहुत बड़ी नर्तकी बने.

Image caption 'दीपिका पादुकोण जब भी पर्दे पर आती हैं तो सारा स्क्रीन जगमगा उठता है'

एक दिन एक सड़क दुर्घटना में पिंकी अपनी आंखें खो देती है. इसके बाद नंदु पिंकी को न सिर्फ़ अंधेरे में जीना सिखाता है बल्कि उसका हर सपना पूरा करना चाहता है.

ऐसा नहीं है कि हमने इससे पहले दुर्घटना या हादसे के बाद के अफ़सोस पर फ़िल्में नहीं देखीं हैं मगर आमतौर पर ऐसी फ़िल्में हमेशा त्रासदी से भरपूर होतीं हैं. ‘लफ़ंगे परिंदे’ उन सब फ़िल्मों से इसलिए अलग है क्योंकि लेखक गोपी पुथरान ने एक पुरानी कहानी को नई और सकारात्मक सोच दी है.

निर्देशक प्रदीप सरकार जिन्होंने हमें इससे पहले ‘परिणीता’ और ‘लागा चुनरी में दाग’ जैसी फ़िल्में दीं हैं, इसबार एक बेबसी की कहानी को हिम्मत की कहानी में बदलते हुए नज़र आ रहे हैं. फ़िल्म के सारे किरदार बहुत ही वास्तविक और जोशीले हैं जो फ़िल्म को और भी दिलचस्प बना देते हैं.

आर आनंद का संगीत अनोखा है.शायद पहली बार नायक और नायिका अपने ‘कॉस्ट्यूम’ बार-बार दोहराते हैं जिसका श्रेय जाता है निर्देशक के साथ-साथ कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर मोनाशी-रुशी को.

निर्देशक की हिम्मत

Image caption नील नितिन मुकेश फ़िल्म में एक 'फ़ाइटर' की भूमिका में हैं.

गोपी पुथरान के डॉयलॉग रसीले हैं और श्याम कौशल का ऐक्शन हिला देता है, मगर सबसे बेहतरीन काम कोरियोग्राफ़र यानि नृत्य निर्देशक बोस्को सीज़र का है. बोस्को ने इस फ़िल्म में बहुत ही सुंदर और लाजवाब नृत्य निर्देशन किया है.

नील नितिन मुकेश ‘जॉनी गद्दार’ और ‘न्यूयॉर्क’ के बाद एक बार फिर साबित करते हैं कि वो बहुत अच्छे कलाकार हैं मगर आख़िर में फ़िल्म का सेहरा बंधता है दीपिका पादुकोण के सर जिन्होंने एक जटिल किरदार बहुत ही सरलता से निभाया है.

दीपिका में कुछ ऐसा है कि जब वो पर्दे पर आती है तो सारा स्क्रीन जगमगा उठता है. जब वो नाचती है तो दिल चाहता है कि संगीत कभी ना रुके. जब नील और दीपिका साथ में नाचते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे दोनों बादलों में उड़ रहें हों.

‘लफ़ंगे परिंदे’ ज़रुर देखनी चाहिए नील के लिए, दीपिका के लिए, उसके नाच के लिए और प्रदीप सरकार की हिम्मत के लिए.

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