'अपने शहर में भी ‘पीपली लाइव’ हो गया हूं'

ओंकार दास मानिकपुरी
Image caption अपनी पहली फ़िल्म 'पीपली लाइव' से ओंकार दास को काफ़ी लोकप्रियता मिली है

बहुचर्चित फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ के नायक ओंकारदास मानिकपुरी अपनी फ़िल्म रिलीज होने के बाद जब से अपने घर छत्तीसगढ़ के भिलाई पहुंचे हैं, तब से हर रोज़ उनका सम्मान किया जा रहा है. इसी व्यस्तता के बीच हमने जाना ओंकारदास मानिकपुरी यानी ‘पीपली लाईव’ के नत्था का हालचाल:

मैं एक मज़दूर परिवार में पैदा हुआ हूं और मेरे मां-बाप मज़दूरी करते रहे हैं. सच कहूं तो मैं ईंट-गारों के बीच ही पला-बढ़ा हूं. पांचवीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई-लिखाई से मेरा कोई रिश्ता बचा नहीं, सो मेहनत-मजदूरी करके ही जीवन चलता रहा है.

भिलाई शहर में मैंने बतौर मज़दूर कई साल काम किए हैं. मज़दूरी से बात नहीं बनी तो सब्जी की दूकान भी लगाई और आलू प्याज भी बेचे.

हबीब तनवीर से मुलाक़ात

पहली बार साल 1999 में बीबीसी के सहयोग से आयोजित एक वर्कशाप में मुझे साक्षरता और कुष्ठ रोग पर केंद्रित एक नाटक में भाग लेने का अवसर मिला. इस वर्कशाप के समापन समारोह में हबीब तनवीर साहब मुख्य अतिथि बन कर आए थे.

नाटक में मेरा काम देखने के बाद उन्होंने मुझे रायपुर बुलवाया और वहां कुष्ठ पर ही एक नाटक सुनबहरी में मुझे काम दिया. इस तरह मैं हबीब तनवीर के ‘नया थिएटर’ से जुड़ गया.

अगर हबीब तनवीर मुझे ‘नया थिएटर’ में लेकर नहीं गए होते और आज मैं इस मुकाम पर नहीं होता.

‘पीपली लाइव’ में काम के लिए मैंने एक छोटे से रोल मछुआ के लिये ऑडिशन दिया था लेकिन ऑडिशन देखने के बाद आमिर ख़ान, अनुषा जी और महमूद फारुखी जी ने कहा कि नत्था के लिए इससे बेहतर कोई नहीं हो सकता.

इस तरह नत्था के लिये मैं चुन लिया गया.

फ़िल्म पूरी होने के बाद आमिर खान मेरे अभिनय से खुश थे. एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ओंकार को देखने के बाद मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं नत्था का रोल करूं.

शूटिंग का अनुभव फ़िल्म 'पीपली लाइव' में ओंकार दास मानिकपुरी ने नत्था की भूमिका निभाई है

‘पीपली लाइव’ की शूटिंग के पहले दिन जब कैमरा मेरे सामने था तो मैं डर गया.

फिर फ़िल्म की निर्देशक अनुषा रिजवी ने मुझे समझाया कि आप ‘नया थिएटर’ के कलाकार हैं, आप क्यों घबरा रहे हैं? यह कैमरा-वैमरा छोड़िए और आप समझिए कि आप स्टेज पर नाटक कर रहे हैं.

खैर, पहले दिन तो मैं डरा हुआ ही रहा लेकिन दूसरे दिन से डर जाता रहा. कोई ढाई महीने तक शूटिंग हुई.

थिएटर तो थिएटर है. वहां आप सीधे दर्शक से मुखातिब होते हैं. वहां आपके पास खूब स्पेस होता है. लेकिन ये भी है कि वहां री-शूट नहीं है. आपने कोई डॉयलॉग बोलने में गड़बड़ी की तो वो गया.

फ़िल्म में आप रिटेक पर रिटेक करवा सकते हैं. लेकिन यहां फ्रेम की बंदिश है कि हाथ अगर इस ऊंचाई तक उठाना है तो इसे आप उससे कम या ज़्यादा नहीं कर सकते.

नत्था के साथ कॉमेडी

फ़िल्म में नत्था से कोई नहीं पूछता कि तुम क्या चाह रहे हो. जो भी आता है, वह यही सवाल करता है कि तुम क्यों मरना चाहते हो? आत्महत्या के फैसले के बाद तुम्हें कैसा लग रहा है? कोई ये नहीं पूछता कि नत्था क्या चाह रहा है. फ़िल्म में उसके साथ तो कॉमेडी होती ही रहती है.

मुझे भी फ़िल्म में नत्था को देख कर खूब हंसी आई.

अपने शहर में लौटने के बाद मैंने फ़िल्म नहीं देखी है. टॉकीज़ में जब मैंने पहली बार ‘पीपली लाइव’ देखी तो मेरे मन में यही भाव आया कि किसी समय मैं ऐसी ही टॉकीज़ में बैठ कर फ़िल्म देखता था, आज लोग मेरी फ़िल्म देख रहे हैं.

परिवार

Image caption 'चरणदास चोर' में अभिनय करते ओंकार दास मानिकपुरी

घर में मां हैं, एक छोटा भाई है, पत्नी और तीन बच्चे हैं. पूरे परिवार ने फ़िल्म देख ली है और सब खुश हैं. बड़ी बेटी कॉलेज में है. उससे छोटा बेटा पांचवी में पढ़ रहा है. छोटी बेटी पहली कक्षा में है.

बेटे ने मेरे साथ फ़िल्म में मेरे बेटे की भूमिका निभाई है. उसे मैं कभी-कभार थिएटर में ले जाया करता था.

अपनी पत्नी सहित परिवार के दूसरे सदस्यों को भी मैं अपने शो में ले जाता रहा हूं और घर वालों ने हमेशा मेरे काम की सराहना ही की है.

मेरी पत्नी को भी अच्छा लगता है कि मैं थिएटर करता हूं. ‘पीपली लाइव’ में मेरा काम देख कर वो बहुत खुश हैं.

मेरे ख्याल से मैं पहले जैसा था, अब भी वैसा ही हूं. जीवन में भी कोई खास बदलाव नहीं आया है. हां, देखने वालों का नजरिया ज़रुर बदला है.

शहर में भी 'पीपली लाइव'

फ़िल्म में मीडिया नत्था के पीछे रहता था, अब अपने शहर में भी मैं वास्तव में ‘पीपली लाइव’ हो गया हूं. मीडिया लगातार घेरे रह रहा है.

फ़िल्म रिलीज होने के बाद जिस दिन मैं मुंबई से लौटा, उस दिन मेरे मुहल्ले में जितने लोग उमड़े, उनको संभाल पाना मुश्किल था. अब यहां हूं तो मेरे जीजा, मेरे भांजे संभाल पा रहे हैं.

जब से मैं अपनी बस्ती में लौटा हूं, तब से हर रोज सम्मान का सिलसिला चल रहा है. मुझे अच्छा भी लग रहा है कि पहली फ़िल्म से ही लोग मुझे जानने लगे हैं, मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं.

फ़िल्म के कुछ प्रस्ताव हैं लेकिन मैंने अभी किसी को हां नहीं कहा है. फ़िल्म के बारे में मैं आमिर जी से ज़रुर सलाह लेना चाहूंगा क्योंकि फ़िल्म मेरे लिए एकदम नया माध्यम है.

सितंबर में आगरा बाजार, चरणदास चोर के मंचन की खबर है. फिलहाल तो यही व्यस्तता रहेगी.

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