बार बालाओं की दास्तान

बेनी और बबलू

कुछ साल पहले रुपहले पर्दे पर आई फ़िल्म चाँदनी बार में पहली बार मुंबई की हज़ारों बार बालाओं की ज़िंदगी में झाँकने की कोशिश की गई थी.

समय का पहिया घूमा और महाराष्ट्र सरकार ने समाज की अपेक्षित नारी के आँसू पोंछकर उसकी समस्या के समाधान की जगह उसे और गहरी खाई में धकेलने का ज़िद्दी क़दम उठाते हुए, लेडीज़ बीयर बारों पर प्रतिबंध लगा दिया.

बार-बालाओं ने अपने निर्धन, लाचार, बीमार परिवारों का बोझ ढोने का ज़रिया बना एक विकल्प खो दिया. हज़ारों बारबालाओं को उनकी मजबूरियाँ वेश्यालयों के दरवाज़े तक खींच ले गई.

कोई मसाज पार्लर में कैद होकर रह गई, किसी ने लेडीज सर्विस वाले अंधेरे बारों में अपना मुँह छिपाया और कई किस्से ऐसे भी हुए कि बर्दाश्त के बाहर होने पर किसी बारबाला ने फाँसी का फंदा गले लगा लिया.

मुंबई और आसापास के इलाक़ों में ऑर्केस्ट्रा बारों में काम करने वाली हज़ारों बारबालाओं की दर्द भरी कहानी है लेखक-निर्देशक युनूस सजावल और निर्माता उमेश चौहान की फ़िल्म- बैनी एंड बबलू.

इस फ़िल्म के एक प्रमुख कलाकार केके मेनन कहते हैं, "इस फ़िल्म की कहानी वास्तविक और आधिकारिक है. यह आपको हंसाएगी भी और सोचने पर मजबूर भी करेगी".

Image caption फ़िल्म में केके मेनन और राजपाल यादव अहम किरदार निभा रहे हैं

जहाँ इस फ़िल्म का एक पक्ष इन अभागी बारबालाओं की दयनीय, शोचनीय और दर्द भरी ज़िंदगी को बीयर बार में वेटर बने राजपाल यादव की नज़र से निरखता-परखता है, उन्हें दर्शकों से रू-ब-रू करवाता है.

वहीं अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके कलाकार केके मेनन दर्शकों को फ़ाईव स्टार होटल के उस माहौल में ले चलते हैं, जहाँ ड्रग्स का कोहरा है, अय्याशी की मखमली चादर है, नैतिकता की दुहाई देने वालों के काले चेहरे हैं, लेकिन इन सब शानों-शौकत की रौशनी से आँखें चुंधिया देते हैं.

नए चश्मे से

एक तरफ़ मजबूरी और दूसरी तरफ़ अय्याशी पर पैनी नज़र डालती बैनी एंड बबलू आपके दिलों-दिमाग़ को इस तरह झकझोरती है कि अपनी ज़िद छोड़ने के लिए तैयार हर दिमाग़ बारबालाओं की धुंधली तस्वीर को एक नया चश्मा लगा कर देखना चाहेगा.

फ़िल्म में एक अहम भूमिका निभा रहीं जानीमानी टीवी अभिनेत्री श्वेता तिवारी का कहना है, "लोगों को बियर बारों और बार बालाओं के बारे में सच्चाई का पता नहीं है. जो मीडिया में आता है वे मान लेते हैं. इस फ़िल्म से लोगों की सोच बदलेगी".

अगर सरकार ने महिलावादी झंडों के सामने सर झुकाते हुए, समाज के शरीर पर निकले फोड़े को हाथ लगाने से अपने कंधे झाड़ लिए तो अग तक 'कॉमेडी किंग राइटर' रहे युनूस सजावल ने बैनी एंड बबलू के लेखन और निर्देशन से ये साबित कर दिया है कि उनकी कलम में वो सहृदयता है, जो आपके दिलों को छू लेगी.

उनके निर्देशन की संजीदगी और चुस्ती ने आधुनिक समाज की एक जटिल समस्या को हल्के-फुल्के, आपके मन को गुदगुदाते और भावुकता भरे सशक्त दृश्यों से भरपुर इस फिल्म में दर्शकों को कहीं भी निराश नहीं होने दिया है.

अक्तूबर महीने में रिलीज होने वाली इस फिल्म में बैनी (केके मेनन) एंड बबलू (राजपाल यादव) के साथ रिया सेन और श्वेता तिवारी भी मुख्य भूमिकाओं में हैं. जबकि रुख़सार, अनिता हासानन्दानी, रिचा चड्ढा ने भी अपनी मंजी हुई भूमिकाओं से इस फ़िल्म को सजाया-सँवारा है.

जब आप अपने परिवार के साथ बैनी एंड बबलू देखकर थिएटर से निकलेंगे, इसी फ़िल्म की ग़ज़ल के बोल गुनगुना रहे होंगे और सोच रहे होंगे..

शहर से शहर...बियांबा क्यों हैं..यहाँ हर शख़्स परेशां क्यों हैं..?

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