‘नो वन....’:संगीत के स्वर तीखे और उग्र

फ़िल्म नो वन किल्ड जैसिका का पोस्टर
Image caption 'नो वन किल्ड जैसिका' एक सच्ची घटना पर आधारित फ़िल्म है.

सच्ची घटना पर आधारित फ़िल्म ‘नो वन किल्ड जैसिका’ एक राजनीतिक-आपराधिक थ्रिलर है. ऐसी फ़िल्मों में में संगीत की गुंजाइश कम ही होती है.

लेकिन अपनी प्रतिभा और प्रयोगवादी नज़रिये के चलते संगीतकार अमित त्रिवेदी फ़िल्म में संगीत की एक विशिष्ट जगह बना पाए हैं. फ़िल्म की तरह ही संगीत के तेवर उग्र और स्वर तीखे हैं, मगर फ़िर भी सुनने लायक बन पड़े हैं.

दो साल पहले आई कम बजट की फ़िल्म ‘आमिर’ अपने कलाकारों, निर्देशक और गायक-गीतकार-संगीतकार की नवोदित टीम होने के बावजूद बॉलीवुड के बड़े कैनवास पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही थी. ‘आमिर’ की वही टीम यानी निर्देशक राजकुमार गुप्ता, और संगीतकार-गायक-गीतकार जोड़ी अमित त्रिवेदी-अमिताभ भट्टाचार्य फिर से एक साथ आए हैं "नो वन किल्ड जैसिका" लेकर.

‘आमिर’ की सफलता के बाद अमित त्रिवेदी ने काफ़ी उम्मीदें जगाई थीं. पिछले दो सालों में ‘देव डी, ‘वेक अप सिड’, ‘उड़ान’ और ‘आएशा’ के संगीत के साथ अमित ने उन उम्मीदों को कायम रखा है और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किए गए हैं. इसलिये ‘नो वन किल्ड जैसिका’ के संगीत के बारे में उत्सुकता स्वाभाविक रूप से होती है.

‘दिल्ली’ एलबम का थीम सॉंन्ग कहा जा सकता है. हाल ही में दिल्ली शहर पर कुछ गीत पसंद किए गए हैं जैसे रब्बी का ‘दिल्ली हाइट्स’ और रहमान का ‘दिल्ली-6’, मगर अमित त्रिवेदी का ‘काट कलेजा दिल्ली’ शहर का एक अलग ही चेहरा पेश करता है जो जानलेवा है, हादसों का शहर है. तोशी, श्रीराम और अदिति के स्वरों में गाना असरदार बन पड़ा है.

Image caption अमित त्रिवेदी के संगीत के तेवर उग्र और स्वर तीखे हैं लेकिन फिर भी सुनने लायक है.

‘आली रे’ शायद एलबम का सबसे लोकप्रिय गीत साबित होगा. ये गीत फ़िल्म में रानी मुखर्जी के किरदार का परिचय गीत है. रानी का किरदार एक हठी, निर्भीक और दबंग पत्रकार का है और अमिताभ भट्टाचार्य अपने शब्दों में उनके किरदार के सभी तेवरों से पहचान कराते हैं. "आली रे / साली रे / झगड़ाली रे" जैसी कुछ उपमाएं बड़ी मज़ेदार भी बन पड़ी हैं.

अगला गीत ‘एतबार’ भी दिल्ली हादसे की दर्दनाक तस्वीर पेश करता है. विशाल डडलानी गीत के मूड को बख़ूबी प्रस्तुत करते हैं और उन्हें राजस्थान के लोक गायक मामे खान मांगणियार का अच्छा साथ मिला है.

’ये पल’ थोड़ा सॉफ़्ट टोन लिये हुए है. ये दिल्ली के मौका-परस्त चेहरे और बदलते रिश्तों की दास्तान के दर्द को शिल्पा राव के स्वरों में बयान करता है.

निराशावादी माहौल में आशा की एक उम्मीद लिए गीत है ’दुआ’. ये गाना ‘आमिर’ के "एक लौ" की तरह असरदार तो नहीं है मगर नई आवाजें उम्मीद जगाने में कामयाब रही हैं.

अमित त्रिवेदी के संगीत की एक विशेषता है कि उनके गीतों में अत्याधुनिक वाद्य संयोजन के साथ देहाती और देसी स्वरों का तालमेल एक अनूठा प्रभाव उत्पन्न करता है. इस एलबम में भी वो प्रभाव उभर के आया है. अमित त्रिवेदी बॉलीवुड में संगीत के स्थापित फ़्रेम्स से बाहर निकल कर एक उम्मीद जगाते हैं मगर उम्मीद ये भी की जानी चाहिए कि वे ख़ुद के स्थापित फ़्रेम में कैद हो कर नहीं रह जाएँ बल्कि हर एलबम के साथ नए आयाम स्थापित करें.

प्रयोगवादी और फ़िल्म के मूड के हिसाब से संगीत के लिये पांच में से साढ़े तीन नम्बर.

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