यमला पगला दीवाना: संगीत में दम नहीं

यमला पगला दीवाना
Image caption 'यमला पगला दीवाना' में धर्मेंद्र, सनी और बॉबी देओल की तिकड़ी.

अभिनेता धर्मेन्द्र ने इसी वर्ष फ़िल्म उद्योग में 50 साल पूरे किये हैं. वो दो साल पहले, पहली बार अपने दोनो बेटों के साथ 'अपने' में आए और अब फिर से देओल परिवार हाज़िर है 'यमला पगला दीवाना' में कॉमेडी के तड़के के साथ.

फ़िल्म का टाइटल धर्मेन्द्र के 35 वर्ष पुराने एक बेहद मशहूर गीत 'मैं जट यमला पगला दीवाना' (फ़िल्म : प्रतिज्ञा) से लिया गया है जो निस्संदेह रूप से धर्मेन्द्र का 'ब्राँड सॉन्ग' कहा जा सकता है.

ये गीत धर्मेन्द्र के कभी सौम्य, कभी गंभीर तो कभी बेहद गुस्सैल व्यक्तित्व में बसे एक मासूम मगर शरारती और खिलंदड़ बच्चे को पेश करता है. धर्मेंद्र का यही बाल-सुलभ रूप शायद आज भी दर्शकों को सबसे ज्यादा लुभाता है. और फ़िल्म के संगीत और प्रोमोज़ में भी इसी गीत को नये गीतों पर प्राथमिकता दी गई है.

Image caption फ़िल्म के आठ गानों को अनु मलिक समेत पाँच संगीतकारों ने संगीतबद्ध किया है. गाने प्रभाव नहीं छोड़ पाते.

पूरे एलबम में आठ गीत (कुल 12 ट्रैक) हैं जिनका संगीत पाँच विभिन्न संगीतकारों, अनु मलिक, राहुल सेठ, सन्देश शांडिल्य, नौमन जावेद और आर.डी.बी. ने दिया है. इतने सारे संगीतकारों के बावजूद एक-आध गाने को छोड़ दें तो पूरे एलबम का कलेवर क़रीब एक सा है.

टाइटल गीत 'मैं जट यमला पगला दीवाना' एलबम में दो बार है. पहले वर्ज़न में सोनू निगम बहुत कोशिश करते दिखाई देते हैं मगर मूल गीत में रफ़ी साब के स्तर तक पहुंचने में नाकाम रहते हैं.

अगर ये गीत सुनने लायक बना भी है तो वो मूल गीत के आकर्षण की वजह से. उम्मीद है परदे पर तीनों देओल पर फ़िल्माया ये गीत फ़िल्म की हाईलाइट साबित होगा.

अगला गीत 'चढ़ा दे रंग' एलबम को नया रंग देता है. गीत एलबम में चार बार अलग वर्ज़न्स में है. पंजाब के संगीत की महक लिए, ये धीमे धीमे से ही सही मगर असर छोड़ता है, ख़ासकर राहत फ़तेह अली ख़ान और राहुल सेठ के वर्ज़न.

Image caption फ़िल्म के म्यूज़िक लॉन्च पर धर्मेंद्र ने ख़ासतौर पर अपने दोस्त अमिताभ बच्चन को भी आमंत्रित किया था.

'प्रतिज्ञा' का मिर्ज़ा-साहिबां वाला गीत याद होगा आपको, 'उठ नींद से जाग्या मिर्ज़ा'.. नोमन जावेद के संगीत निर्देशन में ये गीत भी उसी पारंपरिक तर्ज़ पर आपको पंजाब की प्रेम कहानियों के पात्रों की बात करता नज़र आता है.

इसके बाद, 'टिंकू जिया' एलबम का 'आइटम सॉन्ग' है. अनु मलिक का संगीत असर छोड़ने में नाकाम रहा है. परदे पर भी इस गीत में बॉबी और धर्मेन्द्र की पिता-पुत्र की जोड़ी 'कजरारे' में बच्चन जोड़ी के जादू को दोहराने में नाकाम रही है.

अगले गीत 'चमकी जवानी' में अनु मलिक फिर से निराश करते हैं. गायिका ममता शर्मा इस चालू से गीत में हावी हैं और दलेर मेहंदी सहायक भूमिका में नज़र आते हैं. ये गीत भी 'कजरारे' और 'नमक' के फ़्रेम से बाहर निकलने में नाकाम रहा है.

'अंखियाँ लड़ियां बीच बाज़ार' ठीक ठाक सा गीत है और बाकी आइटम सॉन्ग्स के मुक़ाबले सुना जा सकता है.

'सौ बार' में प्रतिभाशाली संगीतकार संदेश शांडिल्य एलबम को रोमांटिक फ़्लेवर देते हैं और आंशिक राहत प्रदान करते हैं, मगर फिर भी बहुत कुछ खास पेश नहीं करता ये गीत.

Image caption पवन झा इस एलबम को देते हैं पांच में से दो नंबर.

राहुल सेठ का 'कड्ड के बोतल' भी सुखविंदर की मौजूदगी के बावजूद दमदार नहीं है. ये गीत शायद केवल इसलिये याद रखा जाएगा कि गीतकार का क्रेडिट धर्मेंद्र को दिया गया है.

पूरा एलबम कई बार सुनने के बाद भी जो गीत याद रहता है और दिमाग में गूंजता रहता है, वो है 'प्रतिज्ञा' का रफ़ी साब का ही ओरिजिनल वर्ज़न 'मैं जट यमला पगला दीवाना'. आश्चर्य की बात ये है कि निर्माता प्रोमोज़ में (और वास्तविक शूटिंग में भी) रफ़ी साब के वर्ज़न को ही उपयोग मे ला रहे हैं मगर ये वर्ज़न संगीत एलबम से नदारद है.

फिल्म के शुरुआती प्रोमोज़ से फ़िल्म के बारे में जो उम्मीद जगी थी, संगीतकारों की फ़ौज़ के बावजूद फ़िल्म का संगीत उस अपेक्षा पर पूरा उतरने में नाकाम रहा है. औसत दर्जे के इस एलबम के लिये पाँच में से दो नम्बर.

संबंधित समाचार