'फ़ालतू'-औसत और सुनने लायक गीतों का मेल

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निर्माता वाशु भगनानी की नयी फ़िल्म है ‘फ़ालतू’ (F.AL.T.U.). बॉलीबुड में ये शायद पहला मौका है जब किसी फ़िल्म का संगीत सीडी, कैसेट या रेकार्ड पर जारी करने की जगह पूरी तरह से डिजिटल फ़ॉरमेट में इंटरनेट पर डाउनलोड के तहत उपलब्ध कराया गया है.

फ़िल्म का संगीत उभरती हुई जोड़ी सचिन-जिगर ने दिया है जो संगीतकार राजेश रोशन और प्रीतम के सहायक के रूप में कई फ़िल्में कर चुके हैं. फ़िल्म के गाने समीर ने लिखे हैं जो इन दिनों बॉलीवुड संगीत के नये व्याकरण में फिर से स्थापित होने की कोशिश कर रहे हैं.

फ़िल्म के साउंडट्रैक में कुल 11 गीत हैं जो फ़िल्म की थीम और युवा ‘टारगेट ऑडियंस’ को ध्यान में रखते हुए रचे गये हैं. गीत युवाओं की मौज मस्ती के रंग लिये हुए हैं के साथ-साथ फ़िल्म की थीम पर आधारित कुछ आत्मविश्लेषण के स्वर लिये ‘सिचुएशनल’ गीत भी साउंडट्रैक में शामिल हैं.

एलबम को आतिफ़ असलम के गाये ’ले जा तू मुझे’ से एक अच्छी शुरुआत मिली है. सचिन-जिगर ने गीत को बहुत कुछ आतिफ़ की जाने पहचाने अंदाज़ के हिसाब से ही बनाया है. आतिफ़ अपने आप को दोहराते हुए भी गीत को असर देने में कामयाब रहे हैं. सचिन-जिगर का वाद्य संयोजन गीत को उचित माहौल देता है जबकि समीर के बोल आज के दौर के प्रार्थना गीत को युवाओं के अंदाज़ में प्रस्तुत करते हैं.

’रब सब से सोना’ साउंडट्रैक का अगला गीत है. ये सचिन-जिगर के संगीत पर ’प्रीतम स्कूल’ की गहरी छाप का परिचय देता है और गीत पर फ़िल्म ‘बिल्लू’ के "खुदाया ख़ैर" और ‘लव आजकल’ के "चोर बज़ारी" की छाप साफ़ नज़र आती है. नीरज श्रीधर और अपेक्षा डांडेकर के स्वरों में ये गीत एक ठीक-ठाक सा ह्ल्का-फुल्का मधुर रोमांटिक ट्रैक बन पड़ा है.

’आवाज़’ जिगर सरैय्या की आवाज़ में अगला गीत है. ‘हाई नोट्स’ पर जिगर की गायकी कहीं लड़खड़ाती नज़र आती है, मगर सचिन-जिगर का वाद्य संयोजन प्रभावी है और धुन का बहाव भी अच्छा बन पड़ा है. ए.आर. रहमान के संगीत का असर इस प्रतिभाशाली जोड़ी के संयोजन में कहीं कहीं देखने को मिलता है. "आवाज़ दो अपने दिल को, आज़ादियां हासिल हों" समीर के बोल, फ़िल्म के किसी महत्वपूर्ण मोड़ पर युवा किरदारों के आत्म विश्लेषण को बयान करते हैं.

विजय प्रकाश और प्रिया पांचाल का गाया ’गले लगा ले’ भी इसी तरह का एक और गीत है मगर ’आवाज़’ जितना प्रभावी नहीं है.

एलबम के जिस गीत में लोकप्रिय होने के सभी तत्व मौजूद हैं वो है पार्टी गीत ’चार बज गये तो क्या’.. हार्ड कौर का रैप इस गीत का बड़ा आकर्षण है हालांकि रैप कहीं- न-कहीं इसकी गति को प्रभावित करता है और इस पार्टी गीत में थिरकने का जोश कम नज़र आता है. गीत के बोल कहीं मज़ेदार हैं तो कहीं बेतुके भी, मगर युवा पीढ़ी की लाइफ़-स्टाइल के इर्द-गिर्द बुना ये गीत ‘स्लैंग’ और मुहावरों के उपयोग से लोकप्रिय होने की गुंजाइश रखता है.

’नयी सुबह’ जिगर सरैय्या के स्वर में कैम्पस रॉक है और एक औसत सा गाना है. एलबम में एक और गीत, ‘परसेन्टेज’, कैम्पस के माहौल में ले जाता है . न्यूमन पिंटो के स्वर और समीर के बोल परीक्षा में असफल होने के नतीजों और इम्तिहान के डर को मज़ेदार ढंग से प्रस्तुत करते हैं.

‘ऒ तेरी’ में फिर से समीर नें आजकल की स्लैंग को बोलों का आधार बनाया है लेकिन फिर भी एक दिलचस्प गीत बनाने में नाकाम रहे हैं.

’भूत आया’ में लैहम्बर हुसैनपुरी की गायकी मुख्य आकर्षण है और उन्ही के पुराने हिट गीत को सचिन-जिगर ने थोड़े बदले हुए अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. ‘आलतू फ़ालतू’ फ़िल्म का टाइटल गीत है और मीका के स्वरों को साथ मिला है हार्ड कौर के रैप का. ‘फ़ालतू’ बनने का गुरुमंत्र देता ये गीत बहुत प्रभावित नहीं करता.

कुल मिला कर ‘फ़ालतू’ का संगीत कुछ औसत और कुछ सुनने लायक गीतों का मेल है जो अपने विशिष्ट दर्शकों में लोकप्रिय होने के तत्व रखता है. फ़िल्म का संगीत लोकप्रिय हो रहा है और फ़िल्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

सचिन-जिगर प्रतिभाशाली हैं मगर फिर भी ’ए’ ग्रेड तक पहुंचने में उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी. ‘फ़ालतू’ का संगीत इस बात का संकेत भी देता है. संगीत के स्तर पर ‘फ़ालतू’ को लम्बे समय तक याद नहीं रखा जाएगा मगर फ़िल्म संगीत की ये नयी वितरण प्रणाली यदि आगे जाकर सफल होती है तो उस समय ये एलबम एक मील का पत्थर ज़रूर साबित हो सकता है.

नम्बरों के लिहाज़ से 2.5/5 (पाँच में से ढाई)

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