’तीन थे भाई’: औसत दर्जे का संगीत

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Image caption 'तीन थे भाई' में सुखविंदर सिंह और रंजीत बारोट का संगीत है.

’तीन थे भाई’ राकेश ओमप्रकाश मेहरा प्रोडक्शन की नई फ़िल्म है. फ़िल्म एक कॉमेडी है जिसमें ओम पुरी, दीपक डोबरियाल और श्रेयस तलपड़े तीन भाईयों की मुख्य भुमिकाओं में हैं.

फ़िल्म का संगीत सुखविंदर सिंह और रंजीट बारोट ने दिया है. हालांकि सीडी पर अलग अलग गीतों में संगीतकारों के नामों में दलेर मेहंदी और रजत ढोलकिया का भी ज़िक्र है.

गीतकार गुलज़ार हैं. राकेश ओमप्रकाश मेहरा की पहली फ़िल्म ’अक्स’ में साउंड डिजाइन रंजीत बारोट का था और इस बार उन्हें राकेश मेहरा ने संगीतकार के रूप में मौका दिया है.

हमारे यहां कामेडी फ़िल्मों में अमूमन संगीत महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाता है. किशोर कुमार की फ़िल्में और संगीत प्रधान कॉमेडी फ़िल्में ज़रूर कुछ अपवाद रही हैं.

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Image caption पवन झा के मुताबिक गुलज़ार के गीतों के बावजूद फ़िल्म का संगीत औसत से बेहतर नहीं बन पाया है.

‘तीन थे भाई’ की कहानी में भी संगीत की बहुत संभावनाएं नज़र नहीं आती हैं मगर राकेश मेहरा की फ़िल्मॊ में संगीत हमेशा महत्वपूर्ण अवयव रहा है और फिर संगीत रचना में जब नाम गुलज़ार के साथ सुखविंदर सिंह, दलेर मेहंदी के हों तो संगीत से कुछ अपेक्षाएं तो बन ही जाती हैं.

तीन भाइयों के बिगड़ते बनते रिश्तों पर आधारित इस फ़िल्म के साउंडट्रैक में कुल चार मुख्य गीत हैं और तीन अन्य ट्रैक रीमिक्स के रूप में हैं.

टाइटल गीत ’पिजन कबूतर... तीन थे भाई’ दलेर मेहंदी ने गाया है और सीडी पर संगीतकार के रूप में रजत ढोलकिया के साथ दलेर का नाम भी है.

गीत को मज़ेदार बनाने के लिए गुलज़ार ने इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी शब्दों की जुगलबंदी का जामा पहनाया है.

गीत की धुन थोड़ी धीमी है और इसकी शुरुआत बहुत कुछ इश्किया के ’इब्ने बतूता’ की याद दिलाती है. गीत तीनों भाइयों का चरित्र परिचय देता है और बोलों की वजह से कुछ मज़ेदार बन पाया है.

फिर भी गुलज़ार के बोलों में पन (pun) बहुत हैं मगर फ़न (fun) गायब है. रीमिक्स संस्करण में हार्ड कौर ने अपने रैप के साथ दलेर मेहंदी का साथ दिया है.

रंजीत बारोट और रजत ढोलकिया ने एक प्रयोगात्मक धीमा सा उदास संस्करण प्रस्तुत किया है ’फ़ुल मूड में’ बाकी दोनों संस्करणों से बेहतर हैं फिर भी बहुत असरदार नहीं है.

एलबम की एक अच्छी प्रस्तुति है सुखविंदर सिंह रचित और गाया ’आर दरिया पार दरिया’.

पंजाबी लोक संगीत के रंग लिए ये गीत किरदारों के बीते रिश्तों की कहानी कहता नज़र आता है मगर रावी पार के ज़िक्र से गुलज़ार कहीं भारत-पाकिस्तान के लोगों की दोस्ती पर भी टिप्पणी करते नज़र आते हैं खासकर "बर्फ़ पड़ी है वादी वादी, फिर से हरी करा दे.. सदियां बीतीं मुंह नहीं देखा यारों का" में.

सुखविंदर ने इसे लोकप्रिय पंजाबी पॉप और शोर शराबे से दूर रख के पारंपरिक धुन पर आधारित किया है जो इसे सुनने लायक बनाता है.

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Image caption 'तीन थे भाई' के संगीत को पवन झा देते हैं पाँच में से दो नंबर.

एलबम में सुखविंदर रचित एक और ठीक ठाक सी रचना है "चक्कर चक्कर". गायन में उनका साथ दिया है कीर्ति सगठिया ने. फिर से इस गीत में पंजाबी लोक संगीत का आधार लिया है मगर वाद्यों का शोर गीत के प्रभाव में खलल डालता है.

गुलज़ार के बोल भी गीत को एक साधारण रचना से ऊपर उठाने में नाकाम रहे हैं. गीत हार्ड कौर के रैप के साथ रीमिक्स संस्करण में भी है.

"मैं चलना भूल गया" साउंडट्रैक में एक और गीत है जिसे मोहित चौहान ने गाया है और उनका साथ दिया है सुज़ैन, विवियन और कीर्ति संगठिया ने. संगीतकार रंजीत बारोट के साथ सुखविंदर ने संगीत दिया है और गीत में वाद्य संयोजन बेहतर है.

मोहित चौहान की गायकी गीत को मूड प्रदान करती है फिर भी गीत बहुत प्रभावित नहीं करता.

कुल मिलाकर ’तीन थे भाई’ एलबम एक साधारण सी प्रस्तुति है.

टाइटल ट्रैक कुछ हद तक प्रोमोज़ की वजह से लोकप्रिय हो सकता है मगर गुलज़ार, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, सुखविंदर सिंह और दलेर मेहंदी जैसे नामों के साथ संगीत से जो उम्मीद थी उस स्तर तक एलबम पहुंच पाने में नाकाम रहा है.

रेटिंग: 2/5 (पाँच मे से दो)

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