'नहीं टिक पाएगा बॉलीवुड'

एक समारोह में बिपाशा बसु

अमरीकी राजनयिकों का मानना है कि हिंदी फ़िल्म जगत यानी बॉलीवुड के अदाकारों को दी जानेवाली भारी-भरकम रक़म, फ़िल्म बनाने में आने वाला बड़ा ख़र्च और अंडरवर्ल्ड से अपने संबंधों की वजह से बॉलीवुड फ़िल्म उद्योग लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा.

बॉलीवुड पर अमरीकी राजनयिकों की ये समीक्षा विकीलीक्स दस्तावेज़ों का हिस्सा हैं जिसे भारत के अंग्रेज़ी दैनिक 'द हिंदू' ने छापा है.

मुंबई स्थित अमरीकी दूतावास से फ़रवरी 2010 में भेजे गए दो संदेशों में विस्तार से बॉलीवुड की चर्चा की गई है.

इन संदेशों में भारतीय फ़िल्मकारों की दुनिया के दूसरे बाज़ारों में बढ़ती दिलचस्पी और हॉलीवुड के साथ मिलकर उनकी काम करने की कोशिश और उसके नतीजों का भी तफ्सील से ज़िक्र किया गया है.

हालांकि संदेश में साफ़ कहा गया है कि भारत और हॉलीवुड फ़िल्मकारों के संबंध अब तक बहुत कामयाब नहीं रहे हैं और भारतीय फ़िल्म जगत हॉलीवुड को एक पार्टनर की बजाय अभी भी संदेह की नज़र से देखता है और उसे अपना प्रतिद्वंदी मानता है.

'दुनिया भर में सबसे अधिक पैसे कमानेवाला' हॉलीवुड भारतीय फ़िल्म उद्योग में निहित विशाल संभावनाओं की तलाश करना चाहता है लेकिन बदक़िस्मती से अभी तक बॉलीवुड और हॉलीवुड के परस्पर सहयोग से बनी सभी फ़िल्में बाक्स आफ़िस पर फ़्लाप रही हैं.

आसान नहीं

संदेश में कहा गया है कि इससे लगता है कि "बॉलीवुड में घुस पाना उतना आसान नहीं है."

हॉलीवुड की मशहूर कंपनी वार्नर ब्रर्दस के प्रबंध निदेशक ब्लेज़ फर्नांडिस मानते हैं कि बड़ी भारतीय फ़िल्म कंपनियाँ हॉलीवुड का पार्टनर बनने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं.

Image caption बॉलीवुड दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म निर्माताओं में से है

उनका मानना है कि पार्टनरशिप के लिए तैयार होने पर भी बॉलीवुड कंपनियाँ हॉलीवुड को पैसा लगाने के लिए तैयार हुए साझेदार से ज़्यादा कुछ नहीं मानतीं जबकि इसके साथ-साथ उन्हें हॉलीवुड के पास मौजूद स्क्रिप्ट लाईब्रेरी, प्रोडक्शन क्वालिटी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी मार्केटिंग और वितरण क्षमताओं का इस्तेमाल करके फ़ायदा उठाना चाहिए.

संदेश में कहा गया है कि भारतीय फ़िल्म उद्योग में घुसने के लिए हॉलीवुड को एक नया फ़ार्मूला तलाश करने की ज़रूरत है जो छोटे, मंझोले और बड़े बजट की मिलीजुली फिल्में बनाने में तलाश की जा सकती है.

मुबंई फ़िल्म जगत से मुलाक़ातों के दौरान राजनयिकों ने पाया कि बॉलीवुड की ज्यादातर फ़िल्में किसी तरह का बिज़नेस कर पाने में नाकाम रहती हैं.

यूटीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सिद्धार्थ रॉय कपूर के हवाले से कहा गया है कि वर्ष 2009 में रिलीज़ हुई फ़िल्मों से महज़ पाँच प्रतिशत ने कोई मुनाफ़ा कमाया था.

संदेश में यश राज फिल्म के अधिकारी आशीष सिंह के हवाले से कहा गया है कि बॉलीवुड की फ़िल्मों के मुनाफ़ा न कमा पाने की वजह फ़िल्म निर्माण में ख़र्च की गई भारी-भरकम रक़म होती है.

पूरे ख़र्च का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा तो मुख्य अदाकारों की फ़ीस ही होती है और वो मानते है कि आने वाले दिनों में अगर प्रोडक्शन ख़र्च में 40 फ़ीसदी की कटौती नहीं हुई तो मुबंई फ़िल्म जगत लंबे समय तक टिका नहीं रह पाएगा.

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