कशमकश - टैगोर को सुरीली श्रद्धांजलि

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’कशमकश’ मुक्ता आर्ट्स की नई प्रस्तुति है, जो रवीन्द्र नाथ टैगोर की 150वीं जयंती के अवसर पर प्रदर्शित की जा रही है.

फ़िल्म रितुपर्णो घोष की बंगाली फ़िल्म ’नौका डूबी’ का हिन्दी संस्करण है जो रवीन्द्र नाथ टैगोर की इसी नाम की कृति पर आधारित है.

1912 में पहली बार प्रकाशित इस रचना पर हिन्दी समेत कई भाषाओं में अब तक बहुत फ़िल्में बन चुकी हैं रितुपर्णो घोष की फ़िल्म जिसकी नवीनतम कड़ी है.

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Image caption 'कशमकश' रितुपर्णो घोष की बंगाली फ़िल्म 'नौका डूबी' का हिंदी संस्करण है.

फ़िल्म का संगीत संजॉय दास और राजा नारायण देब की जोड़ी ने दिया है. हिंदी संस्करण ’कशमकश’ के गीत गुलज़ार ने लिखे हैं.

एलबम में कुल पाँच गीत हैं. चूंकि फ़िल्म रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी पर आधारित है, इसके संगीत और गीतों पर भी रवीन्द्र संगीत का खासा असर देखा जा सकता है.

एलबम को एक बहुत मधुर शुरुआत मिलती है 'मनवा आगे भागे रे, बांधूं सौ सौ तागे रे’ से श्रेया घोषाल की शहद में डूबी आवाज़ में.

राजा-संजॉय की जोड़ी ने गीत की धुन को रवीन्द्र संगीत के मूल गीत ’खेलाघर बांधते लेगेची’ पे आधारित किया है मगर बेहतरीन वाद्य संयोजन और श्रेया की गायकी से रस माधुर्य का वातावरण रचा है.

गुलज़ार के बोल टैगोर का सीधा अनुवाद नहीं हैं, वरन टैगोर की छवियों को लेकर नई कविता गढ़ने की कोशिश है जिसमें वे कामयाब भी रहे हैं.

’खोया क्या’ एलबम की अगली प्रस्तुति है हरिहरन के परिपक्व स्वरों में. रॉक और पंजाबी पॉप के इस दौर में संजीदा किस्म के गीत फ़िल्मों से दूर होते जा रहे हैं, गीत इस बात की याद दिलाता है.

हरिहरन के स्वर और राजा-संजॉय का वाद्य संयोजन फ़िल्म के कथानक के अनुरूप एक गंभीर माहौल बनाने में सफल रहे हैं.

गुलज़ार के बोल टैगोर के दर्शन को अपने अंदाज़ में प्रस्तुत करते हैं.

श्रेया घोषाल की आवाज़ में अगला गीत है ’तेरी सीमाएं’. राजा-संजॉय ने धुन को सुचित्रा मित्रा के गाये रविन्द्र संगीत ’तोमारो अशीमे’ पे आधारित किया है.

दर्द के स्वरों को भी श्रेया की मिठास बहुत असरदार ढंग से पेश करती है. गुलज़ार मुख्य किरदार के विरह-योग को खूबसूरती से अपने शब्दों में ढालते हैं "तेरे होते दर्द नहीं था, दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था."

’नाव मेरी’ हरिहरन और मधुश्री के स्वरों में एलबम की एक और प्रस्तुति है. लिरिकल टैम्प्लेट बरसों पुराना होने के बावजूद गुलज़ार इसे अपना खास रंग देते है "डूब के शायद इस नौका को मिल जाए किनारा".

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Image caption पवन झा के मुताबिक़ एलबम की स्टार हैं श्रेया घोषाल, जिनकी आवाज़ में रवींद्र संगीत का माधुर्य है.

गीत में वाद्य संयोजन प्रभावी है और कहीं कहीं पर प्रायोगिक भी, एक बंगाली परिवेश का गीत गढने की अच्छी कोशिश है.

आनन्दलोक रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रकृति को समर्पित प्रसिद्ध रचना है जिसे अब तक कई गायक गा चुके हैं.

रवीन्द्रनाथ टैगोर को समर्पित फ़िल्म में गीत को मूल बंगाली भाषा में श्रद्धांजलि की तरह शामिल किया गया है. एलबम में इसे सुदेशना चैटर्जी और कोयर ने गाया है. गैर बांग्लाभाषियों के लिये भी गीत एक सुनने लायक रचना है.

कुल मिलाकर ’कशमकश’ का संगीत गम्भीर और संजीदा किस्म के संगीतप्रेमियों के लिये एक अच्छी ख़बर है.

हाँ, शोर-शराबे की फ़ैक्ट्रियों, डांस-फ़्लोर्स और डिस्को-थेक्स में बजने लायक इस एलबम में कुछ भी नहीं है.

खैर उनके लिये हर हफ़्ते फ़ालतू संगीत का शोर, रेडी रहता है.

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Image caption पवन झा संजॉय दास और राजा नारायण देब रचित 'कशमकश' के संगीत को पाँच में से साढ़े तीन नंबर देते हैं.

यहां सुरों के बगीचे में रवीन्द्र संगीत की दशकों पुरानी धुनें आज भी असरदार हैं और राजा-संजॉय बिना ज्यादा छेड़छाड़ के, आधुनिक वाद्य संयोजन के साथ फ़िल्म के कथानक के मुताबिक संगीत देने में कामयाब रहे हैं.

गुलज़ार के शब्द ना सिर्फ़ टैगोर को उत्कृष्ट श्रद्धांजलि देते हैं बल्कि अपना खुद का वजूद भी कायम रखने में सफल रहे हैं. मगर एलबम की स्टार हैं श्रेया घोषाल, जिनके स्वरों का माधुर्य रवीन्द्र संगीत के इस बगीचे में अपनी ना सिर्फ़ खुशबू बिखेरता नज़र आता है, बल्कि खुशबू के आने वाले बहुत दिनों तक कायम रहने की भी गवाही देता है.

चार्टबस्टर और सुपरहिट के नारों से दूर, कशमकश का संगीत, संगीत-रसिकों के लिये एक सुरीली पेशकश है.

नम्बरों के लिहाज़ से कशमकश के संगीत को 3.5/5 (पाँच मे से साढ़े तीन)

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