अमिताभ की फ़िल्मों की 'डिक्शनरी'

बुड्ढा शब्द का ज़िक्र आते ही इन दिनों लोग ये जुमला इस्तेमाल करते हुए मिल जाएँगे कि 'बुड्ढा होगा तेरा बाप'. ये अमिताभ बच्चन की नई फ़िल्म है. कहा जा रहा है कि इसमें वो फिर से एंग्री मैन जैसे किरदार में दिखेंगे जैसे वो 70-80 के दशक में करते थे.

अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों के लिए उनकी फ़िल्में एक सामाजिक दस्तावेज़ की तरह हैं जिन्हें देखकर कई बच्चे जवान हुए तो जवान बूढ़े..और समय का पहिया ऐसा कि आज के बच्चे और युवा भी उनकी फ़िल्मों से वाबस्ता हैं.

उनकी कई फ़िल्में, डायलॉग, गाने और दृश्य बहुत मशहूर हैं. मसलन फ़िल्म अग्निपथ का ये संवाद-‘विजय दीनानाथ चौहान.. पूरा नाम, बाप का नाम दीथानाथ चौहान, माँ का नाम सुहासिनी चौहान, गाँव मांडवा, उम्र 36 साल, नौ महीना, आठ दिन, 16वां घंटा चालू है.’

साल दर साल उनके चाहनेवालों ने ऐसे संवादों, गानों को समेट कर अपनी एक अलग शब्दावली बना ली है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल भी करते हैं.

कुछ ऐसे ही विचारों को समेटती लेखिका भावना सोमाया की नई किताब आई है 'अमिताभ लेक्सिकन'..जिसे अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों और दृश्यों की डिक्शनरी कहा जा सकता है.

इस तरह की किताब लिखने के पीछे सोच के बारे में भावना सोमाया बताती हैं, "एक बार ऐसा हुआ कि हम दोस्त लोग बैठे हुए थे और किसी ने अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग इस्तेमाल कर अपनी बात कही. बदले में सामने वाले ने भी अमिताभ बच्चन के ही डायलॉग में जवाब दिया और एक सिलसिला सा शुरु हो गया. तभी मैने सोच लिया कि बच्चन जी पर एक डिक्शनरीनुमा किताब लिखूँगी."

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शब्दों का खेल

किताब उन लोगों की पसंद की है जो हिंदी सिनेमा प्रेमी या अमिताभ प्रशंसक हैं. ये पुस्तक एक अंताक्षरी या किसी गेम की तरह है जहाँ आप कोई पन्ना खोलिए और एक शब्द चुनिए. और फिर अपनी कल्पना के जाल से उस शब्द के इर्द-गिर्द अमिताभ की फ़िल्मों, संवादों, गानों, दृश्यों का ताना-बाना बुनिए...और अमिताभ प्रशंसकों के पास इन चीज़ों का खज़ाना है.

जैसे कीड़ा (worm) शब्द आते ही याद आता है फ़िल्म 'हम' का ये संवाद- ‘इस दुनिया में दो तरह का कीड़ा होता है, एक वो जो कचरे से उठता है, और दूसरा वो जो पाप की गंदगी से उठता है’… जब कोई नाम (name) पूछता है तो ज़हन में आता है 'शोले' का 'जय' जो पूछता है 'तेरा नाम क्या है बसंती?'

किताब में अलग-अलग शब्दों को अमिताभ की फ़िल्मों के यादगार दृश्यों से भी जोड़ा गया है. मिसाल के तौर पर सिक्का शब्द (coin) याद दिलाता है ‘शोले’ का वो सिक्का जो दोनों ओर से एक जैसा है और उसे उछाल कर 'जय', 'वीरु' को 'गब्बर' के आदमियों से दूर भेज देता है और ख़ुद मौत को गले लगा लेता है.

इन जाने-पहचाने दृश्यों के अलावा कई शब्द ऐसे हैं जो सहजता से बिग बी से जुड़ी किसी चीज़ की याद नहीं दिलाते बल्कि आपको यादों का पिटारा टटोलना पड़ता है...गाड़ी (cab) से याद आता है फ़िल्म ‘ख़ुद्दार’ का सीन..फ़िल्म में अमिताभ को अपनी टैक्सी से बेहद प्यार है लेकिन कर्ज़ा चुकाने के लिए उसे बेचना पड़ता है...बेचने से पहले एक भावुक दृश्य में वे किसी परिवार के सदस्य की तरह गाड़ी से माफ़ी माँगते हैं.

पुराना अमिताभ ज़्यादा हावी

किताब पढ़ कर फ़िल्मों से जुड़ी कई छोटी-बड़ी बातें भी ज़हन में ताज़ा होती हैं. जैसे पुस्तक में आँख (eye) शब्द के सामने उल्लेख है कि कैसे ‘मिस्टर नटवरलाल’ में अमिताभ की आँखों के क्लोज़-अप दृश्य पर फ़िल्म के क्रेडिट रोल होते हैं.

किताब पढ़कर इस बात का एहसास होता है कि नई फ़िल्मों के मुकाबले अमिताभ की पुरानी फ़िल्मों के संवादों का ज़िक्र ज़्यादा है. शायद अब फ़िल्मों में ऐसे जानदार डायलॉग होते ही नहीं या शायद ज़हन में पुराने अमिताभ वाली छवि ज़्यादा गहरी है.

भावना सोमाया का कहना है कि किताब के ज़रिए ये बात सामने आती है कि समय के साथ अमिताभ के किरदार, किरदारों की सोच और उनके साथ दिखाया जाने वाला तामझाम बदला है. वे बताती हैं, " जैसे 80 के दशक में आई फ़िल्म शक्ति में अमिताभ अपने पिता दिलीप कुमार के प्यार के लिए तरसते रहते हैं और बाग़ी बन जाते हैं. लेकिन 2006 में आई फ़िल्म वक़्त दे रेस अगेंस्ट टाइम में हालात ऐसे हैं कि अमिताभ एक ऐसे पिता हैं जिनका बेटा अक्षय कुमार उनके प्यार के लिए तरसता रहता है."

साहित्यिक या जीवनी वाली शैलियों से परे ये मुख्यत एक हल्के-फुल्के अंदाज़ वाली किताब है जिसमें फ़िल्मों से जुड़े रोचक रंगीन स्केच भी हैं. हालांकि भावना सोमाया कहती हैं इसे लिखना आसान नहीं रहा.

यहाँ ये कहना ज़रूरी होगा कि किताब उन लोगों के मिज़ाज की ज़्यादा है जो अमिताभ के मुरीद हैं...जिसे पसंद आए वो एक गेम की तरह खेलते हुए इसमें अपनी कल्पना के मुताबिक बिग बी से जुड़े नए संवादों, नए दृश्यों, गानों के रंग भर सकते हैं.

(किताब का कवर और अंदर की तस्वीरें मशहूर फ़ोटोग्राफ़र गौतम राज्याध्यक्ष की हैं.)

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