जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल

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Image caption 22 जुलाई को महान गायक दिवंगत मुकेश का 88वां जन्मदिन है.

बात सन 1940 के आस पास की है. दिल्ली की एक शादी, जहां 16-17 साल के एक ख़ूबसूरत नौजवान से के एल सहगल के गीत सुनाने की मिन्नत की जा रही थी. नौजवान ने एक के बाद एक सहगल के गीतों से शादी में समां बांध दिया.

बारात में एक शख्स और था जो नौजवान के गीतों को बड़ी तन्मयता के साथ सुन रहा था. नौजवान गायक थे मुकेश और उस ख़ास श्रोता का नाम था मोतीलाल, जो उस दौर के सबसे बड़े अभिनेताओं में शुमार किए जाते थे.

मोतीलाल ने मुकेश को मुंबई आने का आमंत्रण दिया. बस वहीं से शुरु हुआ मुकेश की संगीत यात्रा का सफ़र, और तब से आज तक मुकेश की आवाज़ का जादू श्रोताओं के ज़ेहन में आज तक कायम है.

वादे के मुताबिक मुकेश मुंबई पहुंचे, आंखों में कहीं गायक-अभिनेता बनने के ख़्वाब लेकर. वादे के मुताबिक मोतीलाल ने उनके इस ख़्वाब को परवाज़ दी.

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Image caption एक कॉन्सर्ट के दौरान मुकेश और लता मंगेशकर.

मुकेश को पहला मौका मिला 1941 में 'निर्दोष' में मुख्य अभिनेता के तौर पर. साथ में अभिनेत्री थीं नलिनी जयवंत.

इसी फ़िल्म में उन्होंने अपना पहला गीत गाया अशोक घोष के संगीत निर्देशन में, 'दिल है बुझा हुआ तो फ़स्ले बहार क्या'. इसी फ़िल्म में नलिनी जयवंत के साथ दो और गीत भी थे.

फ़िल्म आशातीत सफलता हासिल नहीं कर पाई और मुकेश ने इसके बाद बतौर मुख्य अभिनेता एक और फ़िल्म की दुख-सुख (1942), मगर वो भी असफल रही. मुकेश को अभिनेता के तौर पर नकार दिया गया था मगर एक गायक के रूप में पहचान मिलनी शुरु हो गई थी.

मुकेश ने अपना ध्यान गायन की ओर लगा दिया. गायक के रूप में पहली बड़ी सफलता मिली अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'पहली नज़र' (1945) में और गीत था 'दिल जलता है तो जलने दे' जो मोतीलाल के पर ही फ़िल्माया गया था.

गीत रिकॉर्ड होने के बाद निर्माता मज़हर खान को पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे फ़िल्म में ना रखने का निर्णय कर लिया था.

बाद में बड़ी मुकेश की बड़ी मान-मनौव्वल के बाद वो एक हफ़्ते तक के लिये फ़िल्म में गाने को रखने पर राज़ी हुए. मगर फ़िल्म आने के बाद गीत ने ऐसी धूम मचाई कि आज फ़िल्म भले ही लोगों को याद ना हो, मगर ये गीत आज भी सुनने वालों के ज़ेहन में गूंजता रहता है.

शुरुआती दौर में मुकेश की गायकी पर केएल सहगल की गायकी का ख़ासा प्रभाव रहा. संगीतकार अनिल बिस्वास को ये श्रेय जाता है कि उन्होंने मुकेश की पहचान उनके अपने स्वरों से कराई और उनके संगीत निर्देशन में 'अनोखा प्यार' (1948) ने मुकेश को एक अलग आवाज़ के रूप में स्थापित होने में मदद की.

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Image caption महान अभिनेता राज कपूर मुकेश को अपनी आवाज़ मानते थे.

इसके बाद आई नौशाद के संगीत निर्देशन में 'अंदाज़' (1949), जिसके मुकेश के गाए गीतों (तू कहे अगर, झूम झूम के नाचो आज) ने ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल की.

मुकेश इसी दौरान एक सरला नाम की एक लड़की को दिल दे बैठे थे. सरला गुजराती थीं और मुकेश के घर वालों को ये मेल पसंद नहीं आया तो मुकेश ने घरवालों की इच्छा के विरुद्ध सरला से शादी कर ली. शादी में सरला का कन्यादान किया मोतीलाल ने.

राज कपूर की पहली फ़िल्म 'आग'(1946) में मुकेश का गीत 'ज़िंदा हूं जिस तरह' ना सिर्फ़ बेहद मक़बूल हुआ बल्कि उनके करियर में एक मील का पत्थर साबित हुआ. एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई राज कपूर के साथ और इसके बाद ताउम्र मुकेश राज कपूर की आवाज़ के रूप में जाने जाते रहे.

परदे पर राज कपूर और पार्श्व गायन में मुकेश. बरसात, आवारा, आह, श्री 420, अनाड़ी, परवरिश, फिर सुबह होगी, जिस देश में गंगा बहती है, संगम से लेकर तीसरी कसम और मेरा नाम जोकर तक गायक-अभिनेता की इस सुपरहिट जोड़ी ने एक के बाद एक कई कालजयी गीतों को जन्म दिया.

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Image caption मुकेश ने बतौर अभिनेता भी कुछ फ़िल्मों में काम किया.

उनके नग़मों की गूँज सरहदें पार कर के रूस, इस्राइल, तुर्की और ईरान तक पहुंची और आज दुनिया भर में मुकेश के चाहने वाले हैं. मुकेश के अवसान पर राज कपूर के शब्द थे 'मेरी आवाज़ चली गई, मैं गूंगा हो गया हूं'

मुकेश मुंबई पहुंचे थे गायक-अभिनेता बनने का ख़्वाब लेकर, शुरुआती असफलता के बाद जब वो गायक के रूप में स्थापित हुए तो फिर से इस ख़्वाब को आकार देने की कोशिश उन्होंने की.

1951 में फ़िल्म मल्हार का निर्माण किया. फ़िल्म माशूका(1953) में सुरैया के साथ मुख्य अभिनेता के तौर पर पर्दे पर अवतरित हुए मगर ये फ़िल्म भी असफल रही. राज कपूर की आह(1953) में एक छोटी सी भूमिका में नज़र आये.

मगर जिस फ़िल्म ने उनकी इस उड़ान को विराम दिया वो थी 1956 की ‘अनुराग’ जिसके ना सिर्फ़ वो निर्माता थे वरन मुख्य अभिनेता, गायक और संगीतकार भी मुकेश स्वयं थे. फ़िल्म बुरी तरह से असफल रही मगर दूसरी ओर उसी समय मुकेश के गाए गीत धूम मचाते रहे और असफलता की निराशा को बहुत हद तक कम करने में सफल हुए.

अनिल बिस्वास, नौशाद, एस डी बर्मन, रोशन, शंकर जयकिशन, ख़य्याम, सलिल चौधरी से लेकर जयदेव, एन दत्ता, कल्याण जी-आनंद जी, आर डी बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल तक सभी संगीतकारों के साथ अविस्मरणीय रचनाएं दीं.

अन्य महान गायकों के मुक़ाबले मुकेश ने बहुत कम गीत गाए, तक़रीबन हज़ार के करीब. लेकिन लगभग हर रंग और अंदाज़ के गीत सुनने वालों के दिलों में उन्होंने जगह बनाई.

1959 में उन्हें ‘अनाड़ी’ के लिए पहली बार सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला और इसके बाद तीन और फ़िल्म फ़ेयर उन्हें मिले. 1974 में फ़िल्म रजनीगंधा के गीत 'कई बार यूं भी देखा है' के लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

फ़िल्मों के अलावा उनके कई ग़ैर फ़िल्मी गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए. ग़ालिब की ग़ज़लों से भजनों और रामायण की चौपाइयों तक, हर रंग के गीत उन्होंने प्रस्तुत किए.

मुकेश की आवाज़ की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनके स्वर, सुनने वाले जन मानस से ऐसे संबंध स्थापित करते थे कि मानो उसकी ख़ुद की आवाज़ हो. सुनने वाले के दुख-दर्द और खुशी में शामिल हो जाते थे मुकेश के गीत. ख़ास कर उनके दर्द भरे स्वर, उदासी की ख़ुशबू बिखरते हुए दर्द में भी आनंद की अनुभूति कराते थे.

कुछ आलोचकों के अनुसार मुकेश सुरों के उस्ताद नहीं थे. सी रामचन्द्र और ओ पी नैय्यर जैसे संगीतकारों ने भी मुकेश की आवाज़ पर बहुत कम भरोसा किया.

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मगर सलिल चौधरी (जो अपने समय के कठिनतम संगीतकार रहे और मुकेश के साथ बहुत सी अमर रचनाएं दीं) ने स्पष्ट रूप से कहा था "मुकेश के होठों से निकला हर शब्द मोती था, सही उच्चारण, आवाज़ का उतार चढ़ाव और मोड़ उनकी गायकी को नये आयाम देते रहे. उनके जाने के बाद अब ऐसी आवाज़ मिलनी मुश्किल है."

गीतकार डॉ हरिराम आचार्य को कुछ वर्ष पूर्व उनकी मॉरिशस यात्रा के दौरान कहीं दूर मुकेश की आवाज़ में उनकी अप्रदर्शित फ़िल्म 'भूल ना जाना' का 'ग़मे दिल किससे कहूं' सुनाई दिया.

उत्सुकतावश आवाज़ का पीछा करते हुए वे एक मकान में पहुंचे तो वहां रिकार्ड पर ये गीत बज रहा था और सुनने वाला गीत सुनते हुए रो रहा है.

बात की तो पता चला कि वो सज्जन ज़िंदगी से बहुत परेशान है और रोज़ आत्महत्या का ख़्याल उसके जे़हन में गूंजता रहता है. मगर ये गीत उसे ऐसा सहारा देता है कि वो सब कुछ भूल जाता है. ये गीत उसकी ज़िंदगी का एकमात्र सहारा है. मुकेश के बहुत से गीत हम सबकी ज़िंदगी में ऐसे ही हिस्सेदार हैं.

संगीतकार नौशाद ने मुकेश को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, “महफ़िलों के दामनों से, साहिलों के आस-पास/ ये सदा गूंजेगी सदियों तक दिलों के आस पास”. मुकेश के स्वर वक्त के कैनवास पर अमिट हस्ताक्षर छोड़ गए हैं जो सदियों तक उनके हमारे बीच होने का अहसास दिलाते रहेंगे.

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