लम्हों में होती है ज़िंदगी: गुलज़ार

गुलज़ार

कवि, गीतकार, लेखक, डायलॉग राइटर और निर्देशक गुलज़ार मानते हैं कि ज़िंदगी लम्हों से बनती है न कि बरसों से.

18 अगस्त को अपना 75वां जन्मदिन मना रहे गुलज़ार कहते हैं, “ज़िंदगी लम्हों को जोड़ कर बनाई जा सकती है, बरसों की नहीं होती. हासिल तो वो लम्हें ही हैं. उसी में मुझे ज़िंदगी के आसार ज़्यादा नज़र आते हैं बजाय कि किसी बड़े फ़लसफ़े के.”

शायद इसीलिए गुलज़ार ख़ुद को चिंतक नहीं मानते. वो कहते हैं, “मैं कोई फ़िलोसॉफ़र नहीं हूं. मेरे दिमाग़ में बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन दिल में है, इसलिए महसूस ज़्यादा करता हूं और सोचता कम हूं.”

निर्देशक बिमल रॉय के सहायक की तरह फ़िल्मी करियर शुरु करने वाले गुलज़ार कहते हैं कि उनकी फ़िल्मों में बिमल रॉय की छाप है. उन्होंने कहा, “बिमल रॉय की छाप यक़ीनन मेरी फ़िल्मों में नज़र आती है. उनके तक़रीबन सभी असिस्टेंट्स का भी यही हाल है. बिमल रॉय की ही तरह तक़रीबन सभी ने साहित्य को अपनी फ़िल्मों का आधार बनाया, चाहे वो बासु भट्टाचार्य हों या हृषिकेश मुखर्जी. मैंने भी साहित्य से कहानियां ली हैं. हां, चुनाव और इज़हार हर शख़्स का अपना अलग होता है.”

कहानी, गीत, संवाद, शायरी- साहित्य की लगभग विधा में धाक रखने वाले गुलज़ार ने आज तक कोई उपन्यास नहीं लिखा है.

इसकी वजह पूछने पर उनका कहना था, “कोशिश तो की थी लेकिन हो नहीं पाया. मुझसे वो फ़ैलाव नहीं होता. 20-30 पन्नों में कहानी ख़त्म हो जाती है, तो 100 पन्ने कैसे बनें. मैंने अपने लिखने का कोई फ़ॉर्मूला नहीं बना रखा, मैं बस ऐसा ही करता हूं.”

गुलज़ार मानते हैं कि एक लेखक के लिए ‘मैन्टल ब्लॉक’ होना बहुत आम बात है. लेकिन क्योंकि उनके पास अभिव्यक्ति के बहुत सारे माध्यम हैं इसलिए ऐसा होने पर वो एक नहीं तो दूसरे माध्यम से ख़ुद को व्यक्त कर लेता हैं.

वो कहते हैं, “ऐसा तो होता है लेकिन छह-सात महीने तक न लिख पाऊं, ऐसी अय्याशी की गुंजाइश मेरे पास नहीं है. मैं एक लेखक हूं और ये मेरी कमाई का ज़रिया है. अगर लिखूंगा नहीं तो खाऊंगा कहां से.”

अविभाजित भारत के पंजाब (अब पाकिस्तान) में जन्मे गुलज़ार के लिए विभाजन की त्रासदी एक न भुलाने वाला एहसास है. उन्होंने कहा, “विभाजन मेरी लेखनी का बहुत अहम हिस्सा है क्योंकि बहुत शुरुआती ज़िंदगी में वो दौर देखा और उसका असर आज तक है. आज भी कहीं सांप्रदायिक दंगे देखता हूं, तो मुझे विभाजन की ही याद आती है और उससे तक़लीफ़ होती है.”

( बीबीसी संवाददाता स्वाति बक्शी के साथ बातचीत पर आधारित)

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