सहमे हुए होठों को ज़ुबा देती फ़िल्म

बोल...कहने को तो ये दो अक्षरों से बना एक छोटा सा शब्द है लेकिन इसके मायने बहुत गहरे हैं.

बोल यानी आवाज़ उठाना....आवाज़ उन पुराने रिवाज़ों के ख़िलाफ़ जिनके बोझ तले ख्वाहिशें दम तोड़ देती हैं, आवाज़ उन रस्मों के ख़िलाफ़ जो नई सोच, नए सपनों को पनपने नहीं देती, आवाज़ उन घुटन भरी मान्यताओं के ख़िलाफ़ जो इंसान को इंसान नहीं समझती.

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कुछ ऐसे ही एहसास लिए पाकिस्तान की नई फ़िल्म आई है और नाम है 'बोल' जो भारत में भी रिलीज़ हुई है.

निर्देशक शोएब मंसूर की इस फ़िल्म में ऐसे मुद्दों को उठाया गया है जिनपर बात करना पाकिस्तान के कई हिस्सों में वर्जित माना जाता है जैसे- महिलाओं के अधिकार, हिजड़ों की दशा, भ्रष्टाचार और पुरुष प्रधान समाज. हैरानी की बात नहीं कि ये फ़िल्म काफ़ी चर्चा में है.

कहा जाता है कि पाकिस्तानी समाज के लिए ये फ़िल्म इतनी बोल्ड है कि फ़िल्म की वेबसाइट पर लिखा है- ‘फ़िल्म इतनी बोल्ड है कि कुछ लोगों को ये कुबूल करने में भी मुश्किल होगा कि उन्होंने ये फ़िल्म देखी है.’

पाकिस्तान जैसे समाज में औरत या हिजड़ा बनकर पैदा होना...इस विचार से ही मुझे डर लगता है...ये त्रासदी है कि धर्म का अर्थ और इसके मायने महिलाओं से शुरु होकर महिलाओं पर ही ख़त्म हो जाते हैं. अगर शहरों की पढ़ी-लिखी अमीर वर्ग की पाँच फ़ीसदी महिलाओं को छोड़ दें तो समाज के लिए बाकी 95 फ़ीसदी महिलाएँ किसी जंग के मैदान की तरह हैं जहाँ हम धर्म की पुरानी मान्यताओं को आगे बढ़ाने का काम करते हैं.

शोएब मंसूर, निर्देशक ( बोल और ख़ुदा के लिए)

इससे पहले शोएब मंसूर ने नसीरुद्दीन शाह अभिनित ‘ख़ुदा के लिए’ बनाई थी जिसे पाकिस्तान और भारत में काफ़ी सराहना मिली थी.

बोल में फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है पाकिस्तानी टीवी कलाकार हुमैमा मलिक ने. वे ज़ैनब नाम की ऐसी लड़की के रोल में है जो अपने परिवार में बहुत कुछ ग़लत होते हुए देखती है और अंतत इसके ख़िलाफ़ बोलती है.

हुमैमा बताती हैं, “ज़ैनब फ़िल्म में अपने परिवार के लिए आवाज़ उठाती है. मैं चाहती हूँ कि सारी पाकिस्तानी औरतें ऐसी हों. हमारी संस्कृति औरतों को बहुत करने की इजाज़त नहीं देता. लेकिन इस संस्कृति को बनाया भी तो हमने ही है. औरतों को कई चीज़ों की मनाही है पर क़ुरान पढ़ें तो उसमें ऐसी कई चीज़ें का ज़िक्र तक नहीं है. ये पुरुष प्रधान समाज है लेकिन हम सारी ज़िंदगी इसी तरह नहीं गुज़ार सकते.”

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

जब मैने बोल की कहानी पढ़ी तो मेरे मन में शक़ था कि ये विवादित हो सकती है. लेकिन शोएब साहब ने मुझसे कहा कि अगर आप जैसे लोग रोल नहीं करेंगे तो कौन करेगा. फिर मुझे अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ."

आतिफ़ असलम

चरमपंथ के मुद्दे को उठाती शोएब मंसूर की पिछली फ़िल्म ख़ुदा के लिए जब आई थी तो उन्हें रुढ़िवादी ताकतों का ख़ासा विरोध झेलना पड़ा था. इस बार वे मीडिया से दूर ही रहे हैं. जो उन्हें बोलना है वे फ़िल्म के ज़रिए ही बोल रहे हैं.

वे सिर्फ़ इतना कहते हैं, “पाकिस्तान जैसे समाज में औरत या हिजड़ा बनकर पैदा होना...इस विचार से ही मुझे डर लगता है...ये त्रासदी है कि धर्म का अर्थ और इसके मायने महिलाओं से शुरु होकर महिलाओं पर ही ख़त्म हो जाते हैं. अगर शहरों की पढ़ी-लिखी अमीर वर्ग की पाँच फ़ीसदी महिलाओं को छोड़ दें तो समाज के लिए बाकी 95 फ़ीसदी महिलाएँ किसी जंग के मैदान की तरह हैं जहाँ हम धर्म की पुरानी मान्यताओं को आगे बढ़ाने का काम करते हैं.”

फ़िल्म में अहम भूमिका निभाने वाले गायक-अभिनेता आतिफ़ असलम कहते हैं कि फ़िल्म साइन करते समय उनके मन में शंका था कि ये फ़िल्म विवादित हो सकती है.

आतिफ़ कहते हैं, "मेरे मन में शक़ था. लेकिन शोएब साहब ने मुझसे कहा कि अगर आप जैसे लोग रोल नहीं करेंगे तो कौन करेगा. फिर मुझे अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ."

पिछले कई दशकों से ख़राब दौर से गुज़र रही पाकिस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री में इस फ़िल्म ने कमाई के सारे पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

कहने को तो ये केवल एक फ़िल्म है लेकिन पाकिस्तानी समाज के आईने के रूप में ये कई अहम सवालों की ओर ध्यान ज़रूर खींचती है. बकौल आतिफ़ फ़िल्म बोल बहुत से सहमे हुए होठों को ज़ुबा देगी.

यहाँ फ़ैज़ अहमद फ़ैज के ये बोल याद आते हैं

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है

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