शाम से आँख में नमी सी है...

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वो कैसेट का ज़माना था. घर वालों से छिप-छिपाकर फ़िल्मी गानों की कैसेट ख़रीद कर सुनने का लुत्फ़ ही कुछ और था. फिर पता नहीं कब और कैसे फ़िल्मी गानों के साथ-साथ ग़ज़लों के कैसेट मेरे अलमारी और दिलो-दिमाग़ में घर करने लगे- जगजीत सिंह की ग़ज़लें.

“तेरे आने की जब खबर महके, तेरी खुश्बू से सारा घर महके

शाम महके तेरे तसव्वुर से, शाम के बाद फिर सहर महके.”

शायद बचपन की अट्ठखेलियों की जगह रूमानियत जैसे नए जज़्बात ले हे थे. वो जज़्बात जो नए थे, समझ में आते भी थे और नहीं भी, अनकहे, अनसुने.

न जाने ऐसे कितने ही लोग होंगे जिनकी जवाँ दिल की धड़कनों को जगजीत सिंह की ग़ज़लों में पनाह मिली है.

एक पूरी पीढ़ी जगजीत सिंह की ग़ज़लें सुनकर जवान हुई है. उन्होंने हर इंसानी जज़्बात को अपनी ग़ज़लों में जगह दी. जगजीत सिंह की ग़ज़लों और गायकी की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि सुनने वाले को उनकी हर एक ग़ज़ल अपनी ही कही-अनकही सी कहानी लगती थी.

सपनों की दुनिया

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जवां मोहबब्त के कितने हसीन सपने उनकी ग़ज़लों के ज़रिए परवान चढ़े. इनमें से कई सपने टूटे भी.

“मैं भूल जाऊँ तुम्हें यही मुनासिब है....मगर भूलना चाहूं भी तो किस तरह भूलुँ कि तुम तो फिर भी हक़ीकत हो कोई ख़्वाब नहीं.”

लेकिन इन टूटे हुए सपनों और उनके दर्द पर भी मरहम-पट्टी इन्हीं ग़ज़लों ने की. यहाँ उनकी ये ग़ज़ल यादी आती है.

“चाक जिगर के सी लेते हैं, जैसे भी हो जी लेते हैं.

दर्द मिले तो सह लेते हैं, अश्क मिले तो पी लेते हैं.

आप कहें तो मर जाएँगे, आप कहें तो जी लेते हैं.”

अपने प्यार के इंतज़ार का सफ़र हो, जुदाई का ग़म, तन्हाई के लम्हे या ज़िंदगी की दौड़ में आगे निकलने की चाहत...हर एहसास की तस्वीर जगजीत की ग़ज़लों में देखने को मिली.

ज़िंदगी की दौड़ धूप में पिसकर यही जवाँ दिल बड़े हुए. रूमानियत का रंगीनियत कुछ कम हुई और दिल पुराने लम्हों की छाँव में सुकून ढूँढने लगा तो जगजीत उन्हें काग़ज़ की कश्ती में बिठाकर बचपन की सुनहरी यादों में ले गए.सच बचपन गुज़र जाने के बाद वो यादें शायद लफ़ज़ों और संगीत में कभी इतनी मीठी नहीं लगी.

“कड़ी धूप में अपने घर से निकलना, वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना.

वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना, वो झूलों से गिरना वो गिर के संभालना.

वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफ़े, वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी.....वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश की पानी ....”

यूँ तो जगजीत सिंह से पहले भी कई महान ग़ज़ल गायक रहे हैं..कई विशुद्ध संगीत प्रेमी शायद उन गायकों को जगजीत सिंह से महान गायक मानते हैं.

उस समय कई लोगों ने ग़ज़ल के विशुद्ध रूप से दूर जाने के लिए उनकी आलोचना भी की. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि 80 और 90 के दशक में एक आम संगीत प्रेमी तक ग़ज़लों को पहुँचाने का काम जगजीत सिंह ने किया है.

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उनका लाइव कॉनसर्ट मैने भारत में भी सुना और लंदन जैसे शहर में भी सुनने का मौका मिला. हर बार आँख के कोने से टपका आँसू का क़तरा एहसास दिलाकर गया कि उनकी ग़ज़लों में आप किस कदर खो जाते हैं. ये किस्सा सिर्फ़ मेरा नहीं है. इतने बड़े हॉल में बैठे कई लोगों की आँखें नम हुईं....फिर आप भले ही दूसरों की नज़रों से बचते हुए रूमाल के किनारे से उन आँसूओं को पोंछ लेते हैं.

लंदन में बीबीसी के कार्यालय में भी जगजीत सिंह एक दफ़ा आए थे. कार्यालय में हिंदी सेवा के लोगों में ही नहीं उर्दू सेवा के लोगों में भी जगजीत सिंह को लेकर ख़ासा उत्साह था.

जगजीत सिंह की ग़ज़लों के अलफ़ाज़, उनकी आवाज़ में वो दर्द और वो अपनापन ही था जिसने तन्हा दिलों को सुकून दिया. बंद कमरे में मधम्म रोशनी में बैठकर उनकी ग़ज़ल सुनना.... उम्र के एक दौर में अपने कितने ही दोस्तों से मैने ऐसा करते हुए सुना है.

आज उम्र के उस दौर से बाहर आने के बाद कुछ लोगों को वो जज़्बात और ग़ज़लें शायद उतने हसीन न भी लगते हों, लेकिन कई आलोचनाओं के बावजूद आम लोगों को ग़ज़ल की विधा से रूठने से बचाने का काम जगजीत सिंह ने किया.

मोहब्बत, दर्द, तन्हाई, जुदाई, बचपन, तृष्णा, इंतज़ार, निराशा, जीवन, मौत....तमाम एहसासों को ग़ज़ल में ढालने वाले जगजीत को उदास शामें अब कुछ यूँ याद करेंगी....

“शाम से आँख में नमी सी है, आज फिर आपकी कमी सी है.

वक़्त रहता नहीं कहीं टिककर इसकी आदत भी आदमी सी है.”

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