खालीपन को बयां करना मुश्किल है.......

ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह
Image caption जगजीत सिंह ने दुनिया भर में ग़ज़ल को प्रचलित करने में अहम भूमिका निभाई.

‘बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गयी इक शख़्स सारे जहान को वीरान कर गया’

जगजीत सिंह नहीं रहे. उनके जाने से हुए पैदा हुए खालीपन के बारे में शायर-फ़िल्ममेकर गुलज़ार कहते हैं, "जगजीत का जाना एक पूरी दुनिया का उठ जाना है, एक दौर का उठ जाना है. बहुत बड़ी शख़्सियत आपके पास से उठकर चली जाए तो उस खालीपन को बयान करना बड़ा मुश्किल है."

भारतीय संगीत के इतिहास में एक अमिट हस्ताक्षर बन चुके जगजीत सिंह की संगीत यात्रा बचपन में ही प्रारम्भ हुई थी. उन्होंने स्कूल के दिनों से ही संगीत में रुचि दिखाई तो उनके पिता जी ने संगीत की विधिवत शिक्षा का प्रबंध किया और जगजीत सिंह ने गंगानगर में ही पं. छगन लाल शर्मा में दो वर्ष की प्रारम्भिक शिक्षा ली.उसके बाद एक और उस्ताद जमाल खान से कुछ और वर्ष हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली.

पढा़ई के लिये जालंधर पहुंचे तो वहां आकाशवाणी पर गायन करने लगे. आकाशवाणी जालंधर के लिये गायन करते करते दो बार संगीतकार अजीत मर्चेंट के लिये शबद की रिकॉर्डिंग के लिये आकाशवाणी मुंबई से आमंत्रण मिला तो वहां कई लोगों से मुलाक़ात हुई और जगजीत सिंह को लगा उनके संगीत के लिये मुंबई का कार्यक्षेत्र ज़्यादा बेहतर अवसर प्रदान कर सकता है. १९६५ में इतिहास की स्नातकोत्तर की पढ़ाई बीच में छोड़ कर मुंबई पहुंच गये, एक संगीतकार-गायक बनने का सपना लिये.

मुंबई में प्रारम्भिक दौर काफ़ी संघर्षपूर्ण रहा. एचएमवी ने उस समय उन्हें पहला अवसर दिया जब एक ईपी रिकार्ड के लिये उनकी दो रचनाएं शामिल की गई. उनकी पहली रिकॉर्डेड ग़ज़ल थी ’अपना ग़म भूल गये, तेरी जफ़ा भूल गये’. उसी दौरान जगजीत सिंह को फ़िल्मों में पहला मौका दिया संगीतकार अजीत मर्चेंट ने ही, गुजराती फ़िल्म ’बहूरूपी’ में जहां जगजीत ने एक भजन गाया ’लागी राम भजन नी लगनी’. बकौल गुजराती पत्रकार उर्विश कोठारी, जिस दिन अजीत मर्चेंट ने जगजीत सिंह का ये गीत रिकॉर्ड किया था, राज कपूर भी उसी स्टूडियो में मौजूद थे और जगजीत की आवाज़ ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि अपनी बेटी की शादी के समारोह में गाने के लिये जगजीत सिंह को आमंत्रित किया जो जगजीत की पहली सार्वजनिक प्रस्तुति थी.

लेकिन इस शुरुआत के बाद भी काम की कमी थी तो जगजीत कई पार्टियों में, क्लबों में, विज्ञापनों में गाते रहे. ऐसी ही एक पार्टी में उन्हें गाते हुए सुना चित्रा सिंह ने, जो पार्टी में थीं तो नहीं लेकिन पड़ोस के घर में रहतीं थीं और दूर से सुनते हुए ही उनकी आवाज़ से एक रिश्ता कायम कर बैठी थीं. कुछ समय बाद दोनों की एक स्टूडियो रिकॉर्डिंग में मुलाक़ात हुई जिसे एक मज़बूत रिश्ते में बदलते देर नहीं लगी. जगजीत-चित्रा की जोड़ी धीरे-धीरे ने महफ़िलों, कॉन्सर्ट्स में अपना रंग जमाने लगी थी लेकिन इसी दौरान उन्होंने प्रतिबंधित दक्षिण अफ़्रीका में आयोजित एक कॉन्सर्ट में कार्यक्रम प्रस्तुत किया तो अपने देश में ही कुछ वर्ष का प्रतिबंध झेलना पड़ा.

वर्ष 1976 के आस-पास प्रतिबंध हटने के बाद, एचएमवी ने ग़ज़ल के एक एलपी रिकॉर्ड के लिये आमंत्रित किया जो ना सिर्फ़ जगजीत-चित्रा के करियर में, वरन हिंदी ग़ैर-फ़िल्मी संगीत के क्षेत्र में भी मील का पत्थर साबित हुआ. ‘द अनफ़ोरगैटेबल्स’ नाम के इस रिकॉर्ड ने ऐसी धूम मचाई कि ग़ज़ल को अभिजात वर्ग की महफ़िलों से उठा कर आम आदमी के ड्रॉइंगरूम तक पहुंचा दिया.

ग़ज़ल को आम आदमी का संगीत बनाने के लिये जगजीत सिंह ने उसके प्रस्तुतिकरण में कुछ परिवर्तन किये. इनमें दो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन थे ग़ज़ल गायकी में शास्त्रीय संगीत की भूमिका की कमी, उसकी गायकी का सरलीकरण और दूसरा ग़ज़ल के वाद्य संयोजन में पारंपरिक सारंगी और तबले के अतिरिक्त आधुनिक वाद्यों का समायोजन, जिनमें गिटार, वॉयलिन, वाइब्राफोन, सिन्थेसाइज़र का प्रयोग था. हालांकि उन्होंने संगीत के शास्त्रीय अंग को नज़रअंदाज़ नहीं किया. शास्त्रीय अंग बरक़रार रखते हुए पाश्चात्य और आधुनिक वाद्यों का जामा पहने ग़ज़ल का ये नया रूप आम आदमी को बहुत पसंद हुआ और ग़ज़ल ने लोकप्रियता के नये आयाम छूने शुरु किये. जगजीत-चित्रा के लिये भी ये दौर बहुत सफ़ल रहा जहां एक के बाद एक उनकी कई ऐल्बम्स ने बिक्री के लिये गोल्ड डिस्क हासिल की.

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Image caption जगजीत सिंह ने कई हिंदी फ़िल्मों में भी गाया और संगीत दिया.

इसी दौर में जगजीत सिंह ने फ़िल्मों में भी संगीत देना प्रारम्भ हुआ था. बासु भट्टाचार्य की फ़िल्म आविष्कार में चित्रा सिंह के साथ क्लासिक ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ आज तक उनकी सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में गिना जाता है. लेकिन लोकप्रियता मिली फ़िल्म ‘प्रेम गीत’ से जिसमें ‘होठों से छू लो तुम’ और ‘आओ मिल जाएं हम सुगंध और सुमन की तरह’ जैसे गीत बेहद लोकप्रिय हुए. उसके बाद आई अर्थ, सितम और साथ-साथ. इसके बाद भी उन्होंने और फ़िल्मों में संगीत दिया लेकिन अधिकतर फ़िल्मों के असफ़ल होने से उनका संगीत बहुत लोकप्रिय नहीं हो पाया.

हाल के वर्षों में भी कई फ़िल्मों में उनके गीत काफ़ी लोकप्रिय हुए जिनमें खलनायक, दुश्मन, तुम बिन, जॉगर्स पार्क, वीर ज़ारा, फ़िराक़ और गांधी टू हिटलर शामिल है.

सन 1987 में दूरदर्शन के लिये गुलज़ार-निर्देशित धारावाहिक ’मिर्ज़ा ग़ालिब’ का संगीत उनके करियर में एक और मील का पत्थर साबित हुआ. बकौल गुलज़ार, इस दौर में “जगजीत सिंह ग़ालिब की आवाज़ बन गये”. इसके बाद ‘नीम का पेड़’, ‘दरार’, ‘हैलो ज़िंदगी’, ‘इंतज़ार’, और ‘सिसकी’ जैसे धारावहिकों में उनके स्वर सुनाई दिए जो आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं.

जगजीत सिंह ने अपने मार्गदर्शन में कई नये प्रतिभाशाली गायकों को ग़ज़ल गायकी में तैयार किया और गायकी के अवसर भी प्रदान किये, जिनमें विनोद सैगल, घनश्याम वासवानी, मो. वकील के नाम शामिल हैं.

दीपक पंडित, जो बरसों तक जगजीत सिंह के वॉयलिन वादक रहे, उनके संगीत निर्देशन में एक आने वाली फ़िल्म के लिये जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल सुनने का मौका हाल ही में मिला था. गुलज़ार साहब की लिखी उस ग़ज़ल के शब्द जगजीत सिंह के जाने के बाद बस ज़ेहन में अटक से गये हैं......

"आपके बाद हर घड़ी हमने, आपके साथ ही गुज़ारी है"

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