भूपेन हज़ारिका: कायम रहेगी स्वरों की गूंज

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Image caption भूपेन हज़ारिका ने निरंतर अपने संगीत से लोगों का दिल जीता.

डॉ. भूपेन हज़ारिका नहीं रहे, ख़बर आई तो अपने साथ एक लम्बी ख़ामोशी साथ लाई. ख़ामोशी उनके जाने के दर्द को बयां कर ही रही थी कि दिल में एक हिलोर सी उठी और कहीं दूर से लहरों की गूंज दिल पर हावी होती गई, भूपेन दा के गीत ज़हन में गूंजने लगे ‘आमी एक जाजाबोर’, ‘गंगा बहती हो क्यों’. यही जादू है भूपेन दा की आवाज़ का, जो उनके जाने के बाद भी उनके होने का अहसास दिला रहा है.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपेन दा ज़िंदगी भर एक सांस्कृतिक यायावर (बंजारे) की तरह कला की विभिन्न विधाओं में सफ़र करते रहे. कवि, लेखक, कहानीकार, गायक, संगीत निर्देशक, पत्रकार और फ़िल्मकार के रूप मे कला की कितनी ही विधाओं को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया. हर विधा में लोक संस्कृति में रंगे सामजिक और मानवीय मूल्य उनकी रचनाओं का मुख्य आधार रहे. असम की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मानचित्र पर लाने का उनका योगदान हो या भारत के संगीत और कला को विश्व भर में प्रचारित करने का उनका काम. सही मायने में उन्हें भारत के सांस्कृतिक राजदूत का दर्ज़ा दिलाता है.

1926 में असम के सदिया कस्बे में जन्मे भूपेन हज़ारिका बचपन से ही पढ़ाई के अतिरिक्त संगीत और साहित्य का शौक भी रखते थे. अपनी मां से उन्हें बंगाल के लोक संगीत की शिक्षा मिली और उनके सानिध्य में भूपेन दा का संगीत का शौक और परवान चढ़ा. उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में असम मे ऑल इन्डिया रेडियो के लिए पहली बार गायन किया और अगले ही वर्ष असमिया फ़िल्म इन्द्रमालती में बाल कलाकार के रूप में अभिनय और गायन का मौका भी मिला उन्हें. बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय से बीए और एमए की शिक्षा हासिल की और इसके बाद अध्यापन के साथ संगीत के शौक के लिये गुवाहाटी रेडियो में भी कुछ समय काम किया.

इन्ही दिनों उन्हें अमरीका में मास कम्यूनिकेशन पर शोध का प्रस्ताव मिला, यायावर प्रकृति के तो थे ही भूपेन दा और कोलम्बिया विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया. पांच वर्ष के अमरीका प्रवास के दौरान विभिन्न संस्कृतियों के कई वैश्विक रंगों से रूबरू हुए भूपेन दा. लेकिन जिस पल ने उनके करियर को एक नया मोड़ देने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई वो था विख्यात अमरीकी अश्वेत गायक पॉल राब्सन से उनकी मुलाकात.

पॉल राब्सन का लिखा मिसीसिपी नदी पर आधारित गीत ‘ओल्ड मैन रिवर’ उन दिनों धूम मचा रहा था. पॉल के सानिध्य में भूपेन दा ने उसी गीत को बंगाल के शब्दों और संगीत में ढाल के एक अविस्मरणीय रचना तैयार की ‘ओ गंगा बहिचे केनो’ (ओ गंगा बहती हो क्यों).

अपने अमरीका प्रवास के बाद भूपेन दा भारत लौटे तो अपने साथ कई संस्कृतियों के रंग समेटे लाए, एक वैश्विक विचारधारा के साथ और इन रंगों को अपनी सृजनात्मकता में बख़ूबी उपयोग किया भूपेन दा ने शायद इसलिये उनकी कला में उनके समकालीन कलाकारों की तुलना में बहुत विविधता मिलती है. भारत लौटने के बाद कुछ समय के लिये इप्टा से जुड़े़ और उस दौर के कई महान कलाकारों के सम्पर्क में आए. हेमंत कुमार, सलिल चौधरी, बलराज साहनी जैसे कलाकारों के साथ भूपेन दा ने संगीत और फ़िल्मों को सामाजिक प्रतिबद्धता का माध्यम बनाया.

1956 में अपनी पहली असमिया फ़िल्म ‘एरा बाटर सुर’ का निर्माण और निर्देशन किया. इप्टा के दौर में हेमंत कुमार से उनकी काफ़ी अच्छी पहचान हो गई थी और उन्होनें ही भूपेन दा को लता मंगेशकर से मिलवाया और लता मंगेशकर ने उनकी पहली ही फ़िल्म के लिये स्वर दिए जो उस दौर में एक नवोदित निर्माता-निर्देशक के लिए बड़ी बात थी लेकिन लता जी भी उनकी प्रतिभा से वाकिफ़ थीं. ‘एरा बाटर सुर’ की सफ़लता के बाद फ़िल्मकार और संगीत निर्देशक के रूप में कई फ़िल्मों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया भूपेन दा ने.

उनकी अगली तीन फ़िल्मों शकुंतला, प्रतिध्वनि, लटि-घटी को असमिया भाषा की फ़िल्म के लिये राष्ट्रपति पदक मिला. गायक के तौर पर हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में बंगाली फ़िल्म जीबॉन तृष्णा के लिये उनका गाया ‘सागर संगमे’ बेहद लोकप्रिय हुआ.

हिंदी फ़िल्मों में संगीतकार के तौर पर उनका पदार्पण हुआ 1974 में गुरुदत्त फ़िल्म्स के बैनर में बनी आरोप से जिसके ‘नैनो में दर्पण है’ और ‘जब से तूने बंसी बजाई’ जैसे मधुर गीत आज भी लोकप्रिय हैं. इसके बाद 1977 में आई चमेली मेमसाब के लिए भूपेन दा को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला. हिन्दी फ़िल्मों मे इसके बाद एक पल, रूदाली, दमन और गजगामिनी जैसी फ़िल्मों में कई यादगार रचनाएं दीं.

नब्बे के दशक में जहां हिन्दी फ़िल्म संगीत दिल-जिगर-नज़र की चालू शायरी और सरकाईलो खटिया जैसे गीतों की बाढ़ से जूझ रहा था, रूदाली का संगीत मिट्टी की ख़ुशबू लिए एक ताज़ी हवा के झोंके के साथ आया और खटिया को लोग भले ही भूल गये हों रूदाली के गीतों की याद आज भी जनमानस के ज़हन में ताज़ा है, चाहे वो राजस्थानी रंग में रंगा ‘दिल हूम हूम करे हो’ या फिर आसाम के चाय बागानों से आती आवाज़ ‘डोला रे डोला’. भूपेन दा के संगीत में लता मंगेशकर, आशा भोसले तो नियमित आवाजें थीं ही, इनके अतिरिक्त हेमंत कुमार, तलत महमूद, मो.रफ़ी, किशोर कुमार, मुकेश, सुमन कल्याणपुर जैसे गायकों ने भी भूपेन दा के निर्देशन में कई गीत गाए.

गीतकार गुलज़ार ने उनके बंगाली/असमिया गीतों का हिंदी में तर्जुमा किया जिसे भूपेन दा ने एलबम ‘मैं और मेरा साया’ में प्रस्तुत किया. भूपेन दा के संगीत में असम के लोक संगीत से लेकर वैश्विक संगीत के कई रंगों का समागम किया.

भारतीय कला और संस्कृति में अपने योगदान के लिये भूपेन दा भारत सरकार के द्वारा पद्म भूषण, दादा साहेब फ़ालके सम्मान और संगीत नाटक अकादमी सम्मनों से सम्मानित किए गए.

जब ये पंक्तियां लिख रहा हूं तो उनका वही यायावर गीत याद आ रहा है

"जहां कहीं देखे ज़िंदगी के रंग, वहीं ठहर गया

आवारगी में आवारगी को जीवन बना लिया

मैनें देखे हैं ज़मीं पर कई बुझते सूरज

जलता है जो आकाश में, वो रात का तारा हूं

हां, आवारा हूं.."

उनकी घुमक्कड़ प्रकृति देखते हुए लगता है कि अपनी आवारगी में गुम, ये यायावर यूंही टहलते टहलते किसी और सफ़र के लिये पलायन कर गया है और हमारे लिए छोड़ गया है मिट्टी की ख़ुशबू में लिपटी अनेकों अविस्मरणीय रचनाएं और अपनी आवाज़ की गूंज.. ‘गंगा बहती हो क्यों’ जैसी कालजई रचनाएं हमारे ज़हन में बहती रहेंगी शायद गंगा जब तक बहेगी तब तक. भूपेन दा की आवाज़ की गूंज़ सुनने वालों के दिलों में सालों सालों तक कायम रहेगी.

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