कैसा है डॉन 2 का संगीत

रा.वन और रॉकस्टार का तूफ़ान थमने के बाद डॉन-2, दर्शकों और फ़िल्म उद्योग के लिये अब इस साल की आने वाली सबसे बड़ी फ़िल्म है.1962 में आई शम्मी कपूर की हिट फ़िल्म 'चाइना टाउन' का रीमेक थी अमिताभ बच्चन की डॉन (1978) जिसकी रीमेक बनी शाहरुख खान की डॉन (2006) जिसका सीक्वल है डॉन-2:द चेस कन्टीन्यूज़.

फ़िल्म के प्रोमोज़ ने फ़िल्म के बारे में लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है. सीक्वल में किरदार लगभग वही हैं लेकिन पिछली तीन फ़िल्मों के मुकाबले इस फ़िल्म पर मिशन इम्पासिबल जैसी हॉलीवुड की क्राइम थ्रिलर फ़िल्मों की छाप हावी है और फ़िल्मकारों की फ़िल्म को एक नया रूप देने की कोशिश साफ़ नज़र आती है. फ़िल्म का संगीत फ़िर से शंकर-एहसान-लॉय और जावेद अख्तर की जोड़ी के जिम्मे है, जो फ़रहान अख्तर की फ़िल्मों के स्थायी स्तम्भ हैं और जिनका डॉन-1 में संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ था.

डॉन-2, शंकर-एहसान-लॉय के लिये बहुत महत्वपूर्ण फ़िल्म है, पिछले दो-तीन साल इस तिकड़ी लिये बहुत औसत से रहे हैं और ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा की आंशिक सफ़लता को छोड़ दें तो हाउसफ़ुल, वी आर फ़ैमिली, पटियाला हाउस, ज़ोक्कोमोन, गेम और आरक्षण जैसी फ़िल्मों में बासी से संगीत से उनके प्रशंसकों को निराशा ही हुई है. डॉन-2 में उनको अपनी खोई ज़मीन पाने का एक और अवसर मिला है.

शाहरुख खान के 'आ रहा हूं पलट के, मैं हूं डॉन' से एलबम की शुरुआत होती है. डॉन की वापसी के इस पैगाम में संवाद लेखक जावेद अख्तर, शायर जावेद अख्तर पर हावी हैं. संवाद की परिणिति होती है डॉन के इन्ट्रो-गीत की शक्ल में, 'ज़रा दिल को थाम लो - आ गया लौट के देखो डॉन', अनुषा मणि और विशाल डडलानी के स्वरों में. विशाल का वाइस-टेक्स्चर अनूठा है लेकिन वे इस तरह के गीतों में टाइप-कास्ट होते जा रहे हैं. गीत की धुन और संयोजन पर ‘डॉन’ और हालिया ‘गेम’ का हैंगओवर साफ़ नज़र आता है. गीत में गुंजाइश बहुत थी मगर अंत में एक औसत सी रचना साबित होता है.

'है ये माया’ एलबम की एक ठीक-ठाक सी प्रस्तुति है. शंकर-अहसान-लॉय ने गीत को एक रहस्यमय़ी माहौल देने के लिये उषा उत्थुप के स्वरों का प्रयोग किया है. उनका चयन तो सही था मगर अमल असरदार नहीं है, उषा उत्थुप की आवाज़ का पूरा दोहन नहीं कर पाए शंकर-अहसान-लॉय. रीमिक्स वर्शन भी कोई खास विशेष नहीं बन पड़ा है.

एलबम का मुख्य गीत है 'मुझको पहचान लो मैं हूं डॉन’ जो डॉन-1 के मुख्य गीत को लगभग वैसे के वैसे ही परोस कर दिया गया है. परिवर्तन के नाम पर गायक शान की जगह इस वर्शन को स्वर दिये हैं के.के. ने. डॉन-1 का डॉन घातक और चालाक होने के साथ खिलंदड़ अंदाज़ भी रखता था जो डॉन-1 में शान की गायकी में बहुत उभर के आया था. डॉन-2 के वर्शन में शान की कमी खलती है और गीत में उतना मज़ा नहीं है. रीमिक्स वर्शन की तो पूछिए मत, फ़िल्म की पंच लाइन 'डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है’ रीमिक्स में इतनी बार दोहराई गई है कि सुनने वाले का धैर्य जवाब दे जाता है मगर पंच लाइन फ़िर भी खत्म नहीं होती और गीत को बीच में ही फ़ारवर्ड करने को मजबूर करती है.

'दुश्मन मेरे’ शंकर महादेवन और सुनिता सारथी के स्वरों में अगली प्रस्तुति है मगर इसके संयोजन पर भी डॉन-1 के 'आज की रात’ का हैंगओवर हावी है. हालिया 'गेम’ में शंकर-एहसान-लॉय इसको दुहरा चुके हैं. एक और फ़ीकी सी प्रस्तुति है दुश्मन मेरे.

'द वाल्ट्ज़’ एक इन्स्ट्रुमेंटल थीम है, वाल्ट्ज़ है जो फ़िल्म के किसी रोचक पार्टी दृश्य की साक्षी होने की सम्भावना प्रस्तुत करती है. 'द किंग इस बैक’ फ़िल्म का थीम है सुनीता सारथी के स्वरों का उपयोग गीत को माहौल देता है लेकिन नवीनता के अभाव में ये गीत भी असर छोड़ पाने में नाकाम रहा है और फिर से वही डॉन-1 की याद दिलाता है.

डॉन-२ का संगीत कुल मिलाकर शंकर-एहसान-लॉय की फिर से एक ऐसी प्रस्तुति है जो सम्भावनाओं पर ख़री नहीं उतरी और निराश करती है. फ़िल्म का लुक काफ़ी नयापन लिए है, मगर संगीत में डॉन-1 के वही बासी स्वर परोसे गए हैं. संगीत डॉन-1 के हैंगओवर में अटका हुआ प्रतीत होता है और डेटेड सा अहसास देता है. डॉन-1 के संगीत में तो काफ़ी विविधता थी, मस्ती भी थी, मैं हूं डॉन, खई के पान बनारस वाला, मोर्या और आज की रात जैसे अनेक रंगों के गीत थे, वहीं डॉन-2, डॉन-1 के थीम गीत से बाहर नहीं निकल पाया है और अंत में नीरस/मोनोटोनस सी प्रस्तुति साबित होता है.

रेटिंग के लिहाज़ से डॉन-2 के संगीत को पांच में से दो.

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