फ़िल्मों से समाज नहीं सुधरता: दिबाकर बैनर्जी

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Image caption दिबाकर की आनेवाली फ़िल्म है 'शंघाई'

'खोसला का घोसला', 'ओए लकी, लकी ओए' और 'लव सेक्स और धोखा' जैसी फ़िल्मों के निर्देशक दिबाकर बैनर्जी कहते हैं कि फ़िल्में तो समाज का प्रतिबिम्ब होती हैं और फ़िल्मों से समाज को सुधारा नहीं जा सकता.

दिबाकर कहते हैं, ''मैं तो जान-बुझ कर अपनी फ़िल्मों के ज़रिए कोई संदेश देने की कोशिश नहीं करता. मुझे इस बात पर बिलकुल यकीन नहीं है कि फ़िल्मों के ज़रिए कुछ बदला जा सकता है. मैं फ़िल्में बनाता हूं क्योंकि मेरे दिल और दिमाग में कुछ चल रहा होता और फ़िल्में उसे व्यक्त करने का एक माध्यम हैं.''

दिबाकर कहते हैं अगर उनकी फ़िल्मों को देखकर दर्शक उनके साथ एक रिश्ता महसूस करते हैं, उनकी बात को समझ पाते हैं तो उनके लिए उतना ही काफी है.

गोवा में चल रहे 42वें अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के दौरान बीबीसी से खास बातचीत करते हुए दिबाकर ने अपनी आनेवाली फ़िल्म 'शंघाई' के बारे में भी बताया.

दिबाकर कहते हैं, ''शंघाई एक पॉलिटिकल थ्रिलर है, 1963 में ग्रीस में एक राजनीतिक हादसा हुआ था और उस हादसे ने ग्रीस को हिलाकर रख दिया था. इस हादसे पर 1966 में एक किताब प्रकाशित हुई थी, जब मैंने वो किताब पड़ी तो मुझे लगा कि इस कथानक में कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिनको भारतीय परिवेश में ढाला जा सकता है और भारत की आज की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति को दिखाया जा सकता है.''

फ़िल्म की कहानी पर रोशनी डालते हुए दिबाकर ने बताया कि ये एक छोटे से शहर की कहानी है जहां ‘एसईजे़ड' की वजह से काफी पैसा आनेवाला है. ऐसे में इस शहर में एक हादसा होता है. ये हादसा एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी, एक छोटा सा फोटोग्राफर और एक लड़की इन तीनों लोगों को एक साथ ले आता है.

दिबाकर बैनर्जी ने बताया कि इस फ़िल्म में आप अभय देओल, इमरान हाश्मी और कल्कि को एक साथ देखने वाले हैं. दिबाकर की माने तो ये फ़िल्म उनके लिए कहानी और सच्चाई का एक मिलन है.

दिबाकर ने अब तक जितनी भी फ़िल्में बनाई हैं वो सभी एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं. इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, ''मैं अपने काम से बहुत जल्दी ऊब जाता हूं और जो एक बार कर चुका हूं उसे दोहराना नहीं चाहता. वैसे भी जब एक बार कोई फ़िल्म बना लेता हूं तो बस उसमें गलतियां ही खोजता रहता हूं और अपनी अगली फ़िल्म में उन गलतियों को सुधारने की कोशिश करता हूं. ''

दिबाकर ये भी कहते हैं कि अब धीरे-धीरे फ़िल्म इंडस्ट्री बदल रही है. वो मानते हैं कि मुख्यत: तो बॉलीवुड फ़िल्में बड़े सितारों पर ही आश्रित होती हैं और लोग भी फ़िल्मों में बड़े-बड़े सितारों को ही देखना चाहते हैं लेकिन फिर भी कुछ निर्माता ऐसे हैं जो अलग तरह के सिनेमा में निवेश करना चाहते हैं.

दिबाकर कहते हैं कि अब उनके पास निर्माता आते हैं और कहते हैं कि उनकी फ़िल्म में कोई स्टार हो या न हो वो उनकी फ़िल्म में निवेश करना चाहते हैं.

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