देव आनंद: चला गया राह दिखाने वाला गाइड

 रविवार, 4 दिसंबर, 2011 को 19:38 IST तक के समाचार

लंदन की एक ठंडी शाम थी.. मैं बीबीसी के दफ़तर से ईद की एक दावत के लिए निकलने की तैयारी में थी. तभी एक दोस्त का फ़ोन आया...तुम पहुँची नहीं अब तक, देव आनंद की किताब का लॉन्च शुरु होने वाला है.

मैं इस ग़लतफ़हमी में थी कि वो कार्यक्रम एक दिन बाद होने वाला है. ख़ैर मुझे ये तय करने में शायद कुछ सैकेंड ही लगे होंगे कि ईद की दावत छोड़नी है या एक ऐसे शख़्स को पहली बार देखने-सुनने-मिलने का मौका गंवाना है जिसकी अदायगी, अंदाज़ और रूमानियत के किस्से अपने पिताजी से सुनकर मैं बड़ी हुई. ये वाक्या कुछ तीन साल पहले का है.

उन्हें देखते ही एहसास हुआ कि उम्र ने देव आनंद के चेहरे पर अपनी लकीरें छोड़ दी हैं लेकिन ज़िंदादिली का जज़्बा देव आनंद ने नहीं छोड़ा था.

आज़ाद भारत के उभरते हिंदी सिनेमा की त्रिमूर्ति में से एक अहम मूर्त थे देव आनंद. दिलीप कुमार, राज कपूर और बड़े फ़िल्मकारों के साथ मिलकर देव आनंद ने 50 और 60 के दौर में हिंदी सिनेमा को अपनी ज़मीन तलाश करने में मदद की.

'देखकर बेहोश हो जाती थी लड़कियाँ'

अहम फ़िल्में

ज़िद्दी

बाज़ी

काला पानी

मुनीमजी

काला बाज़ार

हम दोनो

गाइड

गैंबलर

ज्वील थीफ़

अभिनय का वो जुदा अंदाज़, गर्दन की वो एंठन, काली पैंट शर्ट का उनका लिबास...ये कहावत बेहद मशहूर थी कि जब जवानी में देव आनंद काली शर्ट-पैंट पहनकर बाहर निकलते थे तो लड़कियाँ बेहोश हो जाती थीं.

ज़ाहिर है ऐसा कुछ होता नहीं था जैसा कि बाद में देव आनंद ने भी एक बार बातचीत में बताया. देव साहब ने ये भी बताया कि उन्होंने अपने दौर में कभी प्रेस में जाकर इस बात से इनकार भी नहीं किया. शायद वे जानते थे कि लोग अपने सितारों को एक रूमानी छवि में क़ैद करके रखना पसंद करते हैं...तो लोगों से वो रूमानियत क्यों छीनी जाए.

देव आनंद ऐसी हस्ती थे मानो कई कलाकार मिलकर देव आनंद में समाए हुए थे. वे अभिनेता थे, निर्देशक थे, निर्माता थे, कहानी गढ़ते थे, संगीत की समझ रखते थे और शायद सबसे ख़ास बात ये थी कि अपने समय से आगे सोचने की कुव्वत रखते थे.

इसलिए उन्होंने गाइड बनाई जो अपने समय के हिसाब से काफ़ी बोल्ड मानी जाती थी और बाद में हरे कृष्णा हरे राम भी. गाइड देव आनंद के दिल के बेहद करीब थी.

कुछ साल पहले की बात है. कान फ़िल्मोत्सव में किसी समकालीन भारतीय फ़िल्म को जगह नहीं मिली. लेकिन क्लासिक्स वर्ग में जिन चंद फ़िल्मों को चुना गया उनमें से गाइड भी एक थी.

गाइड में देव आनंद ने वो दिखाने की जुर्रत की जो 50 या 60 के दशक में सिनेमा में बिरले ही देखने को मिलता था. विवाहित होते हुए एक औरत का ग़ैर मर्द के साथ रिश्ता, दोनों का एक साथ रहना, एक ऐसा हीरो जो नायक तो है पर पूरी तरह पाक-साफ़ नहीं.

समय से आगे सोचते थे देव आनंद

ज़िद्दी, काला पानी, गैंबलर, हम तुम, ज्वेल थीफ़... एक लंबी चौड़ी फ़ेहरिस्त है उनकी फ़िल्मों की. कहानी और संगीत को वो फ़िल्म की रूह मानते थे. इसीलिए देव आनंद को उनपर फ़िल्माए गीतों के ज़रिए ख़ूब याद किया जाता है.

बतौर मुख्य नायक जहाँ दिलीप कुमार और राज कपूर का सफ़र एक समय के बाद थम गया वहीं देव आनंद 70 के दौर में भी जॉनी मेरा नाम, हीरा पन्ना जैसी फ़िल्मों में जवां किरदार निभाते रहे. लोग उन्हें सदाबहार देव आनंद कहने लगे.

देव आनंद ने जितनी ज़िंदादिली से अपने फ़िल्मी करियार को जिया उतने ही ख़ुले दिल और ज़िंदादिली से अपने निजी जीवन को भी. जिस फ़िल्म उद्योग में रिश्तों को कई परतों में छिपा कर रखने की रिवायत है वहीं उन्होंने अपना जीवन खुली किताब की तरह रखा. सुरैया से अपने प्यार को वे हमेशा स्वीकार करते रहे. ये भी माना कि सुरैया ने जब मजबूरी में उनका प्यार ठुकराया तो वे कितने रोए थे.

फिर जल्द ही वे आगे बढ़ गए. एक दिन फ़िल्म की शूटिंग के बीच में ही सादगी से शादी कर ली..

'मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया'...ये एक गाना ही नहीं था, ऐसा लगता है उनकी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा था.

इस साल देव आनंद की फ़िल्म हम तुम कलर में बड़े पर्दे पर सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई तो इस मौके का फ़ायदा उठाते हुए मैने फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो देखा. देखकर अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि क्यों देव आनंद इतने दिलों की धड़कन थे.

अभी न जाओ छोड़कर

ये बात सच है कि पिछले करीब 20 सालों से देव आनंद की एक भी फ़िल्म नहीं चली. तारीफ़ पाने वाले देव आनंद को आलोचना भी मिली. कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए. ये भी कहा कि अब देव आनंद को काम छोड़ देना चाहिए....

लेकिन देव साहब की एक ख़ासियत थी..वो रुकना जानते नहीं थे और ग़ज़ब की पारखी नज़र रखते थे. कई सितारों को ढूँढने या तराशने का काम देव आनंद ने किया है.

हेमा मालिनी को स्टार बनाया देव आनंद की फ़िल्मों ने. हिप्पी कल्चर को उकरेती फ़िल्म हरे कृष्णा हरे राम में ज़ीनत अमान को भी देव आनंद ने ही ढूँढ निकाला था. मिस एशिया बनी ज़ीनत को देव आनंद ने एक पार्टी में देखा और बस उनकी छह महीने से जारी तलाश पूरी हो गई.

16 साल की टीना मुनीम को भी देव आनंद ही खोजकर लाए थे जिन्होंने बाद में अनिल अंबानी से शादी कर ली. कई साल बाद जब मौका लंदन में देव आनंद की किताब रोमैंसिंग विद लाइफ़ के लॉन्च का आया तो टीना अंबानी ख़ास तौर से लंदन आई थीं. तभी मैने पीछे से चुपके से अनिल अंबानी को आते देखा..

अनिल अंबानी ने तब माइक लेकर देव आनंद के प्रति अपना आभार फ़िल्मी अंदाज़ में कुछ यूँ जताया था, "पहले तो मैं देव साहब का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ क्योंकि उन्होंने टीना को ढूँढा. मुझे टीना को ढूँढने के लिए परदेस नहीं जाना पड़ा, टीना मुझे देश में ही मिल गई, फिर इश्क इश्क इश्क हुआ, उसके बाद वही हुआ जो हीरा-पन्ना में था, ऐसा समय भी आया जब काफ़ी दिनों तक मुझे हरे रामा हरे कृष्णा करना पड़ा, दोबारा इश्क इश्क इश्क हुआ और फिर बारी थी तेरे मेरे सपने की."

ये वही शाम थी जहाँ मैं भागते-दौड़ते ईद की दावत छोड़कर देव आनंद को पहली और आख़िरी बार देखने पहुँची थी. बीबीसी से देव आनंद का ख़ास नाता था, वे बीबीसी के लिए कई लेख लिख चुके हैं. पहले तो वे बात करने के लिए तैयार नहीं थे. फिर पता नहीं मेरे हाथ में बीबीसी का माइक देखकर या आँखों में आई चमक देखकर उन्होंने मुझे अपने पास बुला लिया..

इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती किसी ने पार्टी में चिल्लाकर पूछा देव साहब कोई कहता है आप 80 के हैं कोई कहता है आप इससे जवान हैं आख़िर आपकी उम्र क्या है ? मुस्कुराकर देव आनंद बोले...आई एम एजलेस, उम्र की सीमाओं से परे हूँ मैं....

बस कार्यक्रम वहीं ख़त्म हो गया..... जैसे कोई फ़िल्म बिल्कुल क्लाइमेक्स पर आकर ख़त्म हो जाती है. पर अभी शाम बाकी थी. मैं वहाँ से ईद की दावत में चली गई...मीठी सेंवई खाने. लेकिन उस शाम की मधुर यादों से मन पहले से ही मिठास से भरा हुआ था.

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