संगीत समीक्षा - लंडन पेरिस न्यूयॉर्क

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Image caption 'लंडन पेरिस न्यूयॉर्क' 2 मार्च को रिलीज़ हो रही है.

‘लंदन-पेरिस-न्यूयॉर्क’ बॉलीवुड में फ़रवरी के प्रेम उत्सव को मनाती एक और रोमांटिक प्रस्तुति है. एक प्रेम कहानी जो दो मुख्य किरदारों के आठ सालों के सफ़र में तीन विभिन्न पड़ावों पर प्रेम के तीन अलग-अलग रंगों की दास्तां है.

नायिका अदिति राव हैदरी के साथ फ़िल्म में नायक हैं पाकिस्तान के पॉप स्टार अली ज़फ़र जो इन दिनो बॉलीवुड में पांव जमाने की कोशिश में है हैं और खास बात ये कि फ़िल्म के नायक ही फ़िल्म के गायक, गीतकार और संगीतकार हैं. फ़िल्म के किरदारों और कहानी का ग्राफ फ़िल्म और इसके संगीत के बारें में उत्सुकता जागृत करता है. एलबम में अली ज़फ़र पाकिस्तान से अपने साथ युवा पॉप स्टार हादिया कियानी और सूफ़ी गायिका सनम मारवी को भी लाए हैं.

शीर्षक गीत 'फ़्रॉम लंडन टू पेरिस, पेरिस टू न्यूयॉर्क’ एक खुशनुमा सी रचना है. अली ज़फ़र और सुनिधि चौहान अपनी गायकी से गीत में रंग जमाने में कामयाब रहे हैं. संगीतकार के रूप में अली ज़फ़र के वाद्य संयोजन पिछले दशकों के पॉप और क्लब गीतों का माहौल बनाते हैं. गीतकार के रूप में अली ज़फ़र के बोल भी कुछ हद तक प्रभावित करते हैं. एलबम को एक अच्छी शुरुआत देता है ये शीर्षक गीत और एक क्लब डांस गीत के रूप में लोकप्रिय होने की संभावना रखता है.

'वो देखने में’ एलबम की एक और ठीक-ठाक सी प्रस्तुति है. गीत का माहौल और वाद्य संयोजन बहुत कुछ अमित त्रिवेदी और विशाल-शेखर के इस जॉनर की फ़िल्मों के संगीत की याद दिलाता है. पियानो का अच्छा उपयोग है गीत में. बोल हिंग्लिश में हैं और अली ज़फ़र तुकों से काम चला जाते हैं. गीत एक और वर्ज़न में अदिति राव हैदरी के स्वरों में भी मौजूद है. अदिति अपनी सहज गायकी से थोड़ा प्रभावित करती हैं.

अली ज़फ़र की अब तक संगीत में पहचान हल्के फ़ुल्के, डांस गीतों से बनी है जिसमें पॉप के साथ पंजाबी लोक संगीत का मेल देखने को मिलता है, 'टिंग रंग' बहुत कुछ उसी रंग की प्रस्तुति है जहां अली ज़फ़र अपने जाने पहचाने अंदाज़ में नज़र आते हैं. हालांकि इस रंग में नएपन का अभाव है, बस 'टिंग डंग डिंग डंग' का हुक ज़रूर सुनने वालों के होठों पर चढ़ने की सम्भावना रखता है.

'ठहरी सी ज़िंदगी' में अली ज़फ़र थोड़ा संज़ीदा होने की कोशिश करते हैं. गीतकार अली ज़फ़र यहां कवितामय गीत रचने की कोशिश करते नज़र आते हैं. समस्या बस एक ही है कि अली ज़फ़र की कविता दिल से निकली हुई प्रतीत नहीं होती वरन कुछ पुरानी सुनी उपमाओं और शब्दों के जोड़ से जनित लगती है और दिल को छूने में नाकाम रहती है. वाद्य संयोजन कोरस के उपयोग के साथ अच्छा बन पड़ा है और अली ज़फ़र ने काफ़ी डूब के गाने की कोशिश की है साथ स्वर हैं अदिति राव हैदरी के.

पाकिस्तानी पॉप स्टार हादिका कियानी, सूफ़ी गायिका सनम मारवी और अली ज़फ़र के स्वरों में ‘ऊह ला ला’ एक अच्छी शुरुआत के बाद निराश करता है. वाद्य संयोजन में भारी भरकम वाद्यों और टैक्नो लूप्स में स्वर असर नहीं छोड़ते. अन्त में एक साधारण सा क्लब नम्बर साबित होता है 'ऊह ला ला'.

'आजा' अली ज़फ़र के संगीत में गहराई की कमी का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है. अली ज़फ़र हल्की-फुल्की रचनाओं में तो असर दिखाते हैं लेकिन जहां गम्भीरता से सुर लगाने के कोशिश करते हैं, वहां उनके गायन की कमज़ोरियां सामने आ जाती हैं. ये गीत भी अन्त में निराश ही करता है.

कुल मिला कर 'लंडन-पेरिस-न्यूयॉर्क' का संगीत बहुत सम्भावनाओं के बावजूद प्रभावित नहीं करता. कुछ गीत अच्छे बन पड़े हैं और प्रचार में फ़िल्म को एक आधार देने में मदद कर सकते हैं लेकिन संगीत एलबम के तौर पर एलबम में गहराई की कमी है. गीतकार, संगीतकार और गायक अली ज़फ़र को संगीत क्षेत्र में मुख्यधारा का हिसा बनने के लिए अभी बहुत मेहनत करनी होगी. फ़िल्म का संगीत, फ़िल्म की सफ़लता में कोई बहुत ज्यादा योगदान का माद्दा नहीं रखता है, और खुद उसकी शेल्फ़-लाईफ़ फ़िल्म की सफ़लता पर ही निर्भर करेगी.

रेटिंग के लिहाज़ से 'लंडन-पेरिस-न्यूयॉर्क' के संगीत को 2.5/5 (पांच मे से ढाई)

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