छोड़ो मुन्नी, शीला और चमेली को !

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'चिकनी चमेली छुप के अकेली, पव्वा चढ़ा के आई' ,'भाग डीके बोस,भाग भाग डी के बोस','मुन्नी बदनाम हुई' और 'शीला की जवानी' जैसे कई गाने आए, इन गानों के बोलों पर बहस भी हुई और बात ये भी हुई कि क्या अब ये ही फ़िल्मी संगीत है.

इस बहस में संगीत बिरादरी और फ़िल्म उद्योग अकसर अपने बचाव में कहता है कि हम तो वही परोस रहे हैं जो जनता को पसंद आता है.

लेकिन मशहूर गायक सुरेश वाडेकर इस बात से बिलकुल इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वो कहते हैं कि जनता को तो जो आप परोसोगे उसे वही स्वीकार करना पड़ेगा. आप अच्छा संगीत दोगे तो जनता उसे भी सुनेगी.

वाडेकर उदहारण देते हुए कहते हैं , "जिस गांव में एक ही सब्ज़ी उगती हो तो लोग तो उसे खाएंगे ही, भूखा तो कोई रहेगा नहीं. तो हमारे सुनने वाले इतने अच्छे हैं कि जो आप देते हैं, परोसते हैं वो स्वीकार कर लेते हैं. ये तो हमारे ऊपर निर्भर रहता है कि हम उन्हें देते क्या हैं." उन्होंने ये बातें अपने एक भक्ति एलबम को लॉन्च करने के मौक़े पर कही.

सुरेश वाडेकर ने इसके बाद मीडिया को भी नहीं बख़्शा. उन्होंने कहा कि शीला, मुन्नी या चमेली जैसे गाने अगर आज हिट हैं तो इसकी बहुत बड़ी वजह मीडिया भी है.

उन्होंने मीडिया को समझाइश देते हुए कहा, "आप दिन भर शीला, मुन्नी या चमेली टीवी पर दिखाओगे. लोगों के सर पर ये गाने नाचेंगे तो लोग यही सुनेंगे ना. अच्छा संगीत, भक्ति संगीत तो आप दिखाते नहीं हो. उसके बाद सब कुछ जनता के सर पर मढ़ दिया जाता है."

हालांकि वाडेकर ये भी कहते हैं, "मैं ये नहीं बोल रहा हूं कि जलेबी बाई और चमेली जैसे गाने नहीं आने चाहिए. लेकिन जैसे खाने के बाद हम थोड़ा मीठा खाते हैं, तो इनकी मात्रा भी वैसी ही होनी चाहिए. लेकिन अगर हम इन्हें अपना कल्चर ही बना लें तो क्या किया जाए."

जब वाडेकर ख़ुद मानते हैं कि ग़लती संगीत बिरादरी की है और वो भी उसी के हिस्से हैं, तो ख़ुद इसके लिए कोई कदम उठाने की तरफ़ प्रयास क्यों नहीं करते. इसके जवाब में सुरेश कहते हैं, "हम तो सिर्फ़ गायक हैं. हमें तो जो मिलेगा वो गाना पड़ेगा. हमारे पास कोई विकल्प नहीं है."

सुरेश वाडेकर ने ये भी कहा कि वो मौजूदा दौर में अच्छे संगीत की उपेक्षा के बावजूद निराश नहीं है और अपना रियाज़ जारी रखेंगे. साल 2011 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

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