जब लता ने टिकट खरीदकर सुना जगजीत सिंह को

 बुधवार, 8 फ़रवरी, 2012 को 13:16 IST तक के समाचार

मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह को याद करते हुए लता मंगेशकर कहती हैं कि उन्होंने जगजीत सिंह के शो को लाइव सुना है और वो उनकी गायकी की मुरीद रही हैं.

जगजीत सिंह के शो को सुनने की चाहत के बारे में लता मंगेशकर ने बताया, "कई बार मैंने जगजीत सिंह जी के शो सुने हैं. एक बार मुझे पता चला कि जगजीत सिंह जी का शो है, तो मैंने तुरंत टिकट खरीदा और उन्हें सुना, वो बहुत ही अच्छा गाते थे."

आठ फरवरी को जगजीत सिंह का जन्म दिन है. उनके देहांत के बाद ये उनका पहला जन्मदिन है. पिछले साल सितंबर महीने में उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 10 अक्टूबर 2011 को उन्होंने आखिरी सांस ली.

"जगजीत सिंह ने जो ग़ज़ल गाई हैं वो लोगों को हमेशा याद रहेंगी. नए गायकों में तो ग़ज़ल गायकी का कोई ठिकाना ही नहीं है. जगजीत सिंह जी के साथ उनका स्टाइल, उनका गायन, ग़ज़लें सब उनके साथ चला गया."

लता मंगेशकर,

लता मंगेशकर कहती हैं, "मुझे उनकी बहुत सी ग़ज़ल पसंद हैं लेकिन सबसे ज़्यादा पसंद उनकी पहली ग़ज़ल, 'सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता' है. जब भी मुझे ग़ज़ल सुनने का मन होता है तो मैं आज भी उनकी यही ग़ज़ल सुनती हूं."

लता मंगेशकर ने ये भी कहा कि जगजीत सिंह बेहद ही गंभीर शख़्सियत के इंसान थे और अपने बेटे की मौत के बावजूद उन्होंने अपने आपको संभाले रखा. जब लता इस हादसे के बाद जगजीत सिंह से मिलीं तो वो बेहद दुखी ज़रूर थे लेकिन उन्होंने अपना ग़म किसी से बांटा नहीं, और अपने अंदर के जज़्बात अंदर ही रखे. लता मंगेशकर ने ये भी कहा कि वो किसी भी बात को लेकर ज़्यादा शिकायत नहीं करते थे.

उनकी गायकी के बारे में लता मंगेशकर ने कहा, "जगजीत सिंह ने जो ग़ज़ल गाई हैं वो लोगों को हमेशा याद रहेंगी. नए गायकों में तो ग़ज़ल गायकी का कोई ठिकाना ही नहीं है. जगजीत सिंह जी के साथ उनका स्टाइल, उनका गायन, ग़ज़लें सब उनके साथ चला गया."

जगजीत सिंह ने बीबीसी से कई बार बात की और उन मुलाक़ातों में उन्होंने ग़ज़लों के बदलते स्वरूप और संगीत के बदलते तौर तरीकों पर खुलकर अपनी बात कही थी.

जगजीत सिंह ने सवाल उठाते हुए कहा था," फिलहाल भारत में संगीत कहां है. आजकल जो हो रहा है मैं उसे संगीत नहीं मानता. आजकल आधा संगीत मशीन पर होता है. हमारे बोल, हमारी धुनें कुछ भी तो भारतीय नहीं है. गानों में टपोरी भाषा का इस्तेमाल होता है."
संगीत के बदलते दौर पर जगजीत सिंह ने कहा था, "मौजूदा दौर में भारतीय संगीत हो या फ़िल्म उद्योग, हर कोई पश्चिम की नकल कर रहा है. चाहे कपड़े हों, शारीरिक हावभाव हों या धुनें. "

लेकिन साथ ही वो भारतीय पारंपरिक संगीत को लेकर ख़ासे आशान्वित थे वो मानते थे कि भारत का जो पारंपरिक गीत-संगीत, शास्त्रीय संगीत वगैरह इतने दमदार हैं कि पश्चिमी सभ्यता इन्हें मिटा नहीं पाएगी और वो कभी ख़त्म नहीं होगा.

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