निर्देशकों की संगीत में रूचि ही नहीं: शान

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Image caption शान कहते हैं 70 और 80 के दशक में गायकों को जितने पैसे मिलते थे आज भी उतने ही मिलते हैं.

बॉलीवुड फिल्मों का एक एहम हिस्सा होते हैं गाने. फिल्में चाहे लोग भूल भी जाएं लेकिन गाने लोगों को याद रह जाते हैं. पर आजकल बॉलीवुड में गानों का स्तर कुछ खास अच्छा नहीं है. ऐसा खुद गायक शान मानते हैं.

शान कहते हैं, ''अक्सर फिल्म के निर्देशक फिल्म के गानों में रूचि नहीं लेते हैं, काश वो गानों पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देते. बहुत कम निर्देशक गानों की रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो आते हैं. सच कहूं तो आजकल तो संगीत निर्देशकों की भी गानों में रूचि कम हो गई है. कई बार हमें गाने दे दिए जाते हैं और कहा जाता है कि हम उसे अपने हिसाब से रिकॉर्ड कर लें.''

लेकिन इंडस्ट्री में सभी संगीत निर्देशक ऐसे नहीं हैं. शान कहते हैं, ''जो संगीत निर्देशक लम्बी दौड़ के घोड़े हैं वो हमेशा से ही अपने काम को गंभीरता से लेते रहे हैं. संगीत के हर पहलु पर बारीकी से काम करते रहे हैं.''

हिंदी फिल्मों में ये बात अब आम हो गई है कि पहले गाना किसी और गायक से गवाया जाता है और जब गाना रिलीज़ होता है तब वो किसी और ही गायक की आवाज़ में होता है. शान के साथ भी ऐसा हुआ है.

शान कहते हैं, ''हां कई बार मेरे साथ भी ऐसा हुआ है. कोई मेरा गया हुआ गाना जब रिलीज़ हुआ तो वो किसी और की आवाज़ में था. जैसे कि हाल ही में हुआ, सलमान खान की फिल्म बॉडीगार्ड का एक गाना मैंने गया था लेकिन जब वो आया तो किसी और गायक की आवाज़ में था. हम कर ही क्या सकते हैं इस बारे में.''

शान इसके पीछे की वजह से भी अनिभिग्य नहीं हैं. शान कहते हैं, ''संगीतकार और निर्देशकों के बचाव में मैं यही कह सकता हूं कि उन्होंने सोचा होगा कि एक गायक आएगा और गानों को एक खास अंदाज़ में गाएगा. और जब गायक उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो वो वही गाना किसी और से गवा लेते हैं.''

इतना ही नहीं शान कहते हैं कि ऐसा करने के पीछे एक वजह ये भी है कि गायक आजकल कम पैसों में भी गाने गा लेते हैं. वो कहते हैं, ''गायक ज्यादा पैसे नहीं मांगते हैं. 70 और 80 के दशक में गायकों को जो पैसे मिलते थे आज भी उनते ही मिलते हैं. तो कम खर्चे में संगीतकारों को ज्यादा गायक मिल जाते हैं.''

पहले के मुकाबले आजकल हिंदी फिल्मों के गानों की 'शेल्फ लाइफ' बहुत कम हो गई है. शान कहते हैं, ''इसके एक नहीं कई कारण हैं. पहले जब कोई गाना बनता था तो वो फिल्म की कहानी के हिसाब से होता था. हर संगीतकार का अपना एक अलग अंदाज़ होता था. निर्देशक और संगीतकार साथ बैठ कर फिल्म के गाने तय किया करते थे. आजकल तो गाने फिल्म की मार्केटिंग के लिए बनाए जाते हैं.''

अपनी बात को रखते हुए शान कहते हैं, ''हर कोई चाहता है एक ऐसा गाना जो एक हिट गाना हो. गाना अच्छा हो, बुरा हो इस बात से किसी को कोई लेना देना नहीं है. बस गाना सुपरहिट होना चाहिए. हर गाने के लिए संगीतकारों को यही निर्देश दिए जाते हैं.''

शान कहते हैं उनके एक संगीतकार दोस्त अक्सर इस बात पर दुख जताते हैं कि लोग उनसे कहते हैं कि उन्हें हिट गाने चाहिए. शान कहते हैं कि एक गाना हिट है या नहीं ये तो तभी पता चलेगा जब वो गाना रिलीज़ होगा.

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि आजकल अच्छे और ओरिजनल गाने बनाने की आज़ादी नहीं है. शान कहते हैं, ''लोगों ने अपने दिमाग में पहले से बिठा लिया है कि एक खास तरह का गान ही चलेगा. आजकल आप गानों में ज्यादा सधी हुई, सीखी हुई चीज़ें नहीं डाल सकते क्योंकि आप से कहा जाएगा कि लोगों को वो समझ नहीं आएगा. आप अगर ओरिजनल नोट्स बनाएंगे तो आप से कहा जाएगा कि इस धुन को तो आजतक किसी ने सुना नहीं है ये चलेगी नहीं. तो इतनी पाबंधियों में अच्छे गाने कैसे बनेंगे.''

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