खस्ताहाल हॉलीवुड चला चीन की ओर

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Image caption कुंग फ़ू पांडा जैसी फ़िल्म को चीन में काफ़ी लोकप्रियता मिली

अगर आपने हॉलीवुड की फ़िल्म ट्रांसफ़ॉर्मर-2 देखी हो तो उसका चरित्र ऑप्टिमस प्राइम चीन के शहर शंघाई में लड़ता दिखता है या फिर एनिमेशन फ़िल्म कुंग फ़ू पांडा की सफलता याद करिए. हॉलीवुड की फ़िल्मों में चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है.

वैसे अगर फ़िल्म उद्योग विशेषज्ञों की मानें तो चीनी शहर, अभिनेता और वहाँ से जुड़ी कहानियों का हॉलीवुड पर असर और बढ़ेगा ही.

वजह- घरेलू फ़िल्म दर्शकों की संख्या घट रही है और आर्थिक तंगी का शिकार हो रहे फ़िल्म निर्माताओं को चीन में लगातार बढ़ रहे फ़िल्म प्रशंसकों की संख्या आकर्षित कर रही है.

द पिंक पैंथर जैसी हॉलीवुड फ़िल्म बनाने वाली ट्रेसी ट्रेंच कहती हैं, "मुझे लगता है कि आख़िरकार हॉलीवुड एशिया और उसमें भी ख़ास तौर पर चीन की तरफ़ रुख़ कर रहा है."

ट्रेंच के अनुसार, "मैं फ़िल्म जगत से जुड़े ऐसे लोगों को जानती हूँ जो कभी चीन नहीं गए मगर अब वे कह रहे हैं कि वहाँ जाने की ज़रूरत है."

मुश्किलें

मगर ये राह आसान नहीं है. चीनी दर्शकों तक पहुँचना आसान नहीं होगा और उसमें भी अगर कड़े सेंसर के नियमों को देखें तब तो मुश्किलें और भी हैं.

कुछ लिहाज से तो हॉलीवुड का चीन में प्रदर्शन अच्छा भी रहा है. अवतार जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में काफ़ी लोकप्रिय विदेशी फ़िल्में रही हैं.

बड़े बजट की हॉलीवुड फ़िल्में देश की बॉक्स ऑफ़िस की कुल कमाई की आधी कमाई ले जाती हैं.

इसे देखते हुए हॉलीवुड में लालच होना स्वाभाविक है मगर ये मौक़े तब उन्हें बंद नज़र आने लगते हैं जब उनके सामने ये तथ्य आता है कि चीन में रिलीज़ होने वाली विदेशी फ़िल्मों की एक सीमा तय है.

पिछले एक दशक में चीन ने सिनेमा हॉल में सिर्फ़ 20 विदेशी फ़िल्में ही उतरने दीं.

पिछले महीने हुए एक सौदे के मुताबिक़ 14 फ़िल्में और सिनेमा में रिलीज़ होंगी बशर्ते वे थ्रीडी में हों.

संभावनाएँ

चीन में निश्चय ही अपार संभावनाएँ हैं. 2011 में वहाँ से बॉक्स ऑफ़िस की कमाई में 29 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई और इस साल भी ये बढ़त ऐसी ही रहने की संभावना है.

लगभग दो अरब डॉलर का ये आँकड़ा हालाँकि अमरीका के 10 अरब से ऊपर के आँकड़े से कहीं कम है मगर अमरीका में अब कमाई गिर रही है.

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Image caption ट्रांसफ़ॉर्मर्स ने चीन में काफ़ी अच्छी कमाई की

ट्रेंच कहती हैं कि हॉलीवुड चीनी जनता को कई तरीक़े से लुभाने की कोशिश कर रहा है.

कई बार ये सांकेतिक रूप में होता है जहाँ या तो चीनी परिदृश्य में कुछ सीन शूट हो जाएँगे या फिर किसी एशियाई स्टार को फ़िल्म में जगह मिल जाएगी.

मगर कई अन्य मामलों में इसमें एक नया ही ड्रामा जुड़ जाता है. एक फ़िल्म स्टूडियो ने तो फ़िल्म में डिजिटल तरीक़े से ऐसे बदलाव किए कि वे चीनी संवेदनशीलता को ध्यान में रख सकें.

इसी साल रिलीज़ होने वाली फ़िल्म रेड डॉन में असली फ़िल्म में चीन के विलेन हैं मगर चीन में रिलीज़ के लिए वे विलेन उत्तर कोरियाई बना दिए जाएँगे. वैसे भी अमरीका को उत्तर कोरिया से कोई लेना-देना इस मामले में नहीं है.

फ़रवरी में ड्रीमवर्क्स कंपनी ने घोषणा की थी कि वह चाइना मीडिया कैपिटल नाम की कंपनी के साथ मिलकर ओरियंटल ड्रीमवर्क्स बनाने जा रहा है. ये शंघाई में स्थित होगी और चीनी तथा चीन के बाहर के दर्शकों के लिए फ़िल्में बनाएगी.

नज़र

हॉन्गकॉन्ग और लॉस एंजेलेस में काम कर चुके फ़िल्म प्रोड्यूसर टिम क्वॉक कहते हैं, "ये बेहतर अर्थशास्त्र है और सही भी है. वहाँ काफ़ी पैसा भी है."

वैसे क्वॉक का कहना है कि अमरीकी फ़िल्म निर्माताओं को अक़सर चीन में फ़िल्म बनाने से जुड़े प्रतिबंधों का पता नहीं रहता.

वहाँ हर पटकथा पर शूटिंग शुरू करने से पहले सरकारी सेंसर बोर्ड से अनुमति लेनी होती है. इतना ही नहीं आम तौर पर व्यावसायिक हॉलीवुड फ़िल्मों में दिखाई जाने वाली कई चीज़ें जैसे- हिंसा, खुले आम सेक्स या यहाँ तक कि टाइम ट्रैवेल जानी इस दुनिया से दूसरी दुनिया में जाने जैसी चीजें दिखाना प्रतिबंधित है.

इतना ही नहीं चीनी दर्शकों को रिझाना भी आसान नहीं है. ये समझना मुश्किल है कि उन्हें क्या पसंद आएगा और क्या नहीं.

एक ओर जहाँ अवतार और ट्रांसफ़ॉर्मर्स जैसी बड़े बजट वाली फ़िल्मों का प्रदर्शन अच्छा रहा है तो वहीं हाइ स्कूल म्यूज़िकल और व्हाट वुमन वॉन्ट जैसी फ़िल्मों की चीनी रीमेक बुरी तरह फ़्लॉप रहीं.

क्वॉक कहते हैं, "चीन काफ़ी भिन्नता भरा बाज़ार है जहाँ क्षेत्र के हिसाब से भिन्नता है. बीजिंग में जो चीज़ हास्य पैदा करती है वह शंघाई में हास्य पैदा करने वाली चीज़ से अलग होगी. मेरे विचार से अमरीकी फ़िल्म निर्माताओं को चीन में कुछ समय गुज़ारकर ये समझना होगा कि उस बाज़ार में क्या चीज़ लोगों को पसंद आएगी."

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