'खान' और 'खान' में तुलना क्यों: इरफ़ान

 सोमवार, 16 अप्रैल, 2012 को 13:46 IST तक के समाचार
इरफ़ान खान

इरफ़ान कहते हैं कि घर चलाने के लिए हर तरफ की फिल्म करनी पड़ती है.

पान सिंह तोमर की सफलता में गोते लगा रहे अभिनेता इरफ़ान खान को ये बात अच्छी नहीं लगती कि उनकी तुलना इंडस्ट्री के दूसरे 'खान' अभिनेताओं से की जाती है.

इरफ़ान कहते हैं, ''मुझे इस बात से ऐतराज़ है कि क्यों लोग ऐसी तुलना करते हैं और ये जताने की कोशिश करते हैं कि कौन बड़ा है और कौन छोटा है.''

साथ ही इरफ़ान कहते हैं, ''मेरा नाम अगर इरफ़ान अली होता तो भी क्या मेरी तुलना बॉलीवुड के बाकि खानों से की जाती. सबकी अपनी अपनी जगह होती है और 'सरनेम' से कोई फायदा नहीं होता. अगर ऐसा होता तो आज इंडस्ट्री में 15-20 खान घूम रहे होते.''

साथ ही वो कहते हैं, ''खान सरनेम को कितना भी महत्व क्यों न दे लें लेकिन सच बात तो ये है कि इसका सफलता से कोई लेना देना नहीं है. आमिर खान का नाम अगर आमिर खान न होकर कुछ और होता तो क्या उनके काम की सराहना नहीं होती. आदमी अपने कर्मों से जाना जाना चाहिए न कि नाम से.''

हाल ही में मुंबई में इरफ़ान अपनी फिल्म 'पान सिंह तोमर' की डीवीडी के लौंच के मौके पर मीडिया से रुबरु हुए. जब इरफ़ान से पूछा गया कि क्या इस फिल्म की सफलता के बाद इरफ़ान ने अपना दाम बड़ा दिया है? तो इस सवाल का जवाब इरफ़ान ने कुछ इस अंदाज़ में दिया.

वो बोले, ''मेरा रेट तो घट गया है. मेरा रेट तो तब बढे़गा जब मुझे मेरी तरह की फिल्में मिलेंगी. वो मेरा रेट हैं और मैं उसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूं. पैसे तो फिल्म के हिसाब से कम ज्यादा होते रहते हैं. मेरी दौड़ तो अच्छी कहानियों को पकड़ने की है और ‘पान सिंह’ उस कड़ी की पहली फिल्म है. देखते हैं मैं कहां तक दौड़ पता हूं.''

इरफ़ान चाहते तो हैं अपने मन की फिल्में करना लेकिन वो ये भी मानते हैं कि हर वक़्त अपने मन की करना संभव नहीं है. वो कहते हैं, ''एक अभिनेता का सफ़र आसान नहीं होता. अभिनेता एक ऐसा खिलाड़ी होता है जिसे मैदान पर खड़े होकर हर तरह की गेंद का सामना करना पड़ता है, हर ताल पर नाचना पड़ता है. मैं चाहता तो हूं कि मैं अपनी मर्ज़ी की ही फिल्में करूं लेकिन कई बार मुझे अपने घर को चलाने के लिए भी फिल्में करनी पड़ती हैं.''

इस बात पर और रौशनी डालते हुए इरफ़ान कहते हैं, ''अगर मैं सिर्फ अपने मन की फिल्में कर रहा होता तो आज मैं ऑटो रिक्शा में घूम रहा होता, मेरे पास सैकंड हैण्ड गाड़ी भी नहीं होती. मुंबई जैसे शहर में जीवन यापन आसान नहीं है. अपना एक स्तर बनाना पड़ता है.''

इरफ़ान ये भी कहते हैं कि जब वो अपने मन की फिल्में नहीं भी कर रहे होते तब भी उनकी कोशिश होती है कि उस फिल्म में वो जो किरदार निभा रहे हैं उसमें पूरी जान डाल दें.

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