एक कोशिश ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स को बचाने की

ग्रोमोफोन
Image caption किसी जमाने में ग्रामोफोन ही संगीत को सुनने का जरिया हुआ करता था

किसी जमाने में ग्रामोफोन रिकॉर्ड ही केएल सहगल, पंकज मल्लिक, मुबारक बेगम और नूरजहां की अद्भुत आवाजों को उनके चाहने वालों से जोड़ने का जरिया हुआ करते थे. लेकिन जमाना बदला तो संगीत की तकनीक भी बदली.

अब बहुत कम लोगों के पास ये ग्रामोफोन रिकॉर्ड का बहुमूल्य खजाना सुरक्षित है. लेकिन अब मुंबई की सोसाइटी ऑफ इंडियन कलेक्टर्स के नेतृत्व में कुछ लोग इस अहम सांस्कृतिक धरोहर को बचने की कोशिश कर रहे हैं.

बात चाहे मुबारक बेगम की सुरीली आवाज में गाए गए गीत ‘कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी’ की हो या फिर केएल सहगल की दर्द भरी आवाज में गूंजता हुए गीत ‘आए कातिब-इ-तकदीर’ की, सभी कुछ ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स में दर्ज है.

सहगल, पंकज मल्लिक मुबारक बेगम और नूरजहां की अद्भुत आवाजों से सजे इस खजाने को बचने की कोशिश खास अहमियत रखती है.

सोसाइटी ऑफ इंडियन कलेक्टर्स के सचिव और वैज्ञानिक सुरेश चांदवनकर के पास 15 हजार से भी ज्यादा रिकॉर्ड्स हैं. उनका कहना है की अगर इन रिकॉर्ड्स को बचने की कोशिश नहीं की गई तो इतिहास का एक अहम हिस्सा नष्ट हो जाएगा.

दुर्भल खजाना

Image caption एमवी सुरिंदर ने सहगल पर एक वेबसाइट शुरू की है

वह बताते है, "जब पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स दुर्लभ हो रहे थे और ऑडिओ कैसेट्स बाजार में आ रहे थे, तो मैंने सोचा की अगर कोई इनको संभल कर नहीं रखेगा तो आने वाली पीढ़ी को ये मालूम भी नहीं होगा की हमारे देश में ऐसे रिकॉर्ड भी बने थे. मैंने यहां-वहां देखा तो मेरे जैसे बहुत लोग थे जिनके पास रिकॉर्ड्स का कलेक्शन था. मैंने सोचा की अगर हम सब मिलकर कोशिश करें तो इन ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स में दर्ज इस सांकृतिक धरोहर को हम आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर रख सकते हैं."

कुंदन लाल सहगल रिकॉर्ड्स के जमाने के एक ऐसे मशहूर गायक रहे हैं जिनकी आवाज के दीवाने आज भी देश विदेश में फैले हैं. ‘जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करेंगे’ जैसे गीतों में सहगल की यादें आज भी जिंदा हैं. और पुराने रिकॉर्डों की गाथा उन जैसे कलाकार की बात के बिना पूरी नहीं हो सकती.

सहगल के एक प्रंशसक एमवी सुरिंदर ने "कुंदनलालसहगल.कॉम" के नाम से एक वेबसाइट शुरू की है जिस पर सहगल के गाए कुल 185 में से 170 गीत मौजूद हैं.

हैदराबाद में रहने वाले सुरिंदर अपने इस कलेक्शन के बारे में कहते हैं कि इसमें बहुत ही दुर्लभ गाने भी मौजूद हैं जिनके रिकॉर्ड बहुत कम लोगों के पास हैं. इन में दो फारसी गाने, दो पंजाबी और बीस-इक्कीस बंगाली गाने व कई गजलें भी शामिल हैं.

वह बताते हैं, "एक गाना तो ऐसा भी है जो सहगल ने रिकॉर्ड करवाया और उसे अपने घर लेकर चले गए. उसे बाजार में कभी नहीं उतारा गया. कहा जाता है कि बाद में सहगल ने उस का रिकॉर्ड बनवाकर अपनी मां को दिया था."

संगीत भी, साहित्य भी

सहगल के अलावा उस दौर के कुछ और गायकों पंकज मालिक और केसी डे के गानों को भी इस वेबसाइट पर संरक्षित किया गया है.

मशहूर पार्श्व गायक मन्ना डे के चाचा केसी डे अपने दौर के जाने माने कलाकार थे. उन्होंने बंगाली, उर्दू और हिंदी भाषाओं में लगभग पांच सौ गीत गए थे और उनमें से कम ही गाने आज सुरक्षित हैं.

सुरिंदर ने कहा की अगर इनको भी बचाकर नहीं रखा गया तो फिर उनकी याद भी मिट जाएगी.

Image caption अब कम ही लोग ऐसे मिलते हैं जिनके पास ग्रोमोफोन रिकॉर्ड्स मौजूद हैं

हैदराबाद में ओस्मानिया विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेस्सर रामचंद्र रेड्डी के पास भी पुराने रिकॉर्ड्स का एक बड़ा कलेक्शन मौजूद है जो उनके पिता के जमाने से चला आ रहा है और जिसे आज भी उन के परिवार के लोग पुराने ग्रामोफोन पर ही सुनते हैं. अब उनकी कोशिश है की इस तरह के पुराने रिकॉर्ड्स का एक आर्काइव स्थापित किया जाए.

रामचंद्र रेड्डी के कहना है, "ये एक विरासत है उसको बनाए रखने की जरूरत है. दूसरे इसमें अच्छे संगीत के अलावा अच्छा साहित्य भी है. गजल और शायरी है. उसकी भी इतिहास में एक खास जगह है. अगर आगे चल कर कोई शायरी या संगीतकार के बारे में उसमें शोध करना चाहे, तो उन्हें काफी जानकारी मिल सकती है."

'रिकॉर्ड की बात ही और है'

हालांकि पुराने गीत और संगीत का कुछ हिस्सा अब सीडी और आईपोड जैसे नए माध्यमों के जरिए भी उपलब्ध है लेकिन सुरेश चांदवनकर का कहना है कि पुराने रिकॉर्ड्स को भौतिक रूप से बचाना भी जरूरी है.

वह कहते हैं कि कई गाने ऐसे भी हैं जिसकी सीडी बनाने में किसी की रूचि नहीं है क्योंकि वे कोई लोकप्रिय कलाकार का गाना नहीं था लेकिन उस रिकॉर्ड में एक तरह से उन का इतिहास दर्ज है.

रिकॉर्ड्स के कवर या जेकेट पर कलाकारों के चित्र और जानकारी होती थी. ये एक ऐतिहासिक जानकारी है जिसे बचाकर रखना भी जरूरी है.

रामचंद्र रेड्डी कहते हैं कि उन जैसे पुराने लोगों के लिए रिकॉर्ड सुनना एक परंपरा है जिसे वे कभी नहीं छोड़ सकते.

वो कहते हैं, "मेरी और मुझसे पहले वाली पीढ़ी के लोगों में रिकॉर्ड प्ले करने की परंपरा थी. इससे उनकी काफी यादें जुड़ी रही हैं. वे तो खत्म हो जाएंगी. अगर संभव हुआ तो मैं तो आज भी रिकॉर्ड पर ही गाने सुनना पसंद करूंगा क्योंकि सुई की रगड़ से जो आवाज पैदा होती है वो मुझे बहुत अच्छी लगती है."

संग्राहलय की जरूरत

Image caption रेड्डी कहते हैं कि ग्रामोफोन पर संगीत सुनने का मजा ही अलग है

जहां सुरेश चांदवनकर हैदराबाद और कोलकाता जैसे शहरों में अपने संगठन की शाखाएं खोलने और वहां भी पुराने रिकॉर्ड्स के संरक्षण की कोशिश कर रहे हैं, वहीं सुरिंदर का मानना है की पुराने रिकॉर्ड्स का एक संग्राहलय बनना भी बहुत जरूरी है.

सुरिंदर कहते हैं, “एक तरीके से ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स को रद्दी की तरह देखा जा रहा है. कम लोग हैं जिन्होंने ग्रामाफोन रिकॉर्ड्स को जमा किया है. लेकिन उन के बच्चों और घर वालों को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. इनको बचने के लिए भारत में एक ऑडिओ आर्काइव बनाने की जरूरत है.”

रिकॉर्ड्स के संरक्षण और उन्हें सुनने का शौक बढ़ाने के लिए जल्द ही कालीकट में ग्रामोफोन की एक प्रदर्शनी लगने वाली है. सुरेश चांदवनकर जैसे लोगों को आशा है कि इस तरह वे इस शानदार ऐतिहासिक विरासत को बचाने में सफल रहेंगे.

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