बड़ी मुश्किल से आती है कैफ़ी साहब जैसी सादगी: जावेद अख़्तर

 गुरुवार, 10 मई, 2012 को 13:21 IST तक के समाचार
कैफ़ी आज़मी

10 मई को मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की 10वीं पुण्यतिथि है.

एक तरफ फिल्म हकीकत का गाना कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो जैसा देशभक्ति से भरा गीत तो दूसरी तरफ फिल्म अनुपमा का कुछ दिल ने कहा कुछ भी नहीं, कुछ दिल ने सुना कुछ भी नहीं जैसे नाजुक बोलों वाला गीत. हर तरह के गानों को लिखने वाले बहुआयामी प्रतिभा के धनी शायर और गीतकार कैफ़ी आज़मी की 10 मई को 10वीं पुण्यतिथि है.

उनके दामाद और गीतकार जावेद अख़्तर कैफ़ी आज़मी को याद करते हुए कहते हैं, "उनके जैसी सादगी, गहराई, वैसी गरिमा बहुत मुश्किल से मिलती है. आज के दौर में ऐसी शख़्सियत नहीं मिलती. जब मैंने शायरी शुरू की तो जिन लोगों को मैं सुनाकर उनसे सुझाव मांगता था और अपनी ग़ल्तियां ठीक करवाता था उनमें कैफ़ी साहब भी एक थे."

ग़ौरतलब है कि कैफ़ी आज़मी और जावेद अख़्तर के पिता जांनिसार अख़्तर आपस में काफ़ी अच्छे दोस्त भी थे.

कैफ़ी आज़मी की बेटी अभिनेत्री और समाजसेवी शबाना आज़मी उन्हें याद करते हुए कहती हैं, "अब्बा ने मुझे और मेरे भाई को कभी नहीं डांटा. वो बहुत नरम लहज़े में बात करते थे और बहुत ही कम बोलते थे."

"उनके जैसी सादगी, गहराई, वैसी गरिमा बहुत मुश्किल से मिलती है. आज के दौर में ऐसी शख़्सियत नहीं मिलती. "

जावेद अख़्तर, मशहूर गीतकार और कैफ़ी आज़मी के दामाद

ऐसे ही एक दिलचस्प वाकये को शबाना ने बांटा. चेतन आनंद की फिल्म हीर रांझा के संवाद कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे. शबाना कहती हैं, "मुझे बड़ी हैरत होती थी कि अब्बा इतना कम बोलते हैं आखिर संवाद लिखते समय उनके और चेतन साहब के बीच बातें क्या होती हैं. चेतन आनंद रोज़ाना सुबह 10 बजे हमारे घर आ जाते थे. वो कमरे के एक कोने में बैठ जाते थे और अब्बा दूसरी तरफ बैठे रहते थे. दोनों के बीच कोई बात नहीं होती थी. और फिर चेतन साहब घर लौट जाते." लेकिन हीर रांझा के शायराना तरीके से लिखे संवाद बेहद लोकप्रिय साबित हुए.

शबाना के मुताबिक़ उनके पिता शायर, कहानीकार, संवाद लेखक सभी थे, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा ख्याति मिली बतौर गीतकार.

कैफ़ी आज़मी ने गुरु दत्त की काग़ज़ के फूल, चेतन आनंद की हक़ीक़त के अलावा अनुपमा, सात हिंदुस्तानी, परवाना, पाकीज़ा, बावर्ची, हंसते ज़ख़्म, अर्थ और रज़िया सुल्तान के सुपरहिट गाने लिखे.

वो समाजसेवा से भी काफी जुड़े रहे. उन्होंने उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के मिजवां गांव में काफी काम किया. मिजवां में ही 1919 में उनकी पैदाइश हुई थी. उन्होंने लड़कियों के लिए विद्यालय बनवाए और कंप्यूटर सेंटर भी खुलवाए.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.