पूरी सदी में मेहदी हसन जैसा कोई नहीं: आबिदा परवीन

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Image caption पत्ता पत्ता और कब के बिछड़े जैसी गज़लें गाईं मेहदी हसन ने.

'देख तो दिल की जां से उठता है, ये धुंआ कहां से उठता है...' पाकिस्तानी सूफी गायक आबिदा परवीन इन्ही पंक्तियों के ज़रिए याद कर रही हैं मशहूर ग़ज़ल गायक मेहदी हसन को. मेहदी हसन का कल कराची के एक अस्पताल में निधन हो गया. वो 84 वर्ष के थे और एक लम्बे समय से बीमार थे.

'देख तो दिल की जां से उठता है...', ये ग़ज़ल मेहदी हसन साहब की गाई हुई है. बीबीसी से बात करते हुए आबिदा परवीन कहती हैं, ''हर पंक्ति, हर ग़ज़ल मेहदी हसन साहब की ही है. हमारे ज़हन से, दिल से यहां तक कि हमारी रूह से मेहदी हसन कभी निकल ही नहीं सकते. मैं तो कहूंगी कि जाते-जाते वो सब जगह बस धुंआ ही कर गए हैं. एक अजब क़यामत ढा गए हैं. ''

आबिदा का मानना है कि शारीरिक तौर पर भले ही मेहदी हसन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया हो लेकिन गायकी के लिहाज़ से और उनकी शख्सियत के हिसाब से वो आज भी यहां मौजूद हैं और हमेशा मौजूद रहेंगे.

मेहदी साहब की तारीफ करना शायद सूरज को दिया दिखाने जैसा हो लेकिन फिर भी आबिदा कहती हैं, ''मेहदी साहब पूरी सदी में एक ही थे, इस पूरी सदी में उनके जैसा गायक पैदा ही नहीं हुआ. आप किसी भी गायक की गायकी को देख लीजिए हर किसी में आपको मेहदी हसन की झलक मिल जाएगी. हर गायक की प्रेरणा स्रोत रहे हैं मेहदी हसन.''

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए आबिदा कहती हैं, ''मैं समझती हूं कि ग़ज़ल को जिस संजीदगी के साथ मेहदी हसन ने पेश किया, वैसा न पहले किसी ने किया था और आगे भी कोई वैसा नहीं कर सकता. ग़ज़ल गायकी को शहंशाहत बख्न्शने वाले मेहदी हसन ही थे.''

मेहदी हसन की अपनी कला पर महारत को आबिदा कुछ ये कह कर बताती हैं, ''उन्होंने इतनी बड़ी-बड़ी ग़ज्लयात गाई, इतना अच्छा तलफ्फ़ुज़ बयान किया. उनसे पहले ऐसा था ही नहीं.''

आबिदा ये भी कहती हैं कि इतनी ऊँची शख्सियत होने के बावजूद भी उनमें सीखने की भूख थी. वो कहती हैं, ''मेहदी हसन हर वक़्त सीखते रहते थे. इनका सीखना कभी भी कम नहीं हुआ. जितनी मेहनत वो करते थे उतनी मेहनत कौन कर सकता है. वो अपनी ही मौसीक़ी में गुम रहते थे. मैंने तो इतनी लगन किसी और गायक में नहीं देखी. ऐसा जज़्बा ही नहीं देखा. मेहदी हसन ने जो रिश्ता मौसीक़ी से जोड़ा वो रिश्ता उनका किसी और से था ही नहीं. वो मौसीक़ी की दुनिया में ही रहते थे.''

आबिदा कहती हैं, ''बड़े-बड़े लोगों के साथ मेहदी हसन का ताल्लुक था, जो इनकी गज़्लयात और मौसीक़ी को देखते थे. दस-पन्द्रह लोग बैठे होते थे और सारी रात मेहदी साहब बस एक ही ग़ज़ल को गाते रहते थे. वो ऐसे लोग होते थे जो मेहदी साहब को बताते थे कि ये शब्द ऐसे है और ये ऐसे.''

मेहदी हसन की बेमिसाल आवाज़ के बारे में आबिदा कहती हैं, ''जो ऊपर वाले ने मेहदी हसन को आवाज़ बख्न्शी थी वो बहुत बड़ा हुस्न था. इसके अलावा सुर पर उनकी बहुत ही बढ़िया पकड़ थी.''

आबिदा परवीन तो यहां तक कहती हैं कि जिस तरह का सुर मेहदी हसन लगाते थे वैसे सुर तो किसी और गायक से कभी लगे ही नहीं.

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