गुलजार की कृति से पंगा लिया - सलीम आरिफ

Image caption सलीम आरिफ ने गुलजार की रचनाओं पर आधारित प्रसिद्ध नाटक 'खराशें' का निर्देशन किया है.

ये हफ्ता दिल्ली के थिएटर प्रेमियों के लिए ख़ास रहा. गुलज़ार की कहानियों और नज़्मों पर आधारित नाट्य समारोह 'मेरा कुछ सामान' में टिकट खरीदने के लिए अच्छी ख़ासी लाइन देखने को मिली. समारोह में 'ख़राशें', 'सुनते हो' और 'अरे ओ हेनरी' का मंचन हुआ जिसके निर्देशक सलीम आरिफ से बीबीसी ने एक ख़ास बातचीत की.

थिएटर से आपके लगाव की कहानी कितनी लंबी है ?

थिएटर से मेरा ताल्लुक लखनऊ में शुरु हुआ जब मैं कॉलेज में था. 'मेघदूत' करके एक नाटक ग्रुप था जिनके लिए मैंने पोस्टर डिज़ाइन किया था. उसके बाद स्टेज पर मैंने कुछ रोल भी किए और इस तरह मैं थिएटर से जुड़ा रहा और मुझे एहसास हुआ कि थिएटर में वो सब कुछ है जिससे मुझे लगाव है.

तब लगा कि मुझे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में जाना चाहिए. इस बीच मैंने हबीब तनवीर और कावलम पाणिककर जैसे नाटककारों के साथ रहकर भी काफी कुछ सीखा. आगे मैंने टीवी सीरियल 'भारत एक खोज', 'मिर्ज़ा ग़ालिब' और 'चाणक्य' के लिए सेट डिज़ाइनिंग भी की लेकिन इस बीच थिएटर से मेरा रिश्ता बना हुआ था.

वक्त मिलने पर मैं थिएटर के लिए कुछ ना कुछ करता रहता था. चूंकि मैने थिएटर सीखा है और मुझे ये करने मैं मज़ा भी आता है इसलिए लगातार जुड़ा हूं और मुझे ये माध्यम मेरे कंट्रोल का भी लगता है.

आप गुलज़ार साहब को अपना गाइड, अपना रहनुमा कहते आए हैं, उनसे दोस्ती कैसे हुई?

'भारत एक खोज' में नीतिश और मेरा काम देखकर गुलज़ार साहब ने एक दिन हमें बुलावा भेजा. मिर्ज़ा गालिब की डिज़ाइनिंग वो हमसे करवाना चाहते थे. उस तीन मिनट की मीटिंग से हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई और शाम को हमने गुलज़ार साहब की फिल्म 'इजाज़त' की स्पेशल स्क्रीनिंग में भी हिस्सा लिया.

उसके बाद ग़ालिब की शूटिंग के दौरान हमने एक दूसरे के शौक जाने जिसमें साहित्य सबसे ऊपर था. वो अक्सर अपनी लिखी हुई नई नज़्में सुनाया करते थे और मेरी राय की कद्र भी करते थे.

महीने का एक संडे उनके घर पर कोई पुराना मैच या विंबलडन का फाइनल देखते हुए बीतता था. बस इसी तरह हमारी दोस्ती अभी तक जारी है और मुझे खुशी है कि आर डी बर्मन के बाद इतना लंबा क्रियेटिव लगाव गुलजार का मेरे साथ ही रहा है.

गुलज़ार साहब की कृतियों को हाथ लगाने से पहले कोई भी दस बार सोचता है कि उसके साथ न्याय हो पाएगा या नहीं, वो ठीक कर रहा है या नहीं. ऐसा ख़्याल आपके मन में नहीं आया जब आपने उनकी रचनाओं को थिएटर पर दिखाने का फैसला किया ?

कहते हैं ना कि बेफकूफ उस जगह जाते हैं जहां स्याने जाने से डरते हैं, मेरे साथ भी शायद ऐसा ही कुछ हुआ. गुलज़ार की कृतियों को छूकर मैंने एक तरह से पंगा ले लिया था पर असल बात ये थी कि जिस शिद्दत से मैं अलग अलग मुद्दों पर सोचता था या सोचता हूं, उसका प्रतिबिंब गुलज़ार साहब की रचनाओं में बड़ा खूबसुरत मिला.

मसलन नाटक 'ख़राशें' जो गुलज़ार की उन नज़्मों और कहानियों पर आधारित है जो बंटवारे के कड़वे सच को बयां करती हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि आपकी इन रचनाओं पर एक स्टेज शो बनाना चाहता हुँ तो वो थोड़ा अचंभित हुए कि नज़्मों और कहानियों का नाटक कैसे बनाओगे, पर मैंने उन्हें आश्वस्त किया क्योंकि मुझे खुद से ज्यादा गुलज़ार साहब की रचनाओं पर भरोसा था.

कला ऐसा माहौल बना सकती है जहां आदमी अपनी बात खुल कर कह सके. गुलज़ार और उनकी कृतियां ये काम करने में मेरी मदद करती हैं.

थिएटर से फिल्मों में आने वाले कई कलाकारो को बस एक ही शिकायत है - थिएटर में पैसा नहीं है. कब आएगा हिंदी थिएटर में पैसा?

जब सरकार बेफकूफी के कार्यक्रम फंड करना बंद कर देगी. हिंदी थिएटर में पैसा नहीं है, मराठी और गुजराती में है क्योंकि उसकी एक व्यवस्था बनी हैं. हिंदी की समस्या ये है कि ट्रेनिंग प्रोग्राम तो पच्चीस खोल लिए हैं पर ट्रेनिंग के बाद स्टूडेंट के काम करने के लिए, रेपर्टी के नाम पर कुछ खास विकल्प नहीं है.

अगर एक राजस्थान का लड़का, उदयपुर में जाकर काम करना चाहता है तो उसके पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय दिल्ली के एनएसडी और श्रीराम सेंटर रेपर्टी के. ये एक बहुत बड़ा दोगलापन है जो थिएटर के साथ किया जा रहा है कि आपको एक ऐसी विधा के लिए तैयार किया जा रहा है जिसकी कोई खपत ही नहीं है और फिर बदनामी होती है कि थिएटर में ट्रेनिंग लेकर लोग फिल्मों में आ रहे हैं.

अरे, थिएटर करने के लिए सहूलियतें कहां है. मैं थिएटर कर ही इसलिए पा रहा हूँ क्योंकि मैं अपनी जीविका के लिए थिएटर पर आश्रित नहीं हूँ.

हिंदी थिएटर में, खासतौर पर उत्तर भारत में, थिएटर में कुछ नया देखने को नहीं मिलता, एक ही सुपरहिट नाटक को बार बार दोहराया जाता है. कुछ नया करने से परहेज़ क्यों ?

देश का सबसे अच्छा थिएटर मुंबई में हो रहा है. मुंबई में हर साल कम से कम 10 से 15 नए नाटक खेले जाते हैं. जहां तक हिंदी अमेच्यर थिएटर की बात है तो अगर आज भी उनको 'आषाढ़ का एक दिन' और 'सूर्य की अंतिम किरण से पहली किरण' अच्छी लगती है तो वो कहीं ना कहीं अटके हुए हैं.

ज़ाहिर है कि क्लासिक्स का अपना एक महत्व होता है पर नयापन भी उतना ही जरुरी है. ये समस्या दिल्ली में ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि दिल्ली एनएसडी कैंद्रित है. यहां लोग इस मुग़ालते में हैं कि जो नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा करता है वही थिएटर है. सरकार की तरफ से जिन संस्थानों को प्राश्रय मिला है उसने सारे मापदंड बिगाड़ दिए हैं और यही कारण है कि नयापन देखने को नहीं मिलता .

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