मैक्सिमम: उपलब्धि के लिए किसी भी हद तक

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कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, सोनू सूद, नेहा धूपिया, स्वानंद किरकिरे, विनय पाठक

निर्देशक: कबीर कौशिक संगीत : अमजद नदीम रेटिंग: 3/5

मुंबई नगरी एक ऐसी जगह है जहां हर इंसान सपने बुनता है और हर एक के सपने हकीकत बनते हैं लेकिन हमें ये भी मालूम हैं कि मुंबई में ही लोगों में एक जबरदस्त होड़ की भावना है जो उन्हे मरने-मारने के लिए उत्तेजित करती है.

कबीर कौशिक की फ़िल्म मैक्सिमम इसी दायरे में बंधी हुई फ़िल्म है, जहां दो एंकाउंटर स्पेशलिस्ट (नसीरुदीन शाह और सोनू सूद) एक दूसरे पर हावी होना चाहते हैं और इसी होड़ में अपनी क्रूरता का परिचय देते हैं.

अपनी रंजिश को दिखाते हुए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं. यदि एक प्रतिवादी दो आदमी मारता है तो दूसरा भी दो या उससे ज्यादा आदमी मारता है. ज़ाहिर हैं कि ऐसे में कुछ बेगुनाह आदमी ही बलि का बकरा बनते हैं. इन सबकी जिम्मेदार अराजकता हैं जिसका फायदा दोनों उठाते हैं.

मैक्सिमम 2003 की पृष्ठभूमी पर आधारित हैं और पांच साल की अवधि की कहानी है. इस दौरान 26/11 की घटना का भी ज़िक्र है.

फ़िल्म की शुरुआत में पुलिस अंडरवर्ल्ड के खिलाफ अपनी जंग छेड़ती नज़र आती है और इस लडाई में दोनों एंकाउंटर स्पेशलिस्ट अंडरवर्ल्ड को मिटा देने की ठान लेते हैं.

जहां तक दुस्साहस का सवाल है, ये दोनो ही पुलिसवाले प्रताप पंडित (सोनू सूद) और अरुण ईमानदार (नसीरुद्दीन शाह) एक दूसरे से प्रेरित हैं, इस होड़ में ये दोनों ही मक्सिमम कंट्रोल के लक्ष्य की ओर भागते हैं. ज़ाहिर है इस लड़ाई में ना केवल उनके सीनियर बल्कि कुछ राजनेता भी उनका साथ देते हैं और जब तक ये लोग उनका साथ न दे तब तक उनका काम अधूरा ही रहता है.

इस राजनीति के पीछे एक घिनौनी छवि छुपी हुई है, लेकिन क्या उन्हें इस बात की परवाह है?

ये राजनेता ऐसे नहीं हैं जो इनकी मदद करना चाहते हैं बल्कि मदद में उनका फायदा भी छुपा हुआ है.

इस खून-खराबे की लत उन दोनों को किसी भी हद तक ले जाती हैं, लेकिन फिर भी वो अपनी दुश्मनी निभाते हैं चाहे इस दुश्मनी को निभाने के लिए उन्हे कितने ही निर्दोष लोगों की जान लेनी पड़े.

गुनाह और कानून के स्वांग में और किरदार भी अपनी भूमिका बखूभी निभाते हैं जिनमें भले ही उनके स्वार्थ छुपे हुए हों.

वो चाहे गृहमंत्री (मोहन अगासे) हो या एक और महत्वाकांशी मंत्री तिवारी (विनय पाठक). सभी को अपने-अपने काम से मतलब है.

फ़िल्म में सब कुछ काला या झूठा नही हैं. इस लडा़ई में एक सच्चे दोस्त अश्विन (अमित साध) है, जो कि एक टेलिविजन चैनल में काम करते हैं और आखिर तक पंडित का साथ देते हैं.

फ़िल्म की गति धीमी ज़रुर है पर इतनी हत्याओं के बीच कभी भी ऊबने का मौका नहीं मिलता.

इस हिंसा और वध के बीच में घिरे नसीरुद्दीन शाह एक मंझे हुए कलाकार ज़रूर हैं पर वो रोल में जान नहीं डाल पाए हैं.

शायद वो इस रोल को इतनी बार कर चुके हैं कि ऊबते नज़र आते हैं, हालांकि उनकी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता और यहां भी वो एक सशक्त कलाकार ही नज़र आए हैं.

इस फ़िल्म में सोनू सूद ज़रूर बाज़ी मार ले गए हैं. उनके किरदार में ज़्यादा शेड नज़र आए हैं.

सोनू के मुकाबले नसीरुद्दीन शाह का रोल छोटा है और उनके साथ न्याय थोड़ा कम होता है.

सोनू सूद का किरदार जोख़िम से खेलते हुए अधिक मज़बूत नज़र आता है.

यहां पर निर्देशक कबीर कौशिक बधाई के पात्र है जिन्होंने दोनों किरदारों की प्रतिद्वंद्विता को निर्देशक के तौर पर बखूबी उभारा है और धीमी गति से ही सही इसे गति दी है.

वहीं पर उन्होने कथानक को भटकने नहीं दिया है.

जबकि फ़िल्म में पुलिस के डांस बार की संगत को मद्देनज़र रखते हुए कुछ आइटम सॉन्ग भी डाल दिए गए हैं.

निर्देशक कबीर कौशिक फ़िल्म में भटके तो नहीं पर इतने कत्ल होने की वजह से कहीं ना कहीं पूर्वानुमान होने लगता है और इससे दर्शकों में कुछ निराशा पैदा होती है. यही शायद फिल्म की बहुत बडी कमजोरी साबित होगी.

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