छोटी फिल्मों पर प्रोडक्शन हाऊस का बड़ा दांव

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पान सिंह तोमर, शंघाई और गैंग्स ऑफ वासेपुर बीते कुछ समय में आई कुछ ऐसी फिल्में हैं जो लो बजट की हैं और जिनमें बड़े सितारे भी नहीं है लेकिन यू टीवी, वॉयकॉम और पीवीआर पिक्चर्स जैसे प्रोडक्शन हाउस और स्टूडियोज़ ने इनमें पैसा लगाया और इन फिल्मों को भी किसी बड़े सितारे की और बड़े बजट की फिल्म की तरह ही रिलीज़ किया गया.

ये चलन आज से कुछ साल पहले नहीं था. जब कई छोटे बजट की फिल्मों को बजट और प्रमोशन के अभाव में दर्शक नहीं मिल पाते थे.

तो ऐसा क्या बदल गया है कि अचानक से ऐसी लीक से हटकर फिल्में जिनमें बड़े सितारे नहीं हैं उन पर इन प्रोडक्शन हाउस और स्टूडियोज़ का विश्वास कैसे आ गया. क्या ये नए तरह के सिनेमा का आगाज़ है.

शंघाई के निर्देशक दिबाकर बनर्जी इसकी वजह बताते हैं, "दरअसल पिछले पांच-छह सालों में नया दर्शक वर्ग तैयार हुआ है. मल्टीप्लेक्सेस खुल रहे हैं. स्टूडियोज़ और प्रोडक्शन हाउस भी अपनी रेंज बढ़ाना चाहते हैं. उन्हें ऐसी फिल्मों में पैसा लगाने पर फायदा नज़र आने लगा है. इसलिए वो इन फिल्मों में निवेश कर रहे हैं."

दिबाकर ने कहा कि राऊडी राठौर और दबंग जैसी फिल्में तो साल में दो या तीन ही आती हैं. तो ऐसी बिग बजट, बड़े सितारों वाली फिल्मों के भरोसे तो प्रोडक्शन हाउसेस साल भर नहीं बैठ सकते. उन्हें भी शंघाई या गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों की जरूरत है. और हम जैसे फिल्ममेकर भी नए दर्शक वर्ग के सहारे सरवाइव कर रहे हैं.

अभिनेता मनोज बाजपेई भी कुछ ऐसे ही विचार रखते हैं. वो कहते हैं, "आज से कुछ साल पहले तक लोग ऐसा लीक से हटकर फिल्में, ऐसे वास्तविक सिनेमा में पैसा लगाने को तैयार नहीं होते थे. लेकिन आज वो ना सिर्फ इनमें पैसा लगा रहे हैं बल्कि इनकी मार्केटिंग और प्रमोशन पर भी खर्च कर रहे हैं. आज गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्म को वैसी ही रिलीज मिलती है जैसी किसी टिपिकल मसाला, बड़े बैनर की फिल्म को मिलती. इसका रिलीज से पहले खासा हाइप बन चुका था. ये भारतीय सिनेमा के लिए अच्छे दौर की शुरुआत का संकेत है."

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दिबाकर और मनोज ये भी मानते हैं कि इन फिल्मों के साथ ही राऊडी, दबंग और बॉडीगार्ड जैसी मसाला फिल्मों की भी बॉलीवुड को जरूरत है, क्योंकि ये फिल्में 100 करोड़ से ज्यादा का कारोबार करती हैं और जिससे बॉलीवुड में पैसा आता है. जिसकी वजह से उन जैसे फिल्मकारों और कलाकारों को उनकी मर्जी का सिनेमा बनाने की छूट मिल जाती है.

फिल्म समीक्षक अर्णब बनर्जी कहते हैं कि अनुराग कश्यप सरीखे फिल्मकार अपने बैनर के तले कई प्रतिभाशाली नए निर्देशकों को मौका दे रहे हैं जो उड़ान और शैतान जैसा नया और अभिनव सिनेमा बना रहे हैं. जो भारतीय सिनेमा के लिए अच्छी बात है. और अनुराग जैसा प्रख्यात नाम जुड़ा होने से इस तरह की फिल्मों में पैसा लगाने के लिए भी स्टूडियोज़ तैयार हो रहे हैं.

लेकिन साथ ही अर्णब ये भी कहते हैं, "यश चोपड़ा और करण जौहर सरीखे निर्माता नए निर्देशकों को मौका तो दे रहे हैं लेकिन ये उनसे अपनी ही तरह का सिनेमा बनवा रहे हैं. जैसे करण जौहर के प्रोडक्शन हाउस से जो भी फिल्में निकल रही हैं वो ज्यादातर रोमांटिक ही होती हैं. उनमें कोई विविधता नहीं होती. तो इस मायने में अनुराग और दिबाकर जैसे लोग चोपड़ा और जौहर सरीखे बैनरों से बेहतर काम कर रहे हैं."

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