इंडस्ट्री में साढ़े चार जीनियस हैं-पीयूष मिश्रा

Image caption पीयूष मिश्रा ने मकबूल, गुलाल, गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों में मज़बूत भूमिका निभाई है.

पीयूष मिश्रा ने अपने गीतों और अभिनय से बॉलीवुड में एक खास पहचान बनाई है. वो बेबाक हैं. अराजक भी. लाग लपेट नहीं. उन्हें अमिताभ बच्चन भी पसंद हैं. दीपक डोबरियाल और रणबीर कपूर भी. उनका मन सूफी है.

बीबीसी दफ्तर में तीन घंटों के दौरान सबके सवाल सुनते रहे, बोलते रहे और बोले मुझे जब कोई चुनौती भरे सवाल करता है तो अच्छा लगता है. इस बातचीत को पीयूष के शब्दों में ही लिखा गया है जैसा वो बोलते वैसा ही लिखा गया है.

ग्वालियर. ग्वालियर. ग्वालियर...मैं बस छोड़ना चाहता था. एनएसडी नहीं होता तो कुछ और होता. कोई और इंटरव्यू होता लेकिन ग्वालियर छोड़ना था.

थिएटर करता था. आत्मविश्वास था.पहली बार में हो गया..परिवार में बिल्कुल उलटा पुर था. कोई लेना देना नहीं था.

दिल्ली आए एनएसडी में तीन साल रहे. फिर काम किए.

मुंबई भी गए थे पहले...खराब क्या, बहुत ही खराब रहा. मैं फिट ही नहीं हो पाया. असल में मुझे पता नहीं था क्या बोलना है क्या करना है, कहां बोलना है. एकदम बेचैन रहे कि कहां आ गए, फंस गए. नसीरुद्दीन शाह ले गए थे मुझे. उनका कोई दोष नहीं.

फिर मैं आ गया और तय कर के आया था कि थिएटर करुंगा. खूब लिखा खूब काम किया. सुबह छह बजे से रात के दस बजे तक थिएटर करता था. मेरा थिएटर तो ऐसा ही होता था. ये नहीं कि शाम को चार घंटे थिएटर कर लिया.

सुबह शाम थिएटर. थिएटर. थिएटर. बीस साल काम करने के बाद पैसों से हालत बहुत खराब हो गई थी. फाइनेंसियली ब्रोक डाउन. तो बंबई चला गया. सच पूछो तो पैसा कमाने ही गया था. ये भी था कि काम मिल जाएगा.

ये नहीं सोचा था कि दस साल में इतना कुछ हो जाएगा.

लेकिन जो लिखते हो क्या उसके पीछे कोई सोच नहीं होती. राजनीतिक हो कि नहीं...ज़रुरी है क्या राजनीतिक होना. क्या मैं आम आदमी की तरह विरोध नहीं कर सकता.

गुलाल का जो गाना है दूर देश के टावर में घुस जाए एरोप्लेन या फिर आरंभ है प्रचंड. ज़रुरी है क्या कि कोई विचारधारा हो. अब बीजेपी वाले बोलें कि आरंभ है प्रचंड उनके विचार को सूट करता है तो मुझे तो बुरा ही लगेगा न. एरोप्लेन वाला गाना

मैं लेफ्टिस्ट रहा हूं. वैसे भी जो 22 में वामपंथी न हो उसकी ज़िंदगी बेकार है और जिसने 30 में वामपंथ न छोड़ दिया वो भी बेकार है. विचार एक आकार तो देता ही है.

कलाकार के तौर पर स्टैंड लेता हूं पक्का. लूंगा भी. मैं टैक्स देता हूं. विरोध करुंगा.

लेकिन ये तो अराजक हुआ न.

वो जैसा भी है वामपंथी होना ज़रुरी है क्या. कोई खांचे में क्यों फिट हो जाए.

अच्छा तारीफ और प्रशंसा के बारे में क्या सोचते हो.....सब बेकार है. एक स्तर पर देखो तो सब बेकार है. पैसा गाड़ी नाम...एक कमरे में बंद होकर आंख मूंदकर ध्यान कीजिए वही एकमात्र बात है...

सूफी साधु हो गए...मना तो नहीं है सूफी होना.

ठीक है तारीफ हो रही है लेकिन इसको भूल जाइए. अभी गैंग्स ऑफ वासेपुर की पार्टी है मुंबई में. मैं यहां हूं. मुझे अच्छा लग रहा है . बहुत हो गया. अब और कुछ.

अमिताभ अच्छे लगते हैं और बहुत अच्छे लगते हैं. उनमें कुछ था एक्सट्रा जो उन्हें महान बनाता है. इसके अलावा चार अभिनेता हैं जिन्हें मैं बेहतरीन मानता हूं ओम पुरी, दीपक डोबरियाल, रणबीर कपूर और मनोज वाजपेयी. रणबीर कपूर तो खर्च ही नहीं करता अपने आपको और पता नहीं कहां से इतनी संजीदगी ले आता है शॉट से पहले.

जीनियस साढ़े चार हुए इंडस्ट्री में....मेरे लिए...विजय आनंद, मज़रुह सुल्तानपुरी, किशोर कुमार और आरडी बर्मन....चार हुए और आधा अनुराग कश्यप. आधा इसलिए क्योंकि अभी बाकी है इतनी जल्दी नहीं.

बर्मन,मज़रुह, विजय आनंद और किशोर की रेंज देखिए आप. जीनियस थे ये लोग. कोई शक नहीं.

ढाई सौ गाने हैं मेरे पास लेकिन कोई लेता नहीं था. अब थोडी बात बनी है. लोग मेरी बात सुनते हैं. अब मेरे गाने मैं ही लिख के कम्पोज़ कर के गा सकता हूं. उतने प्यार से कोई नहीं गाएगा. थोड़ा बहुत स्वानंद में है वो फीलिंग गाने की.

अब मुझे मिल रहा है मौका अपने गाने लिखने, कंपोज़ करने और गाने का. एन्ज्वॉय कर रहा हूं.

थिएटर अभी नहीं...अभी मैं खुश हूं. घर में बैठ कर टीवी देखता हूं चाय पीता हूं. परिवार को समय नहीं दे पाया. कई साल अब उनके हिसाब से चलता हूं. सास बहू सीरियल भी देख लेता हूं कभी कभी. उसका भी मजा है.

परिवार को समय नहीं दिए. मैं बहुत गैर ज़िम्मेदार पति रहा. पिता भी. अब उनको समय देता हूं परिवार को.

सब कुछ करने का ठेका मैंने नहीं लिया है. सब लोग करें मुझे भी काम मिल रहा है कर रहा हूं. निर्देशन के बारे में सोचा नहीं है. उतनी मेहनत करने के बारे में सोचता भी नहीं.