बोल बच्चन: जबरदस्ती की हँसी

बोल बच्चन

हंसना और हंसाना शायद दुनिया का सबसे मुश्किल काम है, खासतौर से फिल्मों में. शायद इसलिए वो लेखक या निर्देशक या यूं कहिए कि फिल्में, जो हंसा सकती हैं वो लंबे समय तक याद रहती हैं. मिसाल के तौर पर पड़ोसन, हाफ टिकट, जाने भी दो यारी, ऋषिकेश मुखर्जी की गोलमाल या चुपके चुपके.

लेखक के व्यंग्य को दर्शकों तक पहुंचाना एक निर्देशक के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और इस काम में सशक्त कलाकार बेहद अहम भूमिका निभा सकता है.

रोहित शेट्टी, जिन्होंने गोलमाल सीरीज की फिल्में बनाकर कामयाबी के नए आयाम हासिल किए वो अपने ‘प्रोड्यूसर’ दोस्त अजय देवगन के साथ मिलकर एक और कॉमेडी फिल्म लाए हैं ‘बोल बच्चन’.

बोल बच्चन के साथ समस्या ये है कि ना तो इसमें अच्छे गुदगुदा देने वाले संवाद हैं और ना ही अच्छी स्क्रिप्ट. अब ऐसी स्थिति में कलाकार कर भी क्या सकते हैं?

चाहे वो अजय देवगन हों या अभिषेक बच्चन. जब उनके पास मसाला ही नहीं होगा तो वो कॉमेडी क्या करेंगे? अभिषेक बच्चन तो वैसे ही एक मंझे हुए कलाकार नहीं हैं. जहां थोड़ा बहुत उनसे अभिनय की उम्मीद थी वहां भी उन्होंने फूहड़ अभिनय ही किया है.

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Image caption अर्णब बनर्जी के मुताबिक फिल्म में सब कुछ निराशाजनक है. कहानी, संवाद, कलाकारों का अभिनय, सब कुछ हताश करता है,

कहानी में पृथ्वीराज रघुवंशी (अजय देवगन) राजस्थान के रनकपुर इलाके में एक अखाड़े के बादशाह हैं और उन्हें झूठ से सख्त नफरत है.

इसी जगह पर अब्बास अली (अभिषेक बच्चन) अपनी बहन सानिया (असिन) के साथ आकर बस जाते हैं. उनकी माली हालत बेहद खराब है और उन्हें काम चाहिए, जो इस इलाके में उन्हें पृथ्वीराज ही दे सकते हैं. लेकिन अब्बास अपने दोस्त (कृष्णा) की सूझ बूझ से अभिषेक बच्चन नाम का एक दूसरा किरदार बनकर उनका दिल जीत लेते हैं.

अब्बास को पृथ्वीराज की बहन (प्राची देसाई) से इश्क़ हो जाता है. और इस दौरान अब्बास एक के बाद एक झूठ बोलता जाता है. और इस दौरान फिल्म में थोड़ी हुल्लड़ मचती है जिससे थोड़ी हास्यमय परिस्थितियां उत्पन्न होतीं हैं.

फिल्म के कुछ प्रसंद ऋषिकेश मुखर्जी की क्लासिक फिल्म गोलमाल से लिए गए हैं. लेकिन उन दृश्यों को जिस तरह से फिल्माया गया है उसे देखकर रोहित शेट्टी पर ज़बरदस्त गुस्सा आता है.

फिल्म में अर्चना पूरन सिंह भी हैं और उन्हें देखकर यही कहूंगा कि वो कॉमेडी शो लाफ्टर चैलेंज की जज ही बनी रहीं वही बेहतर है. क्योंकि फिल्म में वो बहुत फूहड़ लगी हैं.

फिल्म में लगभग सब कुछ निराशाजनक है. कहानी, संवाद, अभिनय सब कुछ हताश करता है. लेखक यूनुस सजावल और फरहाद के पास हास्य पैदा करने वाला हुनर शायद नहीं है. और शेट्टी का निर्देशन भी मार खाता नज़र आता है.

इस कलाकारों की भीड़ में अगर कोई थोड़ी बहुत अपनी छाप छोड़ पाता है तो वो है कृष्णा. जो एक साइड रोल में हैं लेकिन अपनी टाइमिंग की वजह से बाकी कलाकारों की तुलना में बाज़ी मार ले जाते हैं.

अगर बिना बात के ज़बरदस्ती हंसना चाहते हैं तो आप बोल बच्चन देख सकते हैं. वर्ना मेरी सलाह है कि इससे दूर ही रहिए.

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