नहीं बनना चाहता था प्लेबैक सिंगर - कैलाश

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कैलाश खेर को सुनने वाले कहते हैं कि इनकी गायकी,आपको किसी और ही दुनिया में ले जाती है. सात जुलाई को कैलाश दोस्तों,परिवार और संगीत के साथ अपना जन्मदिन मना रहे हैं.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में कैलाश ने सूफी से अपनी जान पहचान के बारे में बताया.

हिंदी फिल्मों में अपने पहले सुपरहिट गाने अल्लाह के बंदे की बात करते हुए कैलाश बताते हैं, "जिस तरह एक वाशिंग पाउडर का विज्ञापन दिन में सौ बार आता है, उसी तरह मैं कहीं भी जाता हूँ अल्लाह के बंदे मेरे पीछे आ जाता है, उसकी स्पीड अभी भी तेज़ है. आप करोड़ों गाने गा लें पर जिस गाने से आप पहचाने जाते है, वो आपका पीछा कभी नहीं छोड़ता. ग़ुलाम अली खां साहब इतने बुज़ुर्ग हो गए हैं पर जहां भी वो जाते हैं चुपके चुपके रात दिन थोड़े ही उनका पीछा छोड़ेगा".

पार्श्व गायक बनने के अपने सफर के बारे में कैलाश का कहना है, "मेरी चाह नहीं थी प्लेबैक सिंगर बनने की. मेरी हालत उस नवजात शिशु जैसी थी जिसे आप कितने भी उपहार दे दो, उसके लिए वो उपहार कुछ नहीं है, ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ, ये तो बस होता गया. फिर जब हम पर गाने फिल्माए जाने लगे तब भी हैरान था. मैं सोचता था लोग तो लाइन में लगे हुए हैं और यहां बिना लाइन के ही नंबर आ गया".

शास्त्रीय संगीत सीखने की ललक में कैलाश ने दिल्ली में अपना घर छोड़ा पर बाद में एहसास हुआ कि अकेला रहना इतना आसान नहीं है. दिल्ली में रहकर ही कैलाश ने कई नौकरियां पकड़ी पर संगीत को नहीं पकड़ पाए और इसलिए उन्होंने मुंबई की तरफ रुख किया.

कैलाश मानते हैं कि संघर्षों के इस दौर से आज के युवाओं को कम गुज़रना पड़ता है, "अब तो मौका खुद जाता है दरवाज़े पर, अब कुंआ खुद जा रहा है, प्यासे के पास, जैसे भगवान घर- घर जा रहे हों और कह रहे हों कि आजा तेरे लिए हमने एक शो बनाया है जिसका नाम है लिटिल चैंप या इंडियन आयडल".

हाल ही में कॉपीराइट संशोधित बिल के पास होने पर प्रतिक्रिया देते हुए कैलाश ने कहा कि अब गाने से जुड़े हर क्रिएटिव व्यक्ति की बल्ले बल्ले हैं.

अपने ढाई साल के बेटे कबीर के बारे में बताते हुए कैलाश ने कहा, "वो अडेल और कोल्ड प्ले को सुनना बहुत पसंद करते हैं. लेकिन कबीर का सबसे पसंदीदा गाना साड्डा हक़ है".

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