राजेश खन्ना- जिसने सिनेमा के मायने सिखाए

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मुझे सिनेमा से बेहद प्यार है, मैं ही क्यूँ भारत के किसी भी गली कोने में चले जाएँ- सिनेमा के दीवाने भरे पड़े हैं. यहाँ फिल्में केवल फिल्में नहीं बल्कि धर्म है, जूनुन है, ज़िंदगी जीने का एक तरीका है, एक सपना है.

सिनेमा की इस जादुई दुनिया से मेरा रिश्ता बचपन में सबसे पहले जुड़ा एक प्यारी सी फिल्म आनंद से और उसमें दो जादुई अभिनेताओं राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के ज़रिए. राजेश खन्ना का आनंद में अभिनय मेरे लिए फिल्मों से जुड़ने की पहली सीढ़ी बनी.

आज शायद इसलिए उनके जाने पर मन के एक कोने में सूनापन है. फिर चाहे हमने बरसों से भले ही उन्हें ठीक से याद न किया हो, उनको एक कोने में धकेल दिया हो.

फिल्मों से प्रेम संबंध

बचपन के हँसी ठिठोले के बीच फिल्में केवल देखकर भूल जाने की चीज थी मेरे लिए. फिर दूरदर्शन पर एक दिन ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद आई. देखकर रोंगटे खड़े हो गए...

आनंद को वो हँसमुख इंसान, नाम आनंद जिसे लिम्फोसरकोमा ऑफ इंटेस्टाइन था. हर वक़्त उसे बस मजाक सूझता, एक सख्त अक्कड़ युवा डॉक्टर ( अमिताभ बच्चन) को भी उसने अपना मुरीद बना लिया.

उसकी हरकतों से झल्लाकर डॉक्टर जब उससे पूछता है कि क्या पता भी है कि लिम्फोसरकोमा ऑफ इंटेस्टाइन क्या होता है तो आनंद बेपरवाह अंजाद में जवाब देता है, “वाह वाह क्या बात, क्या नाम है. ऐसा लगता है किसी वाइसरॉय का नाम है. बीमारी हो तो ऐसी हो.”

एक घंटे और सत्तावन मिनट की फिल्म गुजर गई और लगा ही नहीं कोई अभिनय कर रहा है. लगा कोई जिंदगी जीने के कला सिखाकर चला गया. फिल्म की खुमारी कुछ दिनों बाद उतरी तो समझ में आया कि ये सिनेमा का जादू था.

बस मेरा और फिल्मों का प्रेम संबंध उसी दिन से शुरु हो गया. अगर मैं कहूँ कि राजेश खन्ना मेरे सबसे पसंदीदा सितारे थे तो ये सही नहीं होगा. लेकिन वो तिलिस्मी दुनिया जिसे सिनेमा कहते हैं उससे रुबरु कराने का श्रेय उन्हीं को जाता है.

उपर आका, नीचे काका

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दूरदर्शन पर शाम को उनकी फिल्में आई करती थी तो बच्चे, युवा, बूढ़े सब लाइन से बैठकर आँखें फाडें उनकी फिल्में देखते थे.

धुँधला सा ही सही पर मुझे याद है कि अराधना का वो खिलदंड अरुण जब मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू गाता था सब तालियाँ बजाते थे. अमर प्रेम का आनंद बाबू जब बोलता था कि पुष्पा आई हेट टीयर्स तो ये डायॉलग लोग बार बार दोहराते.

बड़े होने पर पूरी तरह ऐहसास हुआ कि आखिर राजेश खन्ना कितने बड़े सुपरस्टार थे. सुपरस्टार का उनका जलवा कभी देखा नहीं, बस सुना है.

हमारी पीढ़ी के लिए सुपरस्टार का मतलब शाहरुख खान या अमिताभ बच्चन हैं. लेकिन बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि सुपरस्टार क्या होता, या भारतीय संर्दभ में कोई शब्द होता है ये सबसे पहले राजेश खन्ना ने दिखाया.

फिल्म अभिनेत्री अरुण ईरानी ने टीवी पर एक बातचीत में बताया कि कैसे बड़ी संख्या में प्रोड्यूसर उनके पीछे पड़े रहते थे और राजेश खन्ना के लिए फैसला करना मुश्किल हो जाता कि वो किसकी फिल्म साइन करे. ..ऐसे में वो सबको बुलकर ड्रॉ करवाते और जिसके नाम की चिट्ठी निकलती उसकी फिल्म करते.

जैसे आज बिग बी है, किंग खान है वैसे ही काका था. कहा जाता था उपर आका, नीचे काका. उनका असल नाम जतिन था.

उनके सुपरस्टारडम के किस्से सुने हैं तो शोहरत की ऊंचाइयों से उतरते राजेश खन्ना के शराब, गुरूर और अकेलेपन में डूबने के किस्से भी सुने हैं.

सबमें खोट होते हैं, उनमें भी रहे होंगे. लेकिन राजेश खन्ना उस शख्स का नाम है जिसने एक पूरी पीढ़ी को, फिल्मों के जरिए ही सही, पर रोमांस करना सिखाया.

टेढ़ी से उनकी नजर, गर्दन का वो हिलाना, आधी बंद और आधी खुली उनकी इठलाती आँखें....हम सिर्फ अंदाजा ही लगा सकते हैं कि जवानी में पर्दे पर उनको देखकर लोगों पर क्या जादू चलता होगा.

जिंदगी कैसी है पहेली

राजेश खन्ना न तो मेरी पीढ़ी के थे, न मेरे लिए सबसे बेहतरीन एक्टर, न कभी उनका इंटरव्यू किया, न कभी उनसे मिली, पिछले 10-15 साल में उनकी कोई फिल्म भी नहीं देखी....पर उनके चले जाने की खबर से अचानक लगा मानो कुछ है जो खो दिया है.

पर्दे पर निभाए किरदार हकीकत नहीं होते, मनगंढ़त कहानियाँ होती हैं, अफसाने होते हैं.

फिल्मी पर्दे पर अपने किरदारों के माध्यम से ही सही पर राजेश खन्ना ने आनंद जैसी फिल्मों के जरिए मुझे सिनेमा से जुड़ाव की अनमोल भेंट दी.

आनंद के राजेश खन्ना ने एक जगह कहा था कि “बाबू मोशाई जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं.”

राजेश खन्ना की ज़िंदगी 70 साल से लंबी नहीं हो सकी पर बड़ी ज़रूर रहेगी. बड़ी स्क्रीन का बड़ा हीरो...सुपरस्टार राजेश खन्ना.

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