अपनी फिल्मों पर शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं: शबाना

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Image caption शबाना ने 1974 में आई फिल्म 'अंकुर' से हिंदी फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की.

आज की तारीख में दुनिया का शायद ही कोई ऐसा फिल्म महोत्सव हो जहां हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधित्व करती कोई फिल्म मौजूद न हो. धीरे-धीरे ही सही लेकिन अब हिंदी सिनेमा ने अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पैर पसारना शुरू कर दिया है.

लेकिन ये भी सच है कि हाल फिलहाल तक दुनिया हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक अलग नज़रिए से देखती थी. उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता था.

अभिनेत्री शबाना आज़मी कहती हैं, ''हिंदी सिनेमा ने अपनी पहचान को लेकर बेहद संघर्ष किया है. पश्चिमी समाज की स्वीकृति पाने के लिए हमने अपनी फिल्मों को छोटा किया और फिल्मों से गाने भी हटाए. लेकिन फिर हमें एहसास हुआ कि हमें हमारी फिल्मों पर शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है.''

हाल ही में बीबीसी एशियन नेटवर्क से हुई बातचीत में शबाना ने कहा, ''हम जो हैं हमारी फिल्मों में होने वाले नाच और गाने की वजह से ही हैं. यही हमारी पहचान है और ये ही हमें दुनिया भर की फिल्मों से अलग करती है.''

इस बातचीत में शबाना अकेली नहीं थी साथ थे उनके पति लेखक और कवि जावेद अख्तर भी.

आइना

जावेद भी शबाना की बात से सहमति रखते हुए कहते हैं, ''भारतीय संस्कृति का हिस्सा है संगीत. नाच और गाना सदियों से हमारे देश के इतिहास का हिस्सा रहा है तो फिल्मों में कैसे संगीत को जगह न दी जाए.''

साथ ही वो कहते हैं, ''फिल्में तो समाज का आइना होती हैं. आज से नहीं सालों से नाच और गाने का इस्तेमाल कहानी कहने के लिए होता रहा है फिर चाहे वो कोई नाटक हो या फिर कोई नौटंकी.''

जावेद ये भी कहते हैं, ''शायद ये हमारे संगीत का जादू ही है कि हिंदी सिनेमा ने हॉलीवुड से न सिर्फ टक्कर ली बल्कि जीत भी हासिल की वर्ना अगर आप नज़र डालें तो हॉलीवुड ने कई देशों की फिल्म इंडस्ट्रियों को खत्म किया है.''

जावेद के अनुसार, ''हिंदी सिनेमा में कुछ अलग है, कुछ जादुई है. अब ये जादू कलाकारों में है, कहानी में है या फिल्म बनाने के हमारे तरीके में है ये कहना तो मुश्किल है लेकिन जिस तरह से हम अपनी फिल्में बनाते हैं उस तरीके में कोई न कोई बात तो ज़रूर है.''

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