क्या सूपर 'अनकूल' हैं हम

क्या सूपर कूल हैं हम
Image caption 'क्या सूपर कूल हैं हम' निर्माता एकता कूपर की फिल्म है

अगर एकता कपूर का बस चले तो वो हम सब को यकीन दिला दे कि बनावटी और नाटकीय सीरियल ही टेलीविजन पर चल सकते हैं .

अब अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी 'ऑल्ट एंटरटेनमेंट' के ज़रिए, एकता शायद ये बताना चाहती हैं कि व्यस्कों के मनोरंजन के मायने सिर्फ उन्हें ही मालूम है.

पर इन सबके बावजूद, इसमें दो राय नहीं है कि मैं बहुत अपेक्षा के साथ "क्या सूपर कूल हैं हम" देखने गया था.

आखिरकार पिछले साल ही तो हमने 'डेल्ही बैली' और इस साल 'विक्की डोनर' बनाकर ये साबित कर दिया था कि हम वर्ल्ड क्लास हास्य पैदा कर सकते हैं.

इस फिल्म में तुषार कपूर और रितेश देशमुख के अत्यंत अस्वाभाविक और बनावटी हास्य से तो कहीं-कहीं मेरा सर के बाल नोचने का मन कर रहा था.

एकता का यह ऐलान था कि इस किस्म की फिल्म बॉलीवुड में पहले कभी नहीं बनी. शायद वो फूहड़ता को हास्य मानती हैं.

फिल्म के प्रोमोज़ से ये ज़ाहिर तो था कि इसके डायलॉग्स काफी बोल्ड है पर फिल्म देखकर लगा कि क्या ऐसे चुटकुले जिन्हें आजकल के स्कूल के बच्चे एसएमएस में भेजते हैं किसी भी रुप में अव्वल दर्जे की फिल्म बना सकते हैं?

मैं इस बात का स्पष्टीकरण दे दूँ कि मैं एडल्ट ह्यूमर के खिलाफ नहीं हूँ बल्कि मैं तो फिल्मों में नटखट, शरारती और सेक्स कॉमेडी के पक्ष में हूँ.

कहानी में ज़ोर नहीं

'क्या सूपर कूल हैं हम' - वर्ष 2005 में बनी फिल्म 'क्या कूल हैं हम' का सीक्वेल है और इस बार एक डबल डोज़ का मज़ा देने रितेश देशमुख और तुषार कपूर फिर से आए है.

आदि(तुषार) और सिड(रितेश) दो भाई हैं जो अपनी किस्मत आज़माते हुए कई कारनामे कर बैठे हैं.

तुषार छोटे-मोटे एड करता है और एक बड़े स्टार बनने का सपना देखता है और सिड एक डीजे है.

आदि को सिमरन (नेहा शर्मा) और सिड को अनु (सारा जैन डायस) से प्यार हो जाता है. दोनों इस फिराक में कि कहीं कोई बात बन जाए गोआ पहुंच जाते हैं, जहां दोनो लड़कियां भी पहुंच गई हैं.

अब एक बात तो तय है कि ना तो तुषार ना रितेश एक मंझे हुए कलाकार कहे जा सकते हैं. तुषार ने गोलमाल सीरीज़ में एक मूक की भूमिका में वाह-वाही तो खूब पाई है लेकिन हर बार नए अंदाज़ में पेश होना उनकी सीमाओं को दर्शाता है.

रितेश तो केवल लकी स्टार हैं जो अच्छी हिट फिल्मों के साथ जुड़े होने की वजह से पहचान बना पाए हैं.

फिल्म में निर्देशक सचिन यार्डी बहुत मेहनत से हमें हंसाने की कोशिश में जुटे हुए हैं और एडल्ट कंटेंट होने की वजह से वो प्लॉट नाम की चीज़ भी भूल गए जिसकी वजह से फिल्म बहुत उबाऊ और दुखदायी हो उठती है.

एकता की गलतफहमी

कोई भी लाइन जो हास्य पैदा कर सकती है हास्यप्रद होनी चाहिए वो एडल्ट जोक्स की आड़ में ही क्यों ना हो. अब ऐसी द्विअर्थी लाइन का क्या महत्व,जो स्कूल में बच्चे शेयर करते हैं?

मेरी एकता से गुज़ारिश है कि कृपा करके अगर एडल्ट फिल्म बनाना ही है तो ऐसे विनोद प्रिय और हास्यप्रधान डायलॉग हों जो सचमुच गुदगुदी पैदा कर दे और हां ऐसी फिल्म में अनुभवी औऱ हाजिरजवाबी कलाकार का ही चयन होना चाहिए वरना सारे जोक्स और भी ठंडे और फीके पड़ जाते हैं.

फिल्म में चंकी पांडे का होना तो ठीक है क्योंकि वो ऐसी ही फिल्मों के लायक हैं पर अनुपम खेर के किरदार को देखकर दुख होता है कि उनके जैसा अभिनेता बदकिस्मती से ऐसी फिल्म का हिस्सा बन गया.

फिल्म के दो गीत "गार्डन गार्डन हो गया" और "यूपी बिहार लूटने" अच्छा लुभावना संगीत पैदा करते हैं जिनका फिल्मांकन भी जवान लोगों का जरुर पसंद आएगा.

फिल्म को 'ए' सर्टिफिकेट से नवाज़ा गया है मतलब केवल 16 साल से ऊपर के दर्शकों को ही प्रवेश मिलेगा.

एकता का यह मानना है कि वो अधिक मात्रा में व्यस्क दर्शकों को मनोरंजन प्रदान कर रही है जो ना केवल हमारा दुर्भाग्य है बल्कि एकता की गलतफहमी भी है.

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