खिलाड़ी बना जोकर

 शुक्रवार, 31 अगस्त, 2012 को 18:56 IST तक के समाचार
अक्षय कुमार

जोकर अक्षय कुमार कि 100वीं फिल्म है.

एडिटर, संगीत निर्देशक और निर्देशक शिरीष कुंदर को शायद ऐसा लगता है कि वो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं वरना आप ही बताइए कि अपनी दूसरी फिल्म में वो सभी विभागों को अकेले ही क्यों संभालते.

जोकर जहां शिरीष की बतौर निर्देशक दूसरी फिल्म है वहीं अक्षय कुमार ने इस फिल्म से बॉलीवुड में अपना शतक पूरा किया है. जैसा कि फिल्म के शीर्षक से ही पता चलता है, फिल्म दर्शकों को जोकर बनाने का ही एक प्रयास है.

हम सबसे यही उम्मीद की जाती है न कि हम अपना काम पूरी ईमानदारी और लगन से करें.

एक फिल्म समीक्षक होने के नाते मेरा काम है हर फिल्म को पूरा देखना और फिर उस पर अपनी राय देना. लेकिन यकीन मानिए 'जोकर' को पूरा देखना मेरे सब्र का इम्तेहान तो था ही, साथ ही मुझे ऐसा भी लगा कि इस फिल्म के ज़रिए क्या लोगों की समझ का मज़ाक उड़ाया जा रहा है.

कहने को तो 'जोकर' एक कॉमेडी फिल्म है लेकिन फिल्म के हास्य में नयापन बिलकुल नहीं है बल्कि मैं तो कहूंगा कि फिल्म मूर्खता की चरमसीमा को छूती है.

फिल्म में अक्षय कुमार अमरीकी अंतरिक्ष ऐजेंसी 'नासा' के एक वैज्ञानिक हैं जो एलियंस पर शोध करता आया हैं. अक्षय को एक ऐसा यंत्र बनाना है जिसके जरिए इंसान दूसरी दुनिया के प्राणियों से बात कर सके. लेकिन अक्षय जब ये यंत्र बनाने में असफल हो जाते हैं तो नासा के अधिकारी उन्हें एक महीने का समय देते हैं जिसके दौरान उन्हें ये यंत्र बनाना है.

इसी दौरान अक्षय को उनके गांव पगलापुर वापस आना पड़ता है क्योंकि अचानक उनके पिता की तबीयत ख़राब हो गई है. पगलापुर एक ऐसा गाँव है जो भारत में होते हुए भी भारत के नक़्शे पर नहीं है.

जोकर

  • कलाकार: अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा, श्रेयस तलपड़े, मिनीषा लम्बा.
  • निर्देशक: शिरीष कुंदर
  • रेटिंग: *

अक्षय अपनी प्रेमिका सोनाक्षी सिन्हा के साथ जैसे ही पगलापुर पहुंचते हैं, वैसे ही शुरू होता है एक के बाद एक समस्याओं का सिलसिला. अक्षय को पता चलता है कि उनके पिता की बीमारी की बात झूठी थी और सिर्फ उन्हें पगलापुर वापस बुलाने के लिए कही गई थी.

इस गाँव का नाम पगलापुर इसलिए भी है क्योंकि यहां रहने वाला हर इंसान थोड़ा अलग है, थोड़ा विचित्र है. पगलापुर में न तो बिजली है और न ही पानी और इस समस्या का हल भी किसी के पास नहीं है.

गांव की हालत को सुधारने की जिम्मेदारी अक्षय अपने सिर पर लेते हैं और एक ऐसा उपाय खोज निकालते हैं जिससे सारी दुनिया की नज़रें आ टिकती हैं पगलापुर पर.

फिल्म में अब होती है एंट्री 'एलियंस' की. एलियंस भी ऐसे जो इंसानों की भाषा समझते हैं, इंसानों की तरह नाचते गाते हैं. भई अगर आप सोच रहे हैं कि फिल्म में सच में एलियंस आते हैं तो मैं आपको बता दूं कि ये तो अक्षय कुमार की एक चाल है जिससे वो दुनिया का ध्यान खीचना चाहते हैं.

अक्षय कुमार

राउडी राठौर के बाद जोकर अक्षय और सोनाक्षी की साथ में दूसरी फिल्म है.

अक्षय ऐसा इसीलिए भी करते हैं ताकि उनका गांव भी आधुनिक सुख-सुविधाओं का स्वाद चख पाए. एलियंस का नाम ही काफी होता है दुनिया भर के मीडिया को पगलापुर की चौखट पर लाने के लिए.

अब आप ही सोचिए कि एक ऐसी फिल्म जहां हर किरदार बिना वजह हंसता हो, गाता हो, नाचता और ज़रूरत से ज्यादा नकली और नाटकीय हो तो आप सिनेमाघर में बैठे क्या करेंगे? शायद अपने बाल खीचें.

फिल्म के निर्देशक शिरीष कुंदर शायद हमें इस बात का एहसास दिलाने कि कोशिश कर रहे हैं कि फिल्म बिना कहानी के भी चल सकती है बस उसमें कॉमेडी का तड़का लगा दीजिए.

मुझे लगता है राउडी राठौर को मिली सफलता के बाद अक्षय कुमार ने जब जोकर को देखा तो वो भी घबरा गए और उन्हें खुद ये फिल्म पसंद नहीं आई और शायद इसी वजह से वो मीडिया में फिल्म को प्रमोट करते नज़र नहीं आए.

फिल्म बहुत ही निराशाजनक है. न फिल्म की कहानी में कोई दम है और न ही फिल्म के किसी किरदार में कोई बात है. फिल्म में चित्रांगदा सिंह के आइटम नंबर 'काफिराना दिल' में भी कोई दम नहीं है.

अंत में मैं तो बस यही सलाह दूंगा कि अगर आप अक्षय कुमार को दिलो-जान से चाहते भी हैं तो भी आप ये फिल्म देखे बिना अपना काम चला सकते हैं.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.