फिल्मी जगत के 'स्वार्थी' रिश्ते

 शनिवार, 1 सितंबर, 2012 को 09:39 IST तक के समाचार
ए के हंगल

ए के हंगल के निधन पर उन्हें अंतिम विदाई देने कुछ गिने चुने कलाकार ही पहुंचे

वरिष्ठ फिल्म कलाकार ए के हंगल का 26 अगस्त को निधन हुआ. 225 फिल्मों में काम कर चुके ए के हंगल के अंतिम संस्कार में बहुत ही गिने चुने कलाकार पहुंचे. जबकि उनका अंतिम संस्कार जुहू वर्सोवा इलाके में हुआ, जहां से बस कुछ ही दूरी पर फिल्म उद्योग के नामचीन कलाकार और फिल्मकार रहते हैं.

अब जरा दूसरा नजारा याद कर लीजिए. तकरीबन डेढ़ महीने पहले जब हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार कहे जाने वाले राजेश खन्ना का निधन हुआ था, तो सितारों का पूरा हुजूम उनकी शवयात्रा में उमड़ आया था.

"बड़े शर्म की बात है कि ए के हंगल जैसे अभिनेता जिन्होंने इंडस्ट्री को 50 साल दिए उसे ये बड़े सितारे अंतिम वक्त में 50 मिनट नहीं दे पाए. हंगल साहब लंबे समय से बीमार थे. उनको देखने भी कोई बड़ा सितारा नहीं पहुंचा था. बस, खाली एअरकंडीशंड कमरे में बैठकर ट्विटर के जरिए अपना खेद जता देना ही काफी नहीं होता"

रजा मुराद, फिल्म अभिनेता

क्या नए, क्या पुराने सभी कलाकार राजेश खन्ना के अंतिम दर्शन करने आए थे. अमिताभ बच्चन, सलमान खान से लेकर करण जौहर, शाहरुख खान, रणबीर कपूर, ऋषि कपूर सभी उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे थे.

भारतीय फिल्म जगत की गुमनाम मौतें

22 जनवरी 2005: 70 और 80 के दशक की मशहूर अभिनेत्री परवीन बाबी अपने मुंबई स्थित फ्लैट में मृत पाई जाती हैं. मौत से कई साल पहले ही उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग से और उद्योग ने उनसे संपर्क काट लिए थे.

क्लिक करें क्लिक कीजिए और पढ़िए एके हंगल की कहानी उन्हीं की जुबानी 27 मार्च 2000: 60 और 70 के दशक की मशहूर अभिनेत्री प्रिया राजवंश अपने मुंबई स्थित घर में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाई गईं.

राजेश खन्ना की शवयात्रा

राजेश खन्ना की शवयात्रा में लगभग पूरी फिल्म इंडस्ट्री पहुंची.

24 फरवरी 1998: हिंदी फिल्मों की शायद सबसे मशहूर खलनायिका और चरित्र अभिनेत्री ललिता पवार पुणे स्थित अपने घर में मृत पाई जाती हैं. फिल्मों में कामयाबी के शिखर को छूने वाली इस कलाकार की इतनी गुमनाम मौत होगी, भला किसने सोचा था.

ये फेहरिस्त और लंबी हो सकती है, लेकिन ये चंद ऐसे उदाहरण हैं जो इस बहस को जन्म देते हैं कि क्या हिंदी फिल्म उद्योग अपने ही सदस्यों के लिए संवेदनहीन हो जाता है.

बात सिर्फ मौत की नहीं है. कई कलाकारों को अपनी जिंदगी के आखिरी दिन बेहद दुख और तकलीफों में गुजारने पड़े.

एके हंगल को भी अपनी मौत से पहले आर्थिक तकलीफों से गुजरना पड़ा. यही हाल मशहूर संगीतकार आर डी बर्मन का भी हुआ था.

क्लिक करें क्लिक कीजिए और देखिए राजेश खन्ना की अंतिम यात्रा एके हंगल को आखिरी विदाई देने पहुंचे अभिनेता रजा मुराद इंडस्ट्री के इस 'चलन' से बेहद खफा हैं और बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की.

रजा मुराद कहते हैं, "बड़े शर्म की बात है कि जिस अभिनेता ने इंडस्ट्री को 50 साल दिए उसे ये बड़े सितारे अंतिम वक्त में 50 मिनट नहीं दे पाए. हंगल साहब लंबे समय से बीमार थे. उनको देखने भी कोई बड़ा सितारा नहीं पहुंचा था. बस, खाली एअरकंडीशंड कमरे में बैठकर ट्विटर के जरिए अपना खेद जता देना ही काफी नहीं होता."

रजा मुराद तो यहां तक कहते हैं, कि "ये फिल्मी लोगों के इमोशन, इनकी भावनाएं बस कैमरे के सामने ही निकलते हैं. कैमरे के बंद होते ही ये सब भावनाशून्य हो जाते हैं."

"राजेश खन्ना हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार थे. जबकि हंगल साहब ने ज्यादातर चरित्र भूमिकाएं ही कीं. राजेश खन्ना से देश का एक बहुत बड़ा वर्ग उनकी फिल्मों के जरिए जुड़ा था. लेकिन हंगल साहब के साथ वो बात नहीं थी. ये बात सच है कि आपकी मौत कितनी शानदार होगी ये आपकी बॉक्स ऑफिस कामयाबी और आपकी लोकप्रियता तय करती है."

जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि जब कोई कलाकार अपनी मौत से काफी पहले फिल्मों में काम करना बंद कर चुका होता है तो ऐसे में प्राय: उसकी मौत गुमनाम ही रहती है.

वो उदाहरण देते हुए कहते हैं कि एक बेहद चर्चित फिल्मकार थे चंदूलाल शाह. उन्होंने 1925 से 1955 तक कई चर्चित फिल्में बनाईं. लेकिन जब उनका निधन हुआ तो महज चार लोग उनकी शवयात्रा में थे. चंदूलाल अपनी मौत से कई साल पहले ही फिल्में बनाना बंद कर चुके थे.

क्या लोकप्रियता है पैमाना

लेकिन राजेश खन्ना के साथ भी तो यही हुआ. वो भी तो अपने निधन से कई साल पहले फिल्मों में निष्क्रिय हो चुके थे. फिर उनके देहांत के बाद उन्हें फिल्मोद्योग ने बढ़-चढ़कर विदाई क्यों दी.

क्यों राजेश खन्ना की मौत पर समूचा फिल्म उद्योग आ जाता है और क्यों ए के हंगल की मौत पर मुट्ठी भर लोग जुटते हैं.

कलाकार की मौत कितनी शानदार होगी, क्या ये बात सिर्फ बॉक्स ऑफिस कामयाबी या कलाकार की लोकप्रियता ही तय करती है.

"इंडस्ट्री में लोगों के बड़े सेलफिश यानी स्वार्थी किस्म के रिश्ते होते हैं. देखिए अब जो नई पीढ़ी है उसमें पुरानी पीढ़ी जैसी गरिमा भी नहीं है. वो ऐसी जगहों पर ही जाना पसंद करते हैं जहां उनके जैसे चेहरे दिखें. शायद वो हंगल साहब जैसे बुजुर्ग कलाकारों से आइडेंटीफाई भी नहीं करते."

नम्रता जोशी, फिल्म समीक्षक

एके हंगल की मौत और राजेश खन्ना की मौत के अंतर को जयप्रकाश चौकसे बॉक्स ऑफिस का अंतर करार देते हैं.

जयप्रकाश कहते हैं, "राजेश खन्ना हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार थे. जबकि हंगल साहब ने ज्यादातर चरित्र भूमिकाएं ही कीं. राजेश खन्ना से देश का एक बहुत बड़ा वर्ग उनकी फिल्मों के जरिए जुड़ा था. लेकिन हंगल साहब के साथ वो बात नहीं थी. साथ ही उनकी पीढ़ी के ज्यादातर कलाकार अब इस दुनिया में नहीं है. ये बात सच है कि आपकी मौत कितनी शानदार होगी ये आपकी बॉक्स ऑफिस कामयाबी और आपकी लोकप्रियता तय करती है."

रजा मुराद कहते हैं, "राजेश खन्ना की मौत पर सभी सितारों को पता था कि जबरदस्त मीडिया कवरेज मिलेगा. फोटो खिंचेगी, तो सब दौड़े चले आए. ये इंडस्ट्री ऐसा ही करती है. कभी किसी राजनेता का कार्यक्रम होता है और वो किसी को बुलाए तो सब डर के भागे चले जाते हैं. ये सब पब्लिसिटी के पीछे भागने वाले डरे हुए, खोखले लोग हैं."

70 और 80 के दशक की मशहूर अभिनेत्री परवीन बाबी बिलकुल गुमनाम हालत में अपने फ्लैट में मृत पाई गईं.

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी की भी ऐसी ही राय है. वो मानती हैं कि इंडस्ट्री में चढ़ते सूरज को सलाम करने की पुरानी परंपरा है.

नम्रता के मुताबिक, "इंडस्ट्री में लोगों के बड़े सेलफिश यानी स्वार्थी किस्म के रिश्ते होते हैं. अब जो नई पीढ़ी है उसमें पुरानी पीढ़ी जैसी गरिमा भी नहीं है. वो ऐसी जगहों पर ही जाना पसंद करते हैं जहां उनके जैसे चेहरे दिखें. शायद वो हंगल साहब जैसे बुजुर्ग कलाकारों से आइडेंटीफाई भी नहीं करते."

क्लिक करें क्लिक कीजिए और पढ़िए क्यों शिखर से लुढ़के राजेश खन्ना फिल्मकार साजिद खान आर डी बर्मन का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "इतने बड़े संगीतकार के साथ फिल्म उद्योग ने जो उनके आखिरी दिनों में सलूक किया वो बेहद अफसोसजनक है. उनके जैसे गुणी संगीतकार को कोई काम देने को तैयार नहीं था. लोग उनसे मिलने नहीं जाते थे. मैं इसके लिए इंडस्ट्री को कभी माफ नहीं कर सकता."

सिर्फ इंडस्ट्री का ही कसूर नहीं

"पुरानी पीढ़ी के कलाकार अपने पैसों को अच्छी तरह से निवेश नहीं करते थे. आज की पीढ़ी इस मामले में स्मार्ट हो गई है. पुराने कलाकार कई बार ठीक निवेश ना होने की वजह से या फिजूलखर्ची की वजह से अपनी आर्थिक हालात भी खराब कर गए."

नम्रता जोशी, फिल्म समीक्षक

क्या सिर्फ फिल्मोद्योग ही इसके लिए जिम्मेदार है. जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि फिल्म उद्योग जैसी ह्रदयदीनता हर जगह है.

वो कहते हैं, "ऐसा तो हर जगह होता है. राजनीति में भी ऐसा होता है. ऐसा नेता जो सक्रिय राजनीति बरसों पहले छोड़ चुका हो उसके निधन पर कौन उसे याद करता है."

कुछ कलाकारों की आर्थिक स्थिति खराब होने के सवाल पर नम्रता जोशी कहती हैं, "पुरानी पीढ़ी के कलाकार अपने पैसों को अच्छी तरह से निवेश नहीं करते थे. आज की पीढ़ी इस मामले में स्मार्ट हो गई है. पुराने कलाकार कई बार ठीक निवेश ना होने की वजह से या फिजूलखर्ची की वजह से अपनी आर्थिक हालात भी खराब कर गए."

रजा मुराद कुछ कलाकारों की गुमनाम जिंदगी और मौत के पीछे उन्हें ही जिम्मेदार ठहराते हैं.

वो परवीन बाबी का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "परवीन ने खुद ही अपने आपको इंडस्ट्री से दूर कर लिया. उनके मामले में फिल्मोद्योग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. वो मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं. तो ऐसे में उनसे कोई मिलने भी जाता तो वो मिलने से इनकार कर देतीं."

नम्रता ये भी कहते हैं कि फिल्मों में कहावत होती है, "शो मस्ट गो ऑन". और फिल्म इंडस्ट्री इस कहावत को वाकई बेहद गंभीरता से लेती है.

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