फ़िल्म समीक्षा: बासी है 'बर्फी'

 शुक्रवार, 14 सितंबर, 2012 को 13:44 IST तक के समाचार
'बर्फी'

ऐसा क्यों होता है कि जब भी हिंदी फिल्मों में शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम किरदार दिखाए जाते हैं तो उन्हें बिल्कुल एक ही तरीके से पेश किया जाता है.

उनके शारीरिक हावभाव, मैनरिज्म, भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता या अक्षमता को दिखाने का बिल्कुल एक निर्धारित तरीका है और कोई भी फिल्मकार प्रयोग करने को तैयार नहीं दिखता.

तमाम तरह की रिसर्च से ये बात साबित हो चुकी है कि इस तरह के लोगों में एक खास किस्म की क्वालिटी होती है जो उन्हें सामान्य लोगों से अलग बनाती है और जब ये किसी को प्यार करते हैं तो उससे, आम लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा जुड़ जाते हैं.

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मैं ये नहीं कहूंगा कि बर्फी के प्लॉट में कोई कमी है, लेकिन शारीरिक और मानसिक अक्षमता जैसे संवेदनशील मुद्दे को ये फिल्म उस व्यापकता या संवेदनशीलता से पेश नहीं कर पाई जिसकी दरकार थी.

क्या है कहानी

"मैं ये नहीं कहूंगा कि बर्फी के प्लॉट में कोई कमी है, लेकिन शारीरिक और मानसिक अक्षमता जैसे संवेदनशील मुद्दे को ये फिल्म उस व्यापकता या संवेदनशीलता से पेश नहीं कर पाई जिसकी दरकार थी."

अर्णब बनर्जी, फिल्म समीक्षक

कहानी दार्जिलिंग की खूबसूरत वादियों से शुरु होती है और थोड़ा बहुत कोलकाता शहर को भी कहानी में जगह दी गई है.

कहानी का मुख्य पात्र है मर्फी उर्फ बर्फी (रणबीर कपूर), जो सुन और बोल नहीं सकता. लेकिन वो अपनी इस अक्षमता से बिलकुल दुखी नहीं है. वो बेहद खुश और जिंदादिल इंसान है.

उसकी प्यारी हरकतें लोगों को लुभाती हैं. उसकी मुलाकात श्रुति (इलियाना डी क्रूज) नाम की लड़की से होती है जिससे बर्फी की जिंदगी और ज्यादा ऊर्जावान और खुशहाल हो जाती है.

बर्फी

दोनों में प्यार हो जाता है. लेकिन श्रुति के मां-बाप उसकी शादी, उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं और कर देते हैं और श्रुति अपने पति के साथ कोलकाता रवाना हो जाती है.

इस बीच बर्फी की जिंदगी में आती है झिलमिल चटर्जी (प्रियंका चोपड़ा). झिलमिल ऑटिस्टिक है इसलिए उसके मां-बाप ने उसे एक बालआश्रम में छोड़ दिया था.

झिलमिल और बर्फी एक दूसरे से बहुत जल्दी हिल मिल जाते हैं. एक दूसरे के साथ हंसते खेलते दोनों के बीच की रिलेशनशिप बहुत मजबूत हो जाती है.

झिलमिल को अपने मां-बाप से जो प्यार नहीं मिलता वो प्यार और दुलार उसे बर्फी से मिलता है. लेकिन परिस्थितियां बर्फी की जिंदगी में फिर से नया मोड़ लाती हैं और श्रुति फिर से उसके जीवन में आती है.

'बर्फी'

  • कलाकार: रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, इलियाना डी क्रूज
  • निर्देशक: अनुराग बासु
  • संगीत: प्रीतम
  • रेटिंग: **

अब बर्फी को झिलमिल और श्रुति में से किसी एक को चुनना है.

फिल्म के तीनों किरदारों के बीच प्रेम के विभिन्न पहलुओं को पेश किया गया है. श्रुति का बर्फी के प्रति प्रेम और बर्फी का झिलमिल के प्रति प्रेम, ये प्लॉट फिल्म की कहानी में एक अलग तरीके का प्रेम त्रिकोण दिखाता है.

फिल्म में सौरभ शुक्ला की भी अहम भूमिका है जिन्होंने एक पुलिस वाले की भूमिका अदा की है, उनके और बर्फी के बीच फिल्म में एक चूहा बिल्ली का खेल सा चलता रहता है.

क्या है समस्या

फिल्म के किरदारों के जीवन को अलग-अलग कालखंडों में दिखाया गया है. तीनों किरदारों को युवावस्था से बुढ़ापे तक दिखाया गया है और फिल्म के निर्देशक अनुराग बसु इस ट्रांजीशन को सटीक तरीके से दिखाने में सफल नहीं हो पाए.

फिल्म में रणबीर कपूर की चार्ली चैपलिननुमा हरकतें थोपी गईं लगती हैं.

गुलजार और मनोज कुमार जैसे फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों में इस चीज को बेहतरीन तरीके से दिखाया है.

फिल्म में कई सब-प्लॉट हैं जिसकी वजह से दर्शकों के मन में कई सवाल उठते हैं जिनके जवाब उन्हें फिल्म नहीं दे पाती.

लेकिन ये ज्यादा गंभीर शिकायते नहीं है. जो चीज मुझे सबसे ज्यादा हैरान और परेशान करती है, वो ये कि फिल्म के किरदारों के बीच की नजदीकियां दिखाने के चक्कर में कई सीन एक जैसे बन बड़े हैं. उनमें दोहराव साफ नजर आ रहा है.

फिल्म का क्लाइमेक्स भी बिलकुल प्रिडिक्टबल है और लगभग हर दर्शक भविष्यवाणी कर सकता है कि अब अगला सीन क्या होने वाला है.

फिल्म में रणबीर कपूर चार्ली चैपलिन की नकल करते दिखते हैं. अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के इस मास्टर कॉमिक एक्टर की नकल करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन मुझे समस्या तब होती है जब रणबीर कपूर की चार्ली चैपलिन नुमा हरकतें फिल्म में जबरदस्ती थोपी हुई लगती हैं.

"प्रियंका चोपड़ा अपने किरदार को निभाने के लिए खासी मेहनत करती हुई नजर आती हैं. वो प्रभावित करने की कुछ ज्यादा ही कोशिश करती हैं. लेकिन रणबीर कपूर ने जानदार काम किया है."

अर्णब बनर्जी, फिल्म समीक्षक

प्रियंका चोपड़ा ने प्रभावित करने की भरसक कोशिश की है और पूरी फिल्म में ही वो बस कोशिश ही करती रह जाती हैं. फिल्म में उनके मैनरिज्म में वो बेहद कॉन्सियश नजर आती हैं और कई बार उन्होंने भावनाओं को कुछ ज्यादा ही तीव्रता से अभिव्यक्त करने की कोशिश की है.

दूसरी तरफ रणबीर कपूर ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया है. हालांकि कुछ लोगों का शारीरिक रूप से अक्षम इस किरदार का इस तरह से स्ट्रीट स्मार्ट होना, खुश और जिंदादिल होना शायद गले से ना उतरे.

फिल्म की समीक्षा कैमरामैन रवि वर्मन के शानदार काम के जिक्र के बिना अधूरी होगी. उन्होंने दार्जीलिंग की खूबसूरत वादियों को बेहतरीन तरीके से अपने कैमरे में कैद किया है.

प्रीतम का संगीत और बैकग्राउंड संगीत दोनों ही फिल्म की कहानी में फिट बैठते हैं. मोहित चौहान का गाया टाइटल ट्रैक, पैपून और सुनिधि चौहान का गाया क्यों और रेखा भारद्वाज का गाया फिर ले आया दिल प्रभावित करते हैं.

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